नैमिषारण्य के पवित्र वन में अट्ठासी हज़ार ऋषियों की एक भव्य सभा। सूत-मुनि का आगमन। और एक अनादि प्रश्न — कलियुग के मनुष्यों का कल्याण कैसे हो? इसी प्रश्न के उत्तर में प्रकट होती है — शिव-पुराण की दिव्य कथा।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
नमामि शम्भुं पुरुषं पुराणं नमामि सर्वज्ञमनन्तरूपम् ।
नमामि रुद्रं प्रभुमक्षयं तं नमामि शर्वं शिरसा मुनीन्द्रम् ॥
कई कल्पों पहले की बात है। नैमिषारण्य — एक ऐसा पवित्र वन जहाँ देवता स्वयं उतरकर ऋषियों के तपोमय जीवन को देखते थे। उस वन की सीमाओं में चक्र-तीर्थ नामक एक अद्भुत स्थान था — जहाँ ब्रह्मा का सृजन-चक्र स्थिर हो गया था। उसी चक्र-तीर्थ के समीप — एक विशाल यज्ञ-वेदी पर — अट्ठासी हज़ार ऋषि एकत्र हुए थे।
वे साधारण ऋषि नहीं थे। शौनक, ऋष्यशृङ्ग, वसिष्ठ-वंश के अनेक ब्रह्मवादी, भृगु-कुल के तपस्वी, अंगिरस-वंश के मन्त्र-द्रष्टा — सब एकत्र। उन्होंने एक हज़ार वर्षों का दीर्घ-सत्र नामक यज्ञ आरम्भ किया था। दिन-रात अग्नि प्रज्वलित। दिन-रात मन्त्र-घोष। दिन-रात आहुतियाँ।
पर — एक रहस्य था। यह यज्ञ केवल अग्नि के लिए नहीं था। यह यज्ञ था एक भयानक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए।
शौनक-ऋषि ने एक रात्रि सभा बुलाई। उन्होंने कहा —
"भाइयों! हम तपस्या कर रहे हैं। हम यज्ञ कर रहे हैं। हम वेद पढ़ते हैं। हम मन्त्र जपते हैं। पर — पर एक चिन्ता मेरे हृदय को कुरेद रही है।"
"क्या?" — सब ने पूछा।
"भाइयों! कलियुग आने को है। और कलियुग में मनुष्य की आयु क्षीण होगी। उसका तेज क्षीण होगा। उसका धैर्य क्षीण होगा। वह दीर्घ तपस्या नहीं कर सकेगा। वह दीर्घ यज्ञ नहीं कर सकेगा। वह सहस्र-नाम-जप नहीं कर सकेगा।"
"तो — तो उस कलियुग के दीन-हीन मनुष्य का कल्याण कैसे होगा? वह मोक्ष कैसे पाएगा? कौन-सा सरल मार्ग — उसके लिए — हम सोचें?"
सभा में मौन छा गया। हर ऋषि — गहरी सोच में।
तभी — दूर से — रथ की एक हल्की ध्वनि।
एक रथ — सादगी से सजा हुआ — द्वार पर रुका। उसमें से एक तेजस्वी पुरुष उतरा। श्वेत वस्त्र। माथे पर त्रिपुण्ड्र। हाथ में पुराण-ग्रन्थ। आँखों में अनादि ज्ञान की चमक।
"वह — वह तो स्वयं सूत-मुनि हैं!" — किसी ने पहचाना।
सूत-मुनि — वेदव्यास के प्रिय शिष्य। पुराणों के एकमात्र संरक्षक। वही जो अठारह पुराणों का रहस्य अपने हृदय में छिपाए हुए थे।
ऋषियों ने उठकर साष्टांग प्रणाम किया। सूत-मुनि ने प्रत्युत्तर में आशीर्वाद दिया।
शौनक ने हाथ जोड़कर कहा — "हे सूत-मुनि! आपका आगमन सम्भवतः केवल संयोग नहीं। हमारे प्रश्न का उत्तर देने के लिए ही — स्वयं भगवान् ने आपको भेजा है।"
"क्या प्रश्न?" — सूत-मुनि ने पूछा।
शौनक ने अपनी चिन्ता दोहराई। कलियुग के मनुष्य का कल्याण कैसे हो? सरल मार्ग कौन-सा?
