सूत्रधार: इतिहास केवल युद्धों और साम्राज्यों की कहानी नहीं है... इतिहास है मनुष्य की इच्छाओं का। धर्म, अर्थ और मोक्ष की बातें सदियों से होती आईं, लेकिन जीवन का चौथा स्तंभ... 'काम'... 'प्रेम'... हमेशा अंधेरे में रखा गया। यह कहानी उस समय की है जब प्रेम करना अपराध था, और इच्छाओं को दबाना ही धर्म। पाटलिपुत्र की स्वर्ण भूमि पर एक ऐसे बालक का जन्म हुआ, जिसे दुनिया को प्रेम करना सिखाना था... लेकिन पहले, उसे खुद प्रेम से नफरत करनी थी।
माता (कावेरी): माधव... वे आ गए हैं। मैंने कहा था... समाज हमारे प्रेम को स्वीकार नहीं करेगा।
पिता (माधव): कावेरी, मल्लनाग को पिछवाड़े के रास्ते से निकालो। जल्दी करो!
बालक मल्लनाग: पिताजी... क्या हुआ है? वे लोग कौन हैं? मुझे डर लग रहा है!
माता (कावेरी): बेटा, मेरी बात सुनो। कभी पीछे मुड़कर मत देखना। कभी किसी से... कभी किसी से दिल मत लगाना। प्रेम केवल विनाश लाता है, बेटा। केवल विनाश!
सैनिक १: यही हैं वो पापी! जिन्होंने जात और कुल की मर्यादा तोड़ी। पकड़ लो इन्हें!
पिता (माधव): मल्लनाग, भाग जाओ! भागो!
बालक मल्लनाग: (रोते हुए, भागते हुए) प्रेम विनाश लाता है... प्रेम विनाश लाता है...
(कुछ वर्षों बाद)
मौसी (यशोधरा): मल्लनाग! मल्लनाग! कहाँ मर गया यह लड़का?
युवा मल्लनाग: जी मौसी, मैं यहाँ हूँ। पिताजी की पुरानी पोथियाँ पढ़ रहा था।
मौसी (यशोधरा): छीन कर फेंक दे इन पोथियों को! तेरा पिता एक मूर्ख था, और तेरी माँ एक कुलक्षिणी। दोनों ने अपनी वासना के लिए कुल का नाश कर दिया। तू भी उसी रास्ते पर जाना चाहता है?
युवा मल्लनाग: वे वेद पढ़ रहे थे, मौसी। इसमें ज्ञान है।
मौसी (यशोधरा): ज्ञान? वह ज्ञान नहीं, विष था! देख, आज उनका नाम लेने वाला कोई नहीं बचा। अगर तुझे जीना है मल्लनाग, तो अपनी भावनाओं का गला घोंटना सीख। साधु बन जा, विद्वान बन जा... लेकिन कभी प्रेमी मत बनना।
युवा मल्लनाग: प्रेमी? नहीं मौसी। मैंने उस रात आग देखी थी। मैं जलना नहीं चाहता। मैं समझना चाहता हूँ... कि आखिर मनुष्य उस आग में कूदता क्यों है?
मौसी (यशोधरा): तैयार हो जा। आज तुझे गुरुकुल जाना है। आचार्य विष्णु शर्मा तुझे लेने आ रहे हैं। वही तुझे सुधार सकते हैं।
(गुरुकुल में)
आचार्य विष्णु शर्मा: तो तुम ही हो मल्लनाग?
युवा मल्लनाग: जी, आचार्य।
आचार्य विष्णु शर्मा: तुम्हारी आँखों में एक अजीब सी शांति है... जैसे किसी तूफान के बाद का सन्नाटा। तुम यहाँ क्या पाने आए हो, पुत्र? धर्म? या मोक्ष?
युवा मल्लनाग: मैं 'कारण' ढूँढने आया हूँ, आचार्य।
आचार्य विष्णु शर्मा: किसका कारण?
युवा मल्लनाग: दुःख का। लोग जानते हैं कि आग जलाती है, फिर भी वे उसे छूते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि मनुष्य अपनी बुद्धि क्यों खो देता है। मैं कभी भावनाओ में नहीं बहूँगा, आचार्य। मैं एक पत्थर बनना चाहता हूँ... जिसे कोई तोड़ न सके।
आचार्य विष्णु शर्मा: पत्थर बनोगे? ध्यान रहे मल्लनाग, पत्थर पर ही मूर्तियाँ उकेरी जाती हैं। और कभी-कभी पत्थर भी पिघलते हैं। आओ, तुम्हारा ब्रह्मचर्य आज से शुरू होता है।
सूत्रधार: उस दिन मल्लनाग ने कसम खाई कि वह जीवन भर भावनाओं से दूर रहेगा। उसने सोचा कि उसने दुनिया के दरवाजे बंद कर दिए हैं। उसे नहीं पता था... कि जिस 'काम' से वह भाग रहा है, वही उसे इतिहास के पन्नों में अमर कर देगा। गुरुकुल की दीवारें ऊँची थीं, लेकिन नियति की दस्तक उससे भी तेज़ थी।
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें