सृष्टि के प्रारम्भ में — ब्रह्मा और विष्णु — दोनों श्रेष्ठ देव — श्रेष्ठता के लिए विवाद में। तभी — एक अद्भुत प्रकटन। एक प्रचण्ड अग्नि-स्तम्भ — आकाश से पाताल तक। दोनों देव — स्तम्भ का अन्त खोजने निकलते हैं। पर — सहस्रों वर्ष — कोई अन्त नहीं। और — आख़िर — शिव-तत्त्व का प्रथम साक्षात्कार।
॥ नमः शिवाय रुद्राय शम्भवे च मयोभवे । लिङ्गरूपाय देवेश पुरुषाय परस्मै ॥
"हे महर्षियों! कल मैंने आपको कथा का आरम्भ सुनाया। आज — एक अद्भुत प्रसङ्ग।
"सृष्टि के प्रारम्भ की बात। एक कल्प-काल पहले। जब प्रकृति अव्यक्त थी। पुरुष अप्रकट। चारों ओर — एक अनादि शून्य।
"उस शून्य में — पहले — विष्णु प्रकट हुए। शेष-नाग की शय्या पर। योग-निद्रा में।
"फिर — विष्णु की नाभि से — एक कमल। उस कमल पर — ब्रह्मा।
"दो देव — एक तत्त्व से। दोनों — सृष्टि के लिए तैयार।
"पर — तभी — एक भयानक भूल।"
"ब्रह्मा ने — आँखें खोलीं। चारों ओर देखा। एक भी नहीं। बस — विष्णु।
"ब्रह्मा ने सोचा — 'मैं ही सर्व-श्रेष्ठ। मैं ही सब का स्रष्टा।'
"विष्णु ने भी आँखें खोलीं। ब्रह्मा को देखा।
"विष्णु ने सोचा — 'मेरी नाभि से तू निकला। मैं ही सर्व-श्रेष्ठ।'
"दोनों — मुख्य-मुख्य।
"विष्णु ने पहले बोला — 'ब्रह्मा! मेरी नाभि से तू पैदा हुआ। मैं तेरा पिता।'
"ब्रह्मा ने पलट जवाब — 'विष्णु! मैं — समस्त जगत् का स्रष्टा। मेरी प्रेरणा से सब। मैं — परम-तत्त्व।'
"'मैं!' — विष्णु बोले।
"'मैं!' — ब्रह्मा बोले।
"और — एक भयानक विवाद। दोनों देव — श्रेष्ठता के लिए — आमने-सामने।"
"विवाद बढ़ता गया। शब्द — फिर वाद-विवाद — फिर — गाली-गलौज।
"और — आख़िर — दोनों — अपने अस्त्र निकाले।
"विष्णु — अपना सुदर्शन चक्र।
"ब्रह्मा — अपना ब्रह्मास्त्र।
"दोनों — एक भयानक युद्ध को तैयार।
"पर — तभी — एक अद्भुत बात।
"दोनों के बीच — आकाश से पाताल तक — एक प्रचण्ड अग्नि-स्तम्भ प्रकट हुआ।
"न आदि। न अन्त।
"लाखों सूर्यों के समान तेजस्वी।
"उसकी ज्वालाएँ — आकाश को छेद रही थीं। उसकी जड़ें — पाताल में।
"दोनों देव — हड़बड़ा गए। अस्त्र छूट गए। मुँह खुला। आँखें बड़ी।
"'यह क्या है?'
"'यह कौन है?'"
"स्तम्भ से — एक अदृश्य आवाज़।
"'हे ब्रह्मा! हे विष्णु! तुम्हारा विवाद — मूर्खता है। तुम — दोनों — श्रेष्ठ नहीं। मैं — परम-तत्त्व — श्रेष्ठ।'
"'पर — एक चुनौती। यदि — तुम्हारे में से कोई — मेरा अन्त खोज सके — आदि या अन्त — तो वह श्रेष्ठ।'
"'जाओ। खोजो।'
"दोनों देव — एक पल — चुप।
"फिर — एक स्वर में — 'चलो! खोजेंगे!'
