लिङ्ग-प्रकटन के बाद ब्रह्मा और विष्णु शिव से सृष्टि का रहस्य पूछते हैं। शिव — पाँच मुख से — पाँच महाभूतों के तत्त्व प्रकट करते हैं। पञ्चभूत, पञ्चकोश, पञ्चदशा, पञ्चकर्म, पञ्चायतन — शिव-तत्त्व का सम्पूर्ण विज्ञान। और — एक रहस्य — कि शिव और शक्ति — दो नहीं — एक हैं।
॥ पञ्चभूतात्मकं विश्वं पञ्चब्रह्मात्मकं सदा । शिवं तं प्रणमामो वै परं तत्त्वमयं विभुम् ॥
"महर्षियों! कल मैंने तुम्हें — लिङ्ग-प्रकटन की कथा सुनाई। आज — एक और गहरा रहस्य।
"लिङ्ग-प्रकटन के बाद — ब्रह्मा और विष्णु — शिव के चरणों में — हाथ जोड़े।
"दोनों ने एक स्वर में — 'प्रभो! एक — एक प्रश्न।'
"शिव ने हँसकर — 'पूछो।'
"विष्णु ने पूछा — 'प्रभो! सृष्टि का रहस्य क्या? यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कैसे चलता? आप — परम-तत्त्व — हम पर — क्यों कृपा?'
"शिव — एक पल — सोचे।
"फिर — एक मीठी मुस्कान।
"'सुनो — मैं तुम्हें — सम्पूर्ण शिव-तत्त्व — विस्तार से समझाता हूँ। यह — विद्येश्वर-संहिता का — मूल विषय।'"
"शिव ने अपने पाँच मुख — एक-एक करके — दिखाए।
"१. ईशान मुख — आकाश की ओर। सर्व-व्यापक। निर्गुण-निराकार।
२. तत्पुरुष मुख — पूर्व की ओर। योग, ध्यान। आत्मा का स्थान।
३. अघोर मुख — दक्षिण की ओर। संहार। अग्नि का स्थान।
४. वामदेव मुख — उत्तर की ओर। पालन। जल का स्थान।
५. सद्योजात मुख — पश्चिम की ओर। सृष्टि। पृथ्वी का स्थान।
"पाँच मुख — पाँच महाभूत — पाँच तत्त्व — पाँच ब्रह्म।
"मेरा हर मुख — एक तत्त्व का प्रतिनिधि। मेरा सम्पूर्ण रूप — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब।'"
"शिव ने आगे — सृष्टि के पाँच महाभूत समझाए।
"१. आकाश — शून्य। अनन्त। पहला तत्त्व।
२. वायु — गति। आकाश से उत्पन्न।
३. अग्नि — ऊष्मा। वायु से।
४. जल — द्रवता। अग्नि से।
५. पृथ्वी — स्थिरता। जल से।
"पाँच महाभूतों से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बना।
"और — पाँच महाभूत — मेरे पाँच मुखों से — प्रकट।
"मेरे आकाश-तत्त्व से — आकाश। मेरे वायु-तत्त्व से — वायु। और इसी प्रकार।
"पर — एक रहस्य — मैं — इन पाँचों के पार। मैं — परम। मैं — षष्ठ-तत्त्व। चित्-तत्त्व।
"पाँच महाभूत — मेरा शरीर। चित् — मेरी आत्मा।
"पर मेरी आत्मा — सब में व्याप्त।'"
"शिव ने आगे — मनुष्य के पाँच कोश समझाए।
"१. अन्नमय कोश — स्थूल शरीर। अन्न से बना।
२. प्राणमय कोश — प्राण-शक्ति।
३. मनोमय कोश — मन।
४. विज्ञानमय कोश — बुद्धि।
५. आनन्दमय कोश — आनन्द।
"और इन पाँचों के पार — आत्मा। मेरा रूप।
"साधक — पाँचों कोश को — एक-एक करके — पार करे। और — आत्मा तक पहुँचे। यही — मोक्ष।'"
"मनुष्य की चेतना — पाँच अवस्थाओं में —
"१. जाग्रत — जागरण।
२. स्वप्न — सपने।
३. सुषुप्ति — गहरी निद्रा।
४. तुरीय — समाधि।
५. तुरीयातीत — परम।
"पाँचों के पार — मेरा निवास।
"साधक — पाँच अवस्थाओं को — पार करे। और — मुझ में लीन हो।"
