1 १. नैमिषारण्य का वह अद्भुत आरम्भ FREE 2 २. ब्रह्मा-विष्णु का गर्व और लिङ्ग का प्रकटन FREE 3 ३. शिव-तत्त्व और सृष्टि का रहस्य FREE 4 ४. सती का जन्म FREE 5 ५. दक्ष-यज्ञ और सती का देह-त्याग FREE 6 ६. पार्वती का जन्म और बाल-काल FREE 7 ७. कामदेव का दहन FREE 8 ८. शिव-पार्वती का विवाह FREE 9 ९. कार्तिकेय का जन्म FREE 10 १०. गणेश का जन्म और हाथी का सिर FREE 11 ११. त्रिपुरासुर का संहार FREE 12 १२. द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग का परिचय FREE 13 १३. शिव के एक सौ नाम FREE 14 १४. नटराज और शिव-ताण्डव FREE 15 १५. मार्कण्डेय और महामृत्युञ्जय FREE 16 १६. दैनिक शिव-पूजा का विधान FREE 17 १७. शिव-मन्त्र-शास्त्र FREE 18 १८. शिव और योग FREE 19 १९. शिव और वेदान्त FREE 20 २०. बिल्व-वृक्ष और नंदी FREE 21 २१. समुद्र-मन्थन और हलाहल-पान FREE 22 २२. कैलास और शिव का परम-धाम FREE 23 २३. शिव और गङ्गा FREE 24 २४. शिव की कुछ विशेष कथाएँ FREE 25 २५. उमा-संहिता और स्त्री-धर्म FREE 26 २६. कैलास-संहिता और आत्म-ज्ञान FREE 27 २७. वायवीय-संहिता FREE 28 २८. शिव के विशेष व्रत FREE 29 २९. शिव के विशेष तीर्थ FREE 30 ३०. फलश्रुति और उपसंहार FREE
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३. शिव-तत्त्व और सृष्टि का रहस्य

F
Funtel
27 Apr 2026

लिङ्ग-प्रकटन के बाद ब्रह्मा और विष्णु शिव से सृष्टि का रहस्य पूछते हैं। शिव — पाँच मुख से — पाँच महाभूतों के तत्त्व प्रकट करते हैं। पञ्चभूत, पञ्चकोश, पञ्चदशा, पञ्चकर्म, पञ्चायतन — शिव-तत्त्व का सम्पूर्ण विज्ञान। और — एक रहस्य — कि शिव और शक्ति — दो नहीं — एक हैं।

॥ पञ्चभूतात्मकं विश्वं पञ्चब्रह्मात्मकं सदा । शिवं तं प्रणमामो वै परं तत्त्वमयं विभुम् ॥

"महर्षियों! कल मैंने तुम्हें — लिङ्ग-प्रकटन की कथा सुनाई। आज — एक और गहरा रहस्य।

"लिङ्ग-प्रकटन के बाद — ब्रह्मा और विष्णु — शिव के चरणों में — हाथ जोड़े।

"दोनों ने एक स्वर में — 'प्रभो! एक — एक प्रश्न।'

"शिव ने हँसकर — 'पूछो।'

"विष्णु ने पूछा — 'प्रभो! सृष्टि का रहस्य क्या? यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कैसे चलता? आप — परम-तत्त्व — हम पर — क्यों कृपा?'