सूत-मुनि एक पल — मौन। फिर — एक मधुर हास्य। फिर — गद्गद कण्ठ से।
"महर्षियों! आज तुम्हारा भाग्य खुला। आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाऊँगा जो स्वयं भगवान् वेदव्यास ने मुझे सौंपी थी। यह कथा — कलियुग के दीन-दुखी मनुष्य का परम सहारा है। यह कथा — स्वयं भगवान् शिव की महिमा है। इसे — शिव-पुराण कहते हैं।"
"महर्षियों! सुनो ध्यान से। शिव-पुराण कोई साधारण ग्रन्थ नहीं। यह स्वयं शिव की वाणी है। यह स्वयं शिव की कथा है।"
"इस पुराण में चौबीस हज़ार श्लोक हैं। सात संहिताएँ हैं — विद्येश्वर-संहिता, रुद्र-संहिता, शतरुद्र-संहिता, कोटिरुद्र-संहिता, उमा-संहिता, कैलास-संहिता, और वायवीय-संहिता।"
"इन सात संहिताओं में — शिव की उत्पत्ति, उनके अवतार, उनकी लीलाएँ, सती और पार्वती की कथाएँ, कार्तिकेय और गणेश की उत्पत्ति, द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग, अष्टोत्तर-शत-नाम, मन्त्र-जप, ध्यान, योग, और मुक्ति का सम्पूर्ण विधान — सब समाहित है।"
"पर मुख्य बात यह — कि इस पुराण के पाठ-श्रवण मात्र से मनुष्य की दीर्घ तपस्या और यज्ञ का फल मिल जाता है। कलियुग के लिए यह — परम कृपा।"
"'कलौ नामैव केवलम्' — कलियुग में केवल नाम-स्मरण ही पर्याप्त। और — शिव-नाम जैसा सरल और शक्तिशाली नाम — और कोई नहीं।"
सूत-मुनि ने आगे कहा — "शिव-पुराण की उत्पत्ति की भी एक कथा है। मैं वह सुनाता हूँ।"
"बहुत समय पहले — एक चन्द्रशर्मा नाम का ब्राह्मण था। वह अति-दुर्बल। अति-निर्धन। बीमारियों से ग्रस्त। उसकी पत्नी पीठ-पीछे कुटिल थी। उसका पुत्र अहंकारी। उसका जीवन — एक नरक।"
"एक दिन वह आत्म-हत्या करने जा रहा था। पर — रास्ते में — उसे एक तपस्वी मिले। तपस्वी ने पूछा — 'पुत्र! क्यों इतना दुखी?'"