"विष्णु — एक वराह-रूप धारण किया। और — पाताल की ओर — खुदाई करते हुए — स्तम्भ की जड़ ढूँढ़ने।
"ब्रह्मा — एक हंस-रूप धारण किया। और — आकाश की ओर — उड़ते हुए — स्तम्भ का शीर्ष ढूँढ़ने।"
"महर्षियों! वो खोज — कोई साधारण नहीं। एक हज़ार वर्ष। दस हज़ार वर्ष। लाख वर्ष।
"विष्णु — पाताल में और गहरे। और गहरे। ज़मीन के नीचे — और नीचे। पर — स्तम्भ की जड़ कहीं नहीं। हर तरफ़ — बस — स्तम्भ की अग्नि।
"ब्रह्मा — आकाश में ऊपर। और ऊपर। बादलों के पार। ग्रहों के पार। तारों के पार। पर — स्तम्भ का शीर्ष कहीं नहीं। हर तरफ़ — बस — स्तम्भ की ज्वाला।
"दोनों — हज़ारों वर्ष — खोजते रहे। थक गए।
"पर — श्रेष्ठता का गर्व — हार नहीं मानने देता।"
"विष्णु — आख़िर — थक गए। उन्हें समझ आया — यह स्तम्भ — किसी साधारण देव का नहीं। यह — परम-तत्त्व का प्रकटन।
"उन्होंने वराह-रूप त्यागा। अपने मूल रूप में लौटे। पास में — एक कमल पर बैठे।
"हाथ जोड़कर — आँखें बंद। एक प्रार्थना —
"'हे परम-तत्त्व! मैं हार गया। मैं तेरा अन्त नहीं ढूँढ़ पाया। तू — तू मुझ से अनन्त-गुना श्रेष्ठ। मैं — एक छोटा देव। मेरा गर्व — एक मूर्खता।'
"'मुझे क्षमा कर। और — और — अपना दर्शन दे।'
"विष्णु की ईमानदार प्रार्थना सुनकर — परम-तत्त्व प्रसन्न हुआ।
"पर — विष्णु — अब — अपने स्थान पर लौटे। ऊपर। प्रतीक्षा।"
"उधर — ब्रह्मा — आकाश में — और भी ऊपर। पर — स्तम्भ का शीर्ष — कहीं नहीं।
"ब्रह्मा — हड़बड़ाए। 'अगर मैं — हार मान लूँ — तो विष्णु — श्रेष्ठ कहलाएगा। नहीं — मैं — मैं एक चालाकी करूँगा।'
"तभी — आकाश में — एक केतकी का फूल — हवा के साथ — गिर रहा था।
"ब्रह्मा ने उसे पकड़ा।
"फूल से पूछा — 'तू कहाँ से आया?'
"फूल ने कहा — 'मैं — स्तम्भ के शीर्ष से। शिव के मस्तक से।'
"ब्रह्मा की आँखों में — एक चालाक चमक।
"'तू — तू मेरी मदद कर। मैं — झूठ बोलूँगा कि मैंने स्तम्भ का शीर्ष देखा। तू — तू मेरी गवाही दे — कि — हाँ — मैंने देखा।'
"फूल — एक पल — सोचा। फिर — एक बेईमान फूल — हाँ कहा।"
"ब्रह्मा — फूल लेकर — पाताल वापस। जहाँ विष्णु — प्रतीक्षा में।
"'विष्णु! मैंने — मैंने स्तम्भ का शीर्ष देखा! मैं — श्रेष्ठ!'
"विष्णु — चौंके। 'क्या? सच में?'
"'हाँ! देख — यह केतकी का फूल। शीर्ष से लाया हूँ। यह गवाह।'
"फूल ने सिर हिलाया।
"विष्णु — एक पल — कुछ नहीं समझे। फिर — हाथ जोड़े। 'ब्रह्मा! तू श्रेष्ठ। मैं हार मानता।'
"पर — तभी — स्तम्भ से — एक भयानक गर्जना।
"'झूठ!'
"और — स्तम्भ से — एक तेजोमय रूप प्रकट हुआ।
"पाँच मुख। दस भुजाएँ। एक तीसरी आँख। चन्द्रमा मस्तक पर। गङ्गा बालों में। साँप गले में। हाथ में त्रिशूल।
"स्वयं भगवान् शिव।"
"शिव का तेज — दोनों देवों को — एक पल के लिए — अंधा कर दिया।
"आँखें खुली — दोनों देव — साष्टांग।
"शिव की आवाज़ — गहरी, प्रचण्ड —
"'विष्णु! तू — सच कहा। तू — ईमानदार। तेरा गर्व — मिटा। तू — मेरे प्रिय।'
"'ब्रह्मा! तू — झूठ बोला। तेरा गर्व — पाखण्डी। तू — एक भयानक पाप।'
"ब्रह्मा — काँपते हुए — 'प्रभो! क्षमा! मैं — मैं हार मान लेता।'
"पर शिव — एक प्रचण्ड क्रोध में।
"'ब्रह्मा! तेरा झूठ — एक भयानक दण्ड का पात्र।'
"'सुन — आज से — पृथ्वी पर — तेरी पूजा नहीं होगी। कोई मन्दिर — तेरा नहीं होगा। तेरी मूर्ति — कोई नहीं पूजेगा।'
"और — केतकी फूल की तरफ़ —
"'केतकी! तू — झूठी गवाह। आज से — तू — मेरी पूजा में — कभी नहीं चढ़ेगी। शिव-पूजा से — पूर्णतः वर्जित।'"
"महर्षियों! आज तक — पूरे भारत में — ब्रह्मा का — एक ही — एक मात्र मन्दिर। पुष्कर — राजस्थान में। वही — एकमात्र।
"और — केतकी का फूल — आज तक — किसी भी शिव-पूजा में — नहीं चढ़ता। चाहे कितना भी सुगन्धित। चाहे कितना भी सुन्दर।
"यह — शिव का — चार सौ करोड़ वर्ष पुराना — श्राप।"
"शिव — विष्णु की तरफ़ —
"'विष्णु! तू — मेरा प्रिय। तू — सत्य का पालन किया। तू — विनम्र हुआ।'
"'आज से — तू — सब का पालक। समस्त सृष्टि का। तेरी पूजा — सब जगह। हर मन्दिर में।'
"'और — एक विशेष वरदान। तू — मेरा अनन्य भक्त। और मैं — तेरा अनन्य भक्त।'
"'जो मुझ से प्यार करेगा — पर तुझ से नहीं — वह — मेरा सच्चा भक्त नहीं। और — जो तुझ से प्यार करेगा — पर मुझ से नहीं — वह — तेरा सच्चा भक्त नहीं।'
"'हम — दोनों — एक हैं। हरिहर। एक ही तत्त्व के — दो रूप।'"
"शिव ने आगे कहा —
"'विष्णु! एक प्रश्न।'
"'पूछिए।'
"'मेरा यह — अग्नि-स्तम्भ। मेरा यह — परम-तत्त्व का प्रथम प्रकटन। तू — इसे क्या नाम देगा?'