"मेरे पाँच कर्म —
"१. सृष्टि — रचना।
२. स्थिति — पालन।
३. संहार — विनाश।
४. तिरोधान — आवरण। माया।
५. अनुग्रह — कृपा। मुक्ति।
"पाँच कर्म — मेरे पाँच मुख। मेरा पञ्चकृत्य।
"और — पञ्चायतन — पाँच मुख्य देव — एक साथ पूजे जाते। शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य, देवी।
"पाँच — एक ही परम-तत्त्व के — पाँच रूप।'"
"शिव ने आगे — एक गहरा रहस्य प्रकट किया।
"'विष्णु! ब्रह्मा! एक रहस्य सुनो।'
"'मैं — शिव — अकेला नहीं। मेरे साथ — सदा — मेरी शक्ति। उसका नाम — पार्वती। पर — वह — कोई पत्नी नहीं — मेरी ही — आधी आत्मा।'
"'शिव और शक्ति — दो नहीं — एक हैं। मैं — अर्धनारीश्वर। आधा शिव। आधा शक्ति।'
"'जैसे — आग और उसकी ऊष्मा — अलग नहीं। जैसे — सूर्य और उसकी किरणें — अलग नहीं। वैसे — शिव और शक्ति — अलग नहीं।'
"'जो — मेरी पूजा करे — पर शक्ति की नहीं — वह — अधूरा भक्त। जो — शक्ति की पूजा करे — पर मेरी नहीं — वह — अधूरा।'
"'दोनों एक साथ। तभी पूर्ण।'"
"शिव — यह कहते-कहते — अपना रूप बदला।
"उनका — आधा शरीर — पुरुष-स्वरूप। दूसरा आधा — स्त्री-स्वरूप।
"दाहिना भाग — शिव। बायाँ — शक्ति।
"दाहिने हाथ में — त्रिशूल। बायें में — कमल।
"दाहिने पाँव में — व्याघ्र-चर्म। बायें में — रेशमी पट्टी।
"दाहिनी जटा — रौद्र। बायीं — सलीक़े से बँधी।
"अर्धनारीश्वर।
"दोनों देव — मुग्ध — देखते रहे।
"विष्णु — हाथ जोड़े। 'प्रभो! क्या यह — आपका असली रूप?'
"शिव-शक्ति — एक स्वर में — 'हाँ। यह असली रूप। पुरुष और प्रकृति। शिव और शक्ति। दो — एक में।'"
"शिव-शक्ति ने आगे कहा —
"'सुनो — एक और रहस्य। मेरी शक्ति — पार्वती — आगे कई जन्म लेगी। पहले — सती। फिर — पार्वती। फिर — दुर्गा। फिर — काली।'
"'हर रूप — मेरा अनुग्रह। हर रूप — सृष्टि के एक विशेष कार्य के लिए।'
"'सती — दक्ष की पुत्री। मेरी पहली पत्नी। पर — एक यज्ञ में — देह त्यागेगी।'
"'फिर — पार्वती — हिमालय की पुत्री। उसकी तपस्या मुझे जीतेगी।'
"'फिर — दुर्गा — महिषासुर का संहार करेगी।'
"'फिर — काली — सम्पूर्ण अधर्म का संहार।'
"'पर — सब रूप — एक ही शक्ति। और — मेरे साथ — हमेशा।'"
"शिव ने ब्रह्मा-विष्णु को — आगे की लीलाओं की झलक दी।
"'ब्रह्मा! एक मानस-पुत्र — दक्ष — तू पैदा करेगा। उसकी एक पुत्री — सती — मेरी पत्नी होगी।'
"'पर — दक्ष — अपने अहंकार में — एक यज्ञ करेगा। और — मेरा अपमान करेगा। तब — सती — योग-अग्नि से — देह त्यागेगी।'
"'मेरा क्रोध — एक भयानक। मेरे रौद्र-रूप से — वीरभद्र पैदा होगा। दक्ष-यज्ञ का सम्पूर्ण नाश।'
"'फिर — सती — पार्वती के रूप में — फिर जन्मेगी। हिमालय की पुत्री। मेरी प्राप्ति के लिए — कठोर तपस्या। और — आख़िर — मेरी पत्नी।'
"'और — हम दोनों के बच्चे — कार्तिकेय और गणेश। दोनों — सृष्टि के विशेष पुत्र।'
"'यह सब — आगे होगा।'"
"विष्णु ने एक और प्रश्न।
"'प्रभो! क्या — आप — कभी — पृथ्वी पर अवतार लेते?'
