1 आरंभ - अग्नि और राख FREE 2 पत्थर का पांडित्य FREE 3 साधु और सौंदर्य FREE 4 इंद्रियों का द्वार ₹0 5 चौसठ कलाओं का गुरुकुल ₹0 6 रणभूमि नहीं, रंगभूमि ₹0 7 प्रथम अध्याय का जन्म ₹0 8 धर्मसंकट ₹0 9 महा-शास्त्रार्थ - धर्म बनाम काम ₹0 10 द्रष्टा और भोक्ता ₹0 11 नागरिक का धर्म ₹0 12 शब्द और पत्थर ₹0 13 काशी - मोक्ष और मोह का संगम ₹0 14 श्मशान का सत्य ₹0 15 विंध्य के वन - शस्त्र और शास्त्र ₹0 16 उज्जयिनी - भोग की राजधानी ₹0 17 स्पर्श बिना मिलन ₹0 18 विस्मृत प्रेम - सुमेधा ₹0 19 अंतिम अध्याय और वापसी ₹0 20 सिंहनाद (शेर की दहाड़) ₹0 21 राख और चिंगारी ₹0 22 विदाई - पूर्णता की ओर ₹0 23 राख के नीचे दबी चिंगारी ₹0 24 विरासत का बोझ ₹0 25 अजनबी मुसाफिर - शिकारी या रक्षक? ₹0 26 विश्वास का सेतु ₹0 27 छाया से युद्ध ₹0 28 बहुरूपिए ₹0 29 रक्त और पत्थर ₹0 30 रक्त का मोल ₹0 31 विष-विद्या ₹0
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साधु और सौंदर्य

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Funtel
21 Mar 2026

सूत्रधार: पाटलिपुत्र की उस भीड़ भरी सड़क पर अचानक एक अजीब सी खामोशी छाने लगी। हवा का रुख बदल गया। धूल और पसीने की गंध की जगह अब मोगरे और चंदन की भीनी-भीनी खुशबू ने ले ली थी। लोग, जो अभी तक धक्का-मुक्की कर रहे थे, अब श्रद्धा और भय के साथ किनारे हट रहे थे। मल्लनाग हैरान था। क्या कोई राजा आ रहा है? या कोई देवता? नहीं... यह सवारी थी नगरवधू वसंतसेना की।

भीड़ (एक व्यक्ति): हटो! पीछे हटो! देवी वसंतसेना की पालकी आ रही है! रास्ता दो!

युवा मल्लनाग (स्वगत): देवी? एक गणिका को देवी? इस नगर की बुद्धि सचमुच भ्रष्ट हो गई है। मुझे हट जाना चाहिए, मैं अपनी छाया भी इस पाप पर नहीं पड़ने देना चाहता।

(मल्लनाग मुड़ने ही वाला होता है कि पालकी रुकने की आवाज़ आती है)

वसंतसेना: रुको।

युवा मल्लनाग: (रुक जाता है)

वसंतसेना: साधु महाराज? पूरा नगर मार्ग छोड़ कर खड़ा है, लेकिन आप अपनी जगह से नहीं हिले। क्या आपको भय नहीं लगता?

युवा मल्लनाग: (कठोर स्वर में) भय? किससे? भय उसे होता है जिसके पास खोने के लिए कुछ हो। मेरे पास केवल मेरा धर्म है, जिसे कोई छीन नहीं सकता। और रही बात मार्ग छोड़ने की, तो मैं केवल ज्ञान और ईश्वर के सामने झुकता हूँ, सौंदर्य के व्यापार के सामने नहीं।

(भीड़ में आश्चर्य की लहर दौड़ जाती है)

वसंतसेना: (शांत और गंभीर स्वर) व्यापार? तो आपको मेरी पालकी में केवल एक व्यापारी नज़र आता है? आपकी दृष्टि बहुत संकुचित है, साधु। लोग मुझे देखने के लिए इसलिए नहीं रुकते कि मैं सुंदर हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं पाटलिपुत्र की कला, संगीत और संस्कृति की संरक्षक हूँ।

