एक भक्त के संकल्प के सामने सौ योजन का सागर भी एक छोटी रेखा है। हनुमान् ने पर्वत से छलाँग लगाई और आकाश में उड़ चले। नीचे — सागर। ऊपर — आकाश। चारों ओर — हवा। और भीतर — एक ही नाम। 'राम।' यही उनकी पतवार। यही उनका पुल। यही उनकी सम्पूर्ण नौका।
हनुमान् ने पर्वत के शिखर पर अन्तिम क्षण रुक कर — एक गहरी श्वास ली। समस्त ब्रह्माण्ड एक क्षण के लिए मानो ठहर गया। हवा रुक गई। समुद्र की लहरें थम गईं। पक्षी आकाश में स्थिर। ऋषि-मुनि ध्यान में डूबे।
फिर — हनुमान् ने एक हुङ्कार भरी —
"जय श्रीराम!"
उस ध्वनि से पर्वत हिला। समस्त ब्रह्माण्ड में जैसे एक तरङ्ग दौड़ी।
और हनुमान् ने पर्वत को अपने पैरों से दबाया। पर्वत की चट्टानें भीतर धँस गईं — पाताल तक। पर्वत के नीचे रहने वाले नाग — एक क्षण के लिए चकित — "क्या हो रहा है?" फिर समझे — "हनुमान्-जी की छलाँग।"
एक क्षण — और हनुमान् का विशाल शरीर — आकाश में।
एक छलाँग — सौ योजन के सागर के लिए।
हनुमान् — आकाश में। पूँछ पीछे — एक धनुष की तरह तनी। दोनों भुजाएँ — आगे फैली, मानो कोई बड़ी चीज़ पकड़ने के लिए। पैर — पीछे की ओर। मुख — एक मीठी मुस्कान के साथ। आँखें — दक्षिण की ओर एक ही दिशा पर।
नीचे — समुद्र। एक चित्र की तरह। नीला, गहरा, अनन्त। ऊँची-ऊँची लहरें — पर ऊपर से देखो तो — एक हल्की रेखा-मात्र।
आगे — कोहरा। पीछे — महेन्द्र पर्वत। दूर-दूर — कुछ छोटे-छोटे द्वीप। पर हनुमान् की निगाह — किसी पर नहीं। केवल लक्ष्य पर।
हनुमान् की छाया — समुद्र पर — विशाल। समुद्र के बीच की मछलियाँ — चकित — "यह किसकी छाया? कोई बादल? कोई पक्षी? कोई पर्वत?" फिर समझीं — "हनुमान्-जी।"
समुद्र के बीच रहने वाले मगर — सिर ऊपर उठाए। डॉल्फिनें — कूद-कूद कर देखीं। शार्क — एक कोने में दुबक गए।
स्वर्ग में — देवता एकत्र। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, सब। और सब की निगाह — आकाश में उड़ते एक विशाल वानर पर।
इन्द्र ने कहा — "यह — यह कौन? पर्वत के समान विशाल। आकाश में उड़ रहा। दक्षिण की ओर।"
ब्रह्मा ने मुस्कुराते हुए कहा — "यह वही पवन-पुत्र। जिसे मैंने वरदान दिया था — कोई अस्त्र नहीं काटेगा। आज वह श्रीराम के कार्य पर। सीताजी की खोज में।"
सब देवताओं की आँखों में आदर। पुष्प-वृष्टि की। नारद ने वीणा छेड़ी। गन्धर्वों ने गायन। अप्सराओं ने नृत्य।
"राम-दूत। अद्वितीय भक्त। आज एक ऐतिहासिक क्षण।"
नीचे — समुद्र-राज वरुण। उन्होंने ऊपर देखा।
"यह — यह तो हनुमान्-जी। श्रीराम के दूत।"
वरुण ने सोचा — "एक भक्त मेरे राज्य से होकर जा रहा है। और एक स्वामी का कार्य कर रहा है। मैं भी एक छोटी सहायता दूँ। मेरे राज्य में पर्वत हैं — समुद्र के नीचे छुपे। एक पर्वत — मैनाक — को आदेश दूँ। शिखर ऊपर उठाए। हनुमान्-जी थोड़ी देर विश्राम करें।"
वरुण ने अपने त्रिशूल से समुद्र-तल को छुआ। मैनाक पर्वत — जो शताब्दियों से समुद्र में डूबा था — हिला। उसकी चोटी ऊपर उठने लगी।
"भाई मैनाक! आज एक भक्त तेरे ऊपर से जा रहा। तू थोड़ा शिखर ऊपर ला। उन्हें विश्राम दे। यह — एक छोटी-सी सेवा है। पर एक भक्त के लिए — यही सब कुछ।"
मैनाक ने आज्ञा मानी। उसकी चोटी समुद्र के पार आ गई। चमकीली, सुनहरी, अद्वितीय।
हनुमान् अभी कुछ ही दूर गए थे। नीचे देखा — एक सुनहरा पर्वत-शिखर समुद्र के बीच से उठ रहा। पीछे — कोहरा। आगे — कोहरा। पर बीच में — एक चमकीला द्वीप।
हनुमान् चकित — "यह कैसा? कुछ क्षण पहले तो यहाँ कुछ नहीं था। अब अचानक — एक द्वीप! कौन है यह? क्या रावण की कोई चाल? क्या कोई राक्षसी?"