"चन्द्रशर्मा ने सब बताया। तपस्वी ने उसे — एक उपाय बताया। 'जा — सरस्वती-तट पर। वहाँ शिव-पुराण की कथा हो रही है। एक मास तक सुन। तेरा सब दुख मिटेगा।'"
"चन्द्रशर्मा ने वैसा ही किया। एक मास तक — दिन-रात — शिव-पुराण की कथा सुनी। और — आश्चर्य! — एक मास के अन्त में उसका शरीर तेजोमय हो गया। उसकी पत्नी सात्त्विक हो गई। उसका पुत्र विनम्र हो गया।"
"और तीन वर्ष बाद — चन्द्रशर्मा शरीर त्यागकर सीधे शिव-लोक चला गया।"
"यह है शिव-पुराण की महिमा। पाठ-श्रवण मात्र से जीवन और परलोक — दोनों सुधर जाते हैं।"
शौनक और अन्य ऋषि अब बेसब्र थे। हाथ जोड़कर सब ने एक स्वर में कहा —
"हे सूत-मुनि! देर न करें। प्रारम्भ करें इस दिव्य कथा को। हमारा हृदय व्याकुल है इसे सुनने के लिए। अट्ठासी हज़ार ऋषि — आपके चरणों में — एक मास तक — आपकी कथा सुनेंगे। आरम्भ करें।"
सूत-मुनि ने आँखें बंद कीं। एक छोटी प्रार्थना — गुरु वेदव्यास को। फिर भगवान् शिव को। फिर — आँखें खोलीं।
"ॐ नमो भगवते रुद्राय!" — उन्होंने उद्घोष किया। और कथा का आरम्भ हुआ।
"महर्षियों! शिव-पुराण की सात संहिताओं का संक्षिप्त परिचय यहीं दे देता हूँ —
१. विद्येश्वर-संहिता — शिव-तत्त्व, लिङ्ग का माहात्म्य, ब्रह्मा-विष्णु का गर्व-भञ्जन, शिव-भक्ति का दर्शन।
२. रुद्र-संहिता — शिव की लीलाएँ। पाँच उप-खण्ड — सृष्टि-खण्ड, सती-खण्ड, पार्वती-खण्ड, कुमार-खण्ड, युद्ध-खण्ड। सबसे बड़ी संहिता।
३. शतरुद्र-संहिता — शिव के एक सौ रुद्र-स्वरूप।
४. कोटिरुद्र-संहिता — द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग और अनेक तीर्थ।
५. उमा-संहिता — पार्वती-सम्बन्धी विशेष कथाएँ, स्त्री-धर्म, गृहस्थ-धर्म।
६. कैलास-संहिता — कैलास-वर्णन, अधिकमास-व्रत, ज्ञान-काण्ड।
७. वायवीय-संहिता — वायुदेव द्वारा कथित। शिव का सर्वोपरि-त्व।
"इन सब का सार — मैं तुम्हें — आगे के अध्यायों में — एक-एक करके सुनाऊँगा। आज — इस प्रथम अध्याय में — केवल शिव की महिमा का संक्षिप्त परिचय।"
"महर्षियों! शिव कौन है? यह प्रश्न सरल लगता है — पर इसका उत्तर अनन्त है।
"शिव — एक नाम नहीं — एक तत्त्व। शिव — एक देव नहीं — एक अवस्था। शिव — एक रूप नहीं — एक स्वरूप।
"'शिव' शब्द का अर्थ है — कल्याणकारी। मङ्गलमय। वह जो जीव को मुक्ति की ओर ले जाए।
"शिव के अनेक नाम हैं — रुद्र, शम्भू, महादेव, शङ्कर, ईश, ईशान, भोलेनाथ, गिरीश, कैलासपति, गङ्गाधर, चन्द्रशेखर, नीलकण्ठ, त्र्यम्बक, पञ्चानन, पशुपति, औघड़, मृत्युञ्जय।
"प्रत्येक नाम — एक स्वरूप का। प्रत्येक नाम — एक लीला का।
"पर सभी नामों के पीछे — एक ही — परम तत्त्व। निर्गुण, निराकार, अनादि, अनन्त — परब्रह्म।
"और इसी परम-तत्त्व को — हमारे ऋषियों ने — साकार रूप में — पूज्य बनाया। ताकि साधारण भक्त — एक रूप में ध्यान कर सकें। एक नाम पुकार सकें। एक मूर्ति की सेवा कर सकें।"
"शिव की पूजा का सबसे प्रमुख स्वरूप है — शिव-लिङ्ग।
"लिङ्ग शब्द से लोग कभी-कभी ग़लत समझ लेते हैं। पर — संस्कृत में — 'लिङ्ग' का अर्थ है — चिह्न, प्रतीक, सङ्केत।