युवा मल्लनाग: शब्दों का जाल मत बुनिए, भद्रे। जिसे आप 'कला' कहती हैं, शास्त्र उसे 'प्रलोभन' कहते हैं। आप मनुष्यों की कमजोरियों का लाभ उठाती हैं। आप उन्हें क्षणिक सुख देकर उनके मोक्ष के मार्ग में बाधा बनती हैं। आपका अस्तित्व ही अधर्म है।

वसंतसेना: मोक्ष? (हल्की हँसी) आप उस मोक्ष की बात कर रहे हैं जिसे आपने कभी देखा नहीं? और उस सुख को पाप कह रहे हैं जिसे आपने कभी महसूस नहीं किया? अजीब वैद्य हैं आप, बिना रोग को समझे दवा दे रहे हैं।

युवा मल्लनाग: मुझे रोग को समझने के लिए रोगी बनने की आवश्यकता नहीं है। मैं जानता हूँ कि कामवासना अग्नि है जो सब कुछ भस्म कर देती है।

वसंतसेना: अग्नि भोजन भी पकाती है, महाराज, और अंधेरे में रोशनी भी देती है। यह इस पर निर्भर करता है कि उसे संभालने वाला कौन है। आप अग्नि से डरते हैं, इसलिए भाग रहे हैं। मैं उस अग्नि को नृत्य करना सिखाती हूँ।

युवा मल्लनाग: तर्क-वितर्क व्यर्थ है। आप अपने विलास भवन में लौट जाइए, और मुझे मेरे एकांत में जाने दीजिए। हम दो विपरीत किनारे हैं जो कभी मिल नहीं सकते।

वसंतसेना: किनारे ही तो नदी को बहने की दिशा देते हैं, मल्लनाग। आप ज्ञानी हैं, पर आपका ज्ञान सूखा है। उसमें करुणा की नमी नहीं है।

युवा मल्लनाग: मुझे आपसे उपदेश की आवश्यकता नहीं है।

वसंतसेना: उपदेश नहीं, निमंत्रण दे रही हूँ। आज संध्या को मेरी सभा में आइएगा। वहाँ केवल शरीर का व्यापार नहीं होता। वहाँ विद्वान चर्चा करते हैं, कवि कविताएं पढ़ते हैं। अगर आपको लगता है कि आपका सत्य मेरे सत्य से प्रबल है, तो आइए और सिद्ध कीजिए। या फिर... आप डरते हैं कि कहीं आपका पत्थर सा दिल पिघल न जाए?

युवा मल्लनाग: मैं किसी से नहीं डरता। न आपसे, न आपके सौंदर्य से।

वसंतसेना: तो प्रमाण दीजिए। मैं प्रतीक्षा करूँगी।

(पालकी के आगे बढ़ने का आभास)

सूत्रधार: पालकी आगे बढ़ गई, लेकिन मल्लनाग वहीं खड़ा रह गया, जड़वत। पहली बार किसी ने उसकी आँखों में आँखें डालकर उसके ब्रह्मचर्य को, उसके अहंकार को चुनौती दी थी। वह अपमानित महसूस कर रहा था, लेकिन साथ ही... उत्तेजित भी। उसके मन में एक द्वंद्व छिड़ गया था। क्या उसे जाना चाहिए? क्या उसे उस स्त्री को गलत साबित करना चाहिए? या यह एक जाल है?

युवा मल्लनाग (स्वगत): वह मुझे अहंकारी कह गई? एक नगरवधू मुझे चुनौती देगी? मैं जाऊँगा। मैं उसकी सभा में जाऊँगा और सबके सामने उसके तर्कों का खंडन करूँगा। मैं उसे दिखाऊँगा कि सच्चा ज्ञान वैराग्य में है, भोग में नहीं।

सूत्रधार: मल्लनाग ने निर्णय तो ले लिया, लेकिन वह नहीं जानता था कि वह वसंतसेना की चुनौती स्वीकार करके उसी जाल में कदम रखने जा रहा है, जिससे बचने के लिए उसने गुरुकुल में बारह वर्ष बिताए थे। शाम ढल रही थी, और पाटलिपुत्र के दीप जलने वाले थे।

सूत्रधार: अगले भाग में... वसंतसेना की भव्य सभा, और मल्लनाग का पहला कदम उस दुनिया में जहाँ ज्ञान और काम का मिलन होता है। सुनिए... 'सूत्र: जीवन की कला'।

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