हनुमान् की भुजाएँ क्षण भर के लिए कस गईं। तैयार। पर — पर्वत के शिखर से एक मीठा स्वर —
"पवन-पुत्र! रुको! मैं मैनाक हूँ। तुम्हारे पिता पवन-देव का सखा।"
हनुमान् की आँखों में चकित-कौतुक। एक पर्वत — बोल रहा! और मित्रता का दावा कर रहा! आगे क्या होगा — अगले अध्याय में।
आकाश में उड़ते-उड़ते हनुमान् ने एक छोटी प्रार्थना की।
"हे राम! हर पग पर — एक नई परीक्षा। हर पग पर — एक नई बाधा। पर — मैं डरूँगा नहीं। क्योंकि — आप मेरे साथ। यही मेरा सबसे बड़ा बल।"
एक भक्त के लिए हर बाधा एक अवसर है। हर परीक्षा — एक उपहार। हर रुकावट — एक सीढ़ी।
क्योंकि — एक भक्त की यात्रा कभी सीधी नहीं होती। एक भक्त को बार-बार परीक्षा देनी पड़ती है। पर हर परीक्षा के बाद — एक नई शक्ति। एक नया वरदान। एक नया साक्षात्कार।
हनुमान् का यह सागर-लङ्घन एक प्रतीक है।
हम सब के सामने — एक सागर है। नौकरी का सागर। पारिवारिक सागर। आर्थिक सागर। मानसिक सागर। एक खोज का सागर। एक प्रश्न का सागर।
हम सब को — किसी न किसी सागर को लाँघना है।
हनुमान् क्या सिखाते हैं?
पहले — अपनी शक्ति को पहचानो। हम सब के भीतर — एक सोई हुई शक्ति। एक जाम्बवान् की पुकार चाहिए — और वह जाग जाएगी।
दूसरे — स्वामी का स्मरण रखो। एक भक्त की शक्ति — स्वयं की नहीं। उसके आराध्य की। हनुमान् की छलाँग — श्रीराम के नाम की छलाँग।
तीसरे — मार्ग में बाधाएँ आएँगी। पर — रुकना नहीं। मैनाक मिलें — विनम्र भाव से। सुरसा मिलें — बुद्धि से। सिंहिका मिले — साहस से।
चौथे — लक्ष्य पर ध्यान। बीच में रुकना नहीं। मैनाक का स्वर्ण-शिखर सुन्दर — पर मेरा लक्ष्य लङ्का। यही दृष्टि।
आकाश में हनुमान् — सूर्य की किरणों में चमकते। उनके लाल-वर्ण शरीर पर सूर्य का प्रकाश — मानो एक विशाल अग्नि-पुञ्ज आकाश में।
नीचे — समुद्र। ऊपर — हनुमान्। पीछे — महेन्द्र। आगे — लङ्का। बीच में — एक मैनाक।
एक कवि होता तो लिखता —
"नीला सागर। लाल वानर। सोने का पर्वत। श्वेत बादल। नीला आकाश। सब रङ्ग एक चित्र में। और बीच में — एक राम-नाम। एक ही जो अदृश्य — पर सब को बाँधे।"
आज तक — कोई भक्त इतनी बड़ी छलाँग नहीं लगाई। आज तक — कोई भक्त इतने बड़े सागर को नहीं लाँघा। आज तक — कोई भक्त इतना बड़ा लक्ष्य लेकर नहीं चला।
पर हनुमान् — एक छोटी प्रेरणा से — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सबसे बड़े वीर।
क्योंकि — उनकी प्रेरणा भौतिक नहीं। आध्यात्मिक है। उनका लक्ष्य अपना नहीं — स्वामी का। उनकी शक्ति का स्रोत स्वयं नहीं — राम-नाम।
आगे — मैनाक के साथ संवाद। एक मीठा अध्याय।
"जो भक्त सौ योजन के सागर के बीच भी अपने स्वामी का नाम भूले नहीं — उसके लिए सब बाधाएँ — सीढ़ियाँ बन जाती हैं।"
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