"शिव-लिङ्ग का अर्थ — शिव का प्रतीक। एक — एक — गोल शीर्ष वाला पाषाण-स्तम्भ। नीचे एक चौकोर पीठ — योनि-पीठ — जो प्रकृति का प्रतीक।
"पुरुष और प्रकृति — शिव और शक्ति — दोनों का सङ्गम। यही सम्पूर्ण सृष्टि का — मूल।
"लिङ्ग कोई शरीर का अंग नहीं — यह — परम-तत्त्व का प्रतीक। निर्गुण को — सगुण रूप में — पूजने का — एक सरल साधन।
"विद्येश्वर-संहिता में — विस्तार से — लिङ्ग की उत्पत्ति की कथा है। ब्रह्मा-विष्णु-विवाद। एक अग्नि-स्तम्भ। उसका न आदि न अन्त। यही पहला शिव-लिङ्ग। उसी की कथा — अगले अध्याय में।"
"महर्षियों! शिव की कुछ प्रमुख लीलाएँ — जिनकी कथा आगे आएगी —
"और भी अनगिनत लीलाएँ — जिनमें भक्तों के प्रति शिव की अपार कृपा प्रकट होती है।"
"शिव की एक विशेषता — सब देवों से अद्वितीय। शिव — सबसे अधिक भक्तवत्सल। थोड़ी-सी भक्ति देखकर भी — जल का एक लोटा। एक बेलपत्र। एक 'ॐ नमः शिवाय' का जप।
"और — अपने भक्तों के लिए — शिव — कोई भी रूप ले लेते हैं। एक भिखारी। एक सन्न्यासी। एक डाकू। एक ब्राह्मण। एक अछूत।
"उन्हें — कोई जाति, कोई धर्म, कोई वर्ग — का भेद नहीं। सब उनके सम्मुख समान। सब उनके भक्त हो सकते हैं।
"इसीलिए — शिव को — 'भोलेनाथ' कहा जाता है। भोला = सरल। शिव — सरलता से प्रसन्न होने वाले।
"पर — साथ ही — शिव — सबसे प्रचण्ड भी। उनका रौद्र-रूप — अधर्मियों के लिए — काल। जब — सहस्र-वर्षीय अधर्म एकत्र हो — तो शिव — एक तीसरी आँख से — सब भस्म कर देते हैं।"
सूत-मुनि ने अपनी कथा का प्रथम भाग समाप्त किया। ऋषि — सब — मुग्ध — सुन रहे थे।
शौनक ने हाथ जोड़कर कहा — "हे सूत-मुनि! कितना अद्भुत आरम्भ! आगे का — हम — श्रद्धा से — सुनेंगे।"
सूत-मुनि ने सिर हिलाया। "महर्षियों! एक मास का सत्र। मैं — एक-एक संहिता का सार — एक-एक लीला की कथा — विस्तार से सुनाऊँगा। पर — एक प्रतिज्ञा।
"प्रत्येक दिन — श्रोताओं को — श्रद्धा से सुनना है। चित्त एकाग्र। मन शान्त। हृदय में शिव।
"और — पाठ के अन्त में — सब को — कुछ दान करना है। ब्राह्मणों को भोजन। गायों को चारा। पक्षियों को दाना।
"इस प्रकार — पुराण-श्रवण का पूर्ण फल मिलेगा।"
सब ऋषियों ने एक स्वर में हाँ कहा।
आकाश में — शिव की कृपा — मानो — एक हल्की पुष्प-वृष्टि।
"महर्षियों! कल — मैं तुम्हें — एक अद्भुत कथा सुनाऊँगा।
"ब्रह्मा और विष्णु — दोनों — श्रेष्ठता के लिए — एक भयानक विवाद में। 'मैं श्रेष्ठ!' — दोनों कहते। 'मैं सब का स्रष्टा!'
"और — उसी विवाद के बीच — एक अद्भुत प्रकटन। एक तेजोमय अग्नि-स्तम्भ। न आदि — न अन्त।
"दोनों — अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने को — एक ऊपर, एक नीचे — स्तम्भ का अन्त ढूँढ़ने जाते हैं।
"और — फिर — एक भयानक रहस्य। शिव-तत्त्व का प्रथम साक्षात्कार।
"वही कथा — शिव-पुराण का असली आरम्भ — कल।"
॥ इति श्री शिवपुराणे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥
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