"शिव — एक पल — सोचे।

"फिर — एक मीठी मुस्कान।

"'सुनो — मैं तुम्हें — सम्पूर्ण शिव-तत्त्व — विस्तार से समझाता हूँ। यह — विद्येश्वर-संहिता का — मूल विषय।'"

"शिव ने अपने पाँच मुख — एक-एक करके — दिखाए।

"१. ईशान मुख — आकाश की ओर। सर्व-व्यापक। निर्गुण-निराकार।

२. तत्पुरुष मुख — पूर्व की ओर। योग, ध्यान। आत्मा का स्थान।

३. अघोर मुख — दक्षिण की ओर। संहार। अग्नि का स्थान।

४. वामदेव मुख — उत्तर की ओर। पालन। जल का स्थान।

५. सद्योजात मुख — पश्चिम की ओर। सृष्टि। पृथ्वी का स्थान।

"पाँच मुख — पाँच महाभूत — पाँच तत्त्व — पाँच ब्रह्म।

"मेरा हर मुख — एक तत्त्व का प्रतिनिधि। मेरा सम्पूर्ण रूप — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब।'"

"शिव ने आगे — सृष्टि के पाँच महाभूत समझाए।

"१. आकाश — शून्य। अनन्त। पहला तत्त्व।

२. वायु — गति। आकाश से उत्पन्न।

३. अग्नि — ऊष्मा। वायु से।

४. जल — द्रवता। अग्नि से।

५. पृथ्वी — स्थिरता। जल से।

"पाँच महाभूतों से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बना।

"और — पाँच महाभूत — मेरे पाँच मुखों से — प्रकट।

"मेरे आकाश-तत्त्व से — आकाश। मेरे वायु-तत्त्व से — वायु। और इसी प्रकार।

"पर — एक रहस्य — मैं — इन पाँचों के पार। मैं — परम। मैं — षष्ठ-तत्त्व। चित्-तत्त्व।

"पाँच महाभूत — मेरा शरीर। चित् — मेरी आत्मा।

"पर मेरी आत्मा — सब में व्याप्त।'"

"शिव ने आगे — मनुष्य के पाँच कोश समझाए।

"१. अन्नमय कोश — स्थूल शरीर। अन्न से बना।

२. प्राणमय कोश — प्राण-शक्ति।

३. मनोमय कोश — मन।

४. विज्ञानमय कोश — बुद्धि।

५. आनन्दमय कोश — आनन्द।

"और इन पाँचों के पार — आत्मा। मेरा रूप।

"साधक — पाँचों कोश को — एक-एक करके — पार करे। और — आत्मा तक पहुँचे। यही — मोक्ष।'"

"मनुष्य की चेतना — पाँच अवस्थाओं में —

"१. जाग्रत — जागरण।

२. स्वप्न — सपने।

३. सुषुप्ति — गहरी निद्रा।

४. तुरीय — समाधि।

५. तुरीयातीत — परम।

"पाँचों के पार — मेरा निवास।

"साधक — पाँच अवस्थाओं को — पार करे। और — मुझ में लीन हो।"

"मेरे पाँच कर्म —

"१. सृष्टि — रचना।

२. स्थिति — पालन।

३. संहार — विनाश।

४. तिरोधान — आवरण। माया।

५. अनुग्रह — कृपा। मुक्ति।

"पाँच कर्म — मेरे पाँच मुख। मेरा पञ्चकृत्य।

"और — पञ्चायतन — पाँच मुख्य देव — एक साथ पूजे जाते। शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य, देवी।

"पाँच — एक ही परम-तत्त्व के — पाँच रूप।'"

"शिव ने आगे — एक गहरा रहस्य प्रकट किया।

"'विष्णु! ब्रह्मा! एक रहस्य सुनो।'

"'मैं — शिव — अकेला नहीं। मेरे साथ — सदा — मेरी शक्ति। उसका नाम — पार्वती। पर — वह — कोई पत्नी नहीं — मेरी ही — आधी आत्मा।'

"'शिव और शक्ति — दो नहीं — एक हैं। मैं — अर्धनारीश्वर। आधा शिव। आधा शक्ति।'

"'जैसे — आग और उसकी ऊष्मा — अलग नहीं। जैसे — सूर्य और उसकी किरणें — अलग नहीं। वैसे — शिव और शक्ति — अलग नहीं।'