"शिव — हँसे।
"'विष्णु! तू — अवतार लेगा। दश अवतार। मत्स्य से कल्कि तक।'
"'पर मैं — मेरे अवतार — कुछ अलग। मैं — रौद्र-स्वरूप में — विशेष कार्य के लिए — कुछ बार।'
"'पर — एक विशेष — हनुमान। तू उन्हें जानता है? मेरा एक अंश। राम के साथ — मेरी एक लीला।'
"'और — पाँच महान् रुद्र। एकादश रुद्र। हर एक — सृष्टि के विशेष कार्य के लिए।'
"'और — दुर्वासा-ऋषि भी — मेरा एक अंश।'
"'पर — मूल रूप में — मैं कैलास पर। मेरी पत्नी पार्वती के साथ। मेरे पुत्र — कार्तिकेय और गणेश।'
"'और — कैलास से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर — मेरी कृपा।'"
"शिव ने अंत में — एक भक्ति-सूत्र दिया।
"'विष्णु! ब्रह्मा! मेरी पूजा कैसे करें — यह सरल है।'
"'पाँच चीज़ें — पर्याप्त।'
"'१. एक लोटा जल। शुद्ध। शिव-लिङ्ग पर अभिषेक।'
"'२. एक बेलपत्र। तीन-दलीय। मेरे लिए सबसे प्रिय।'
"'३. एक दीप। शुद्ध घृत का। एक सुगन्ध।'
"'४. एक मन्त्र। ॐ नमः शिवाय। पाँच अक्षर।'
"'५. एक प्रणाम। हृदय से।'
"'इतना ही। पाँच चीज़ें। और — मैं प्रसन्न।'
"'मेरे लिए — महल नहीं। यज्ञ नहीं। हीरे नहीं। बस — एक भक्त का — एक प्रेम। एक श्रद्धा।'
"'जो — सरल भाव से — एक लोटा जल — एक बेलपत्र — एक 'ॐ नमः शिवाय' — चढ़ाए — वह मेरा परम भक्त।'"
"शिव ने पाँच महान् मन्त्र भी सिखाए।
"'१. ॐ नमः शिवाय।' — पञ्चाक्षर मन्त्र। सर्व-दैनिक।
"'२. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...' — महामृत्युञ्जय मन्त्र। मृत्यु-निवारण।
"'३. नमस्ते अस्तु भगवन् विश्वेश्वराय।' — रुद्राष्टाध्यायी।
"'४. नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्।' — रुद्राष्टकम्।
"'५. हर हर महादेव!' — सर्व-दैनिक उद्घोष।
"'इन पाँच मन्त्रों में — मेरी सम्पूर्ण शक्ति।'
"'जो — श्रद्धा से — इनका जप करे — वह — मेरी कृपा का अधिकारी।'"
"शिव ने अन्त में — एक वरदान दिया।
"'विष्णु! ब्रह्मा! आज से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-तत्त्व का प्रचार करो।'
"'मेरे लिङ्ग की पूजा। मेरी कथा। मेरे मन्त्र। मेरी भक्ति।'
"'जो — मेरी भक्ति में — डूब जाए — उसे — मैं — मुक्ति देता हूँ।'
"'मेरी भक्ति में — कोई जाति नहीं। कोई वर्ग नहीं। कोई धर्म नहीं। बस — एक हृदय। एक श्रद्धा।'
"'भोले-भाले को मैं — सरलता से प्रसन्न होता। इसीलिए — मेरा एक नाम — भोलेनाथ।'
"'जाओ — विश्व में — मेरे नाम का प्रचार करो।'
"और — शिव — अदृश्य।
"दोनों देव — हाथ जोड़े। एक नई समझ के साथ।
"और — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-तत्त्व का प्रचार।"
"महर्षियों! इस अध्याय का सार —
"अगले अध्याय में — सती की उत्पत्ति की कथा। दक्ष — ब्रह्मा का मानस-पुत्र। उसकी पुत्री — सती — कैसे शिव की पत्नी हुई।
"पर — आज — इतना ही।"
॥ इति श्री शिवपुराणे तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
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