"विष्णु — एक पल — सोचे।
"फिर — हाथ जोड़कर — 'प्रभो! यह — आपका — चिह्न। आपकी — पहचान। मैं — इसे — लिङ्ग कहता हूँ। आपका — शिव-लिङ्ग।'
"शिव — प्रसन्न।
"'उत्तम नाम! आज से — मेरा यह स्तम्भ — शिव-लिङ्ग। मेरे भक्त — इस लिङ्ग की पूजा — मेरी पूजा के रूप में करेंगे।'
"'जल का अभिषेक — मुझे प्रिय। बेलपत्र — मेरा प्रिय पत्र। 'ॐ नमः शिवाय' — मेरा प्रिय मन्त्र।'
"'जो — सरल भाव से — एक लिङ्ग पर — एक लोटा जल चढ़ाए — वह — मेरा प्रिय भक्त।'"
"महर्षियों! इस प्रसङ्ग के बाद — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-लिङ्ग की पूजा प्रारम्भ हुई।
"देवता — असुर — मनुष्य — पशु — पक्षी — सभी ने — शिव-लिङ्ग की पूजा की।
"राम ने — रामेश्वरम् में — एक लिङ्ग स्थापित किया। रावण-वध से पहले।
"कृष्ण ने — द्वारका में — एक लिङ्ग की पूजा की।
"युधिष्ठिर ने — कुरुक्षेत्र-युद्ध से पहले — शिव की प्रार्थना की।
"और — तब से — आज तक — सम्पूर्ण भारत में — असंख्य शिव-मन्दिर। हर गाँव — एक शिव-लिङ्ग। हर घर — एक शिव-भक्त।
"यह सब — उस — एक — पहले प्रकटन से।"
"शिव-लिङ्ग के तीन भाग —
१. नीचे का चौकोर भाग — ब्रह्मा का स्थान। चार दिशाओं का प्रतीक।
२. मध्य का अष्टकोणीय भाग — विष्णु का स्थान। आठ दिशाओं का प्रतीक।
३. ऊपर का गोल भाग — रुद्र का स्थान। आकाश और परम का प्रतीक।
"त्रिमूर्ति — एक ही लिङ्ग में।
"और — पीठ — योनि-पीठ — प्रकृति का प्रतीक। पुरुष और प्रकृति — दोनों का सङ्गम।
"यही सम्पूर्ण सृष्टि का — मूल।
"शिव-लिङ्ग की पूजा — असल में — सम्पूर्ण सृष्टि की पूजा।
"और — परम-तत्त्व की — आराधना।"
"शिव — उस दिन — दोनों देवों को — पाँच कृपा दी —
"और — फिर — शिव — अदृश्य।
"दोनों देव — अपने स्थान पर। ब्रह्मा — पश्चाताप में। विष्णु — कृतज्ञता में।
"और — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-लिङ्ग का पहला आकार।"
सूत-मुनि की कथा रुकी।
नैमिषारण्य के अट्ठासी हज़ार ऋषि — सब — मौन।
शौनक — एक हल्की मुस्कान।
"हे सूत-मुनि! कितनी अद्भुत कथा। शिव — परम-तत्त्व। उनका लिङ्ग — सम्पूर्ण सृष्टि का प्रतीक।
"क्या — आगे — और भी कथाएँ?"
सूत-मुनि — मुस्कुराए।
"बहुत। बहुत। आगे — सती की कथा। फिर — पार्वती। फिर — कार्तिकेय और गणेश। फिर — द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग। फिर — शिव-योग। फिर — मुक्ति का मार्ग।
"पर — आज — इतना ही। मेरी आत्मा — एक छोटी सी थकान।"
ऋषियों ने — साष्टांग प्रणाम। सूत-मुनि को विदा किया।
और — कल — अगली कथा।
॥ इति श्री शिवपुराणे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
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