"'जो — मेरी पूजा करे — पर शक्ति की नहीं — वह — अधूरा भक्त। जो — शक्ति की पूजा करे — पर मेरी नहीं — वह — अधूरा।'

"'दोनों एक साथ। तभी पूर्ण।'"

"शिव — यह कहते-कहते — अपना रूप बदला।

"उनका — आधा शरीर — पुरुष-स्वरूप। दूसरा आधा — स्त्री-स्वरूप।

"दाहिना भाग — शिव। बायाँ — शक्ति।

"दाहिने हाथ में — त्रिशूल। बायें में — कमल।

"दाहिने पाँव में — व्याघ्र-चर्म। बायें में — रेशमी पट्टी।

"दाहिनी जटा — रौद्र। बायीं — सलीक़े से बँधी।

"अर्धनारीश्वर।

"दोनों देव — मुग्ध — देखते रहे।

"विष्णु — हाथ जोड़े। 'प्रभो! क्या यह — आपका असली रूप?'

"शिव-शक्ति — एक स्वर में — 'हाँ। यह असली रूप। पुरुष और प्रकृति। शिव और शक्ति। दो — एक में।'"

"शिव-शक्ति ने आगे कहा —

"'सुनो — एक और रहस्य। मेरी शक्ति — पार्वती — आगे कई जन्म लेगी। पहले — सती। फिर — पार्वती। फिर — दुर्गा। फिर — काली।'

"'हर रूप — मेरा अनुग्रह। हर रूप — सृष्टि के एक विशेष कार्य के लिए।'

"'सती — दक्ष की पुत्री। मेरी पहली पत्नी। पर — एक यज्ञ में — देह त्यागेगी।'

"'फिर — पार्वती — हिमालय की पुत्री। उसकी तपस्या मुझे जीतेगी।'

"'फिर — दुर्गा — महिषासुर का संहार करेगी।'

"'फिर — काली — सम्पूर्ण अधर्म का संहार।'

"'पर — सब रूप — एक ही शक्ति। और — मेरे साथ — हमेशा।'"

"शिव ने ब्रह्मा-विष्णु को — आगे की लीलाओं की झलक दी।

"'ब्रह्मा! एक मानस-पुत्र — दक्ष — तू पैदा करेगा। उसकी एक पुत्री — सती — मेरी पत्नी होगी।'

"'पर — दक्ष — अपने अहंकार में — एक यज्ञ करेगा। और — मेरा अपमान करेगा। तब — सती — योग-अग्नि से — देह त्यागेगी।'

"'मेरा क्रोध — एक भयानक। मेरे रौद्र-रूप से — वीरभद्र पैदा होगा। दक्ष-यज्ञ का सम्पूर्ण नाश।'

"'फिर — सती — पार्वती के रूप में — फिर जन्मेगी। हिमालय की पुत्री। मेरी प्राप्ति के लिए — कठोर तपस्या। और — आख़िर — मेरी पत्नी।'

"'और — हम दोनों के बच्चे — कार्तिकेय और गणेश। दोनों — सृष्टि के विशेष पुत्र।'

"'यह सब — आगे होगा।'"

"विष्णु ने एक और प्रश्न।

"'प्रभो! क्या — आप — कभी — पृथ्वी पर अवतार लेते?'

"शिव — हँसे।

"'विष्णु! तू — अवतार लेगा। दश अवतार। मत्स्य से कल्कि तक।'

"'पर मैं — मेरे अवतार — कुछ अलग। मैं — रौद्र-स्वरूप में — विशेष कार्य के लिए — कुछ बार।'

"'पर — एक विशेष — हनुमान। तू उन्हें जानता है? मेरा एक अंश। राम के साथ — मेरी एक लीला।'

"'और — पाँच महान् रुद्र। एकादश रुद्र। हर एक — सृष्टि के विशेष कार्य के लिए।'

"'और — दुर्वासा-ऋषि भी — मेरा एक अंश।'

"'पर — मूल रूप में — मैं कैलास पर। मेरी पत्नी पार्वती के साथ। मेरे पुत्र — कार्तिकेय और गणेश।'

"'और — कैलास से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर — मेरी कृपा।'"

"शिव ने अंत में — एक भक्ति-सूत्र दिया।

"'विष्णु! ब्रह्मा! मेरी पूजा कैसे करें — यह सरल है।'

"'पाँच चीज़ें — पर्याप्त।'

"'१. एक लोटा जल। शुद्ध। शिव-लिङ्ग पर अभिषेक।'

"'२. एक बेलपत्र। तीन-दलीय। मेरे लिए सबसे प्रिय।'

"'३. एक दीप। शुद्ध घृत का। एक सुगन्ध।'

"'४. एक मन्त्र। ॐ नमः शिवाय। पाँच अक्षर।'

"'५. एक प्रणाम। हृदय से।'

"'इतना ही। पाँच चीज़ें। और — मैं प्रसन्न।'

"'मेरे लिए — महल नहीं। यज्ञ नहीं। हीरे नहीं। बस — एक भक्त का — एक प्रेम। एक श्रद्धा।'

"'जो — सरल भाव से — एक लोटा जल — एक बेलपत्र — एक 'ॐ नमः शिवाय' — चढ़ाए — वह मेरा परम भक्त।'"

"शिव ने पाँच महान् मन्त्र भी सिखाए।

"'१. ॐ नमः शिवाय।' — पञ्चाक्षर मन्त्र। सर्व-दैनिक।

"'२. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...' — महामृत्युञ्जय मन्त्र। मृत्यु-निवारण।

"'३. नमस्ते अस्तु भगवन् विश्वेश्वराय।' — रुद्राष्टाध्यायी।

"'४. नमामीशमीशान निर्वाणरूपम्।' — रुद्राष्टकम्।

"'५. हर हर महादेव!' — सर्व-दैनिक उद्घोष।

"'इन पाँच मन्त्रों में — मेरी सम्पूर्ण शक्ति।'

"'जो — श्रद्धा से — इनका जप करे — वह — मेरी कृपा का अधिकारी।'"

"शिव ने अन्त में — एक वरदान दिया।

"'विष्णु! ब्रह्मा! आज से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-तत्त्व का प्रचार करो।'

"'मेरे लिङ्ग की पूजा। मेरी कथा। मेरे मन्त्र। मेरी भक्ति।'

"'जो — मेरी भक्ति में — डूब जाए — उसे — मैं — मुक्ति देता हूँ।'

"'मेरी भक्ति में — कोई जाति नहीं। कोई वर्ग नहीं। कोई धर्म नहीं। बस — एक हृदय। एक श्रद्धा।'

"'भोले-भाले को मैं — सरलता से प्रसन्न होता। इसीलिए — मेरा एक नाम — भोलेनाथ।'

"'जाओ — विश्व में — मेरे नाम का प्रचार करो।'

"और — शिव — अदृश्य।

"दोनों देव — हाथ जोड़े। एक नई समझ के साथ।

"और — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में — शिव-तत्त्व का प्रचार।"

"महर्षियों! इस अध्याय का सार —

  • शिव — पाँच मुख। पाँच महाभूत। पाँच तत्त्व।
  • शिव और शक्ति — दो नहीं — एक। अर्धनारीश्वर।
  • शिव की पूजा — सरल। पाँच चीज़ें। पाँच मन्त्र।
  • शिव — भोलेनाथ। श्रद्धा से प्रसन्न।
  • सब अवतार — आगे। सती। पार्वती। कार्तिकेय। गणेश।

"अगले अध्याय में — सती की उत्पत्ति की कथा। दक्ष — ब्रह्मा का मानस-पुत्र। उसकी पुत्री — सती — कैसे शिव की पत्नी हुई।

"पर — आज — इतना ही।"

॥ इति श्री शिवपुराणे तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥

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