महेन्द्र पर्वत — दक्षिण-समुद्र के तट पर खड़ा एक विशाल शिखर। समुद्र की लहरें इसके चरण-कमल पखारती हैं। आज इसी पर्वत पर एक भक्त खड़ा है — हनुमान्। पर्वत के एक-एक पत्थर ने उस ऐतिहासिक क्षण की प्रतीक्षा सहस्राब्दियों से की होगी। आज वह क्षण आ गया।
हनुमान् ने पर्वत की ओर पग बढ़ाए। पर्वत — इतना विशाल कि सिर ऊँचा कर देखना पड़े। चारों ओर सघन वन — बाँस, साल, चन्दन, अशोक के वृक्ष। मुँह उठाए सिंह कहीं बैठे थे। हाथी झुण्ड में जल पी रहे थे। मोर अपने पंख खोले थे। पर्वत का सौन्दर्य — सम्पूर्ण दक्षिण भारत में अद्वितीय।
हनुमान् ने एक-एक पग धीरे रखा। पर्वत के स्वामी से जैसे अनुमति माँग रहे हों — "महेन्द्र! आज मैं तेरे शिखर का उपयोग करूँगा। तेरे पत्थर मेरे चरण-न्यास से दबेंगे — पर मेरे प्रयोजन के लिए। क्षमा करना।"
पर्वत हिला। नीचे की चट्टानें झुकीं — मानो स्वागत में। एक ठण्डी हवा — जैसे पर्वत का आशीर्वाद। हनुमान् की आँखों में एक मीठी मुस्कान।
पर्वत पर चढ़ते-चढ़ते हनुमान् ने देखा — वन के सब वासी रास्ता दे रहे हैं। सिंह उठकर एक ओर। हाथी अपनी सूँड हिलाकर। मोर पंख समेट कर। मृग एक-एक करके पास आए — पुजारी की तरह। एक छोटा हिरण-शावक हनुमान् के चरणों में लोटा।
हनुमान् ने उसे उठाया। उसकी पीठ सहलाई।
"नन्हे! मैं अब जाऊँगा। पर लौटूँगा। और तब — सीताजी का समाचार लेकर आऊँगा। मेरे लिए प्रार्थना करना।"
हिरण-शावक ने जैसे समझ लिया। एक छलाँग — और वन में।
हनुमान् की आँखों में एक छोटी कोमलता। पशु-पक्षी भी एक भक्त के स्वामी-कार्य को समझते हैं। यही सनातन की महिमा।
हनुमान् शिखर पर पहुँचे। नीचे — अनन्त सागर। पूर्व से पश्चिम — कहीं अन्त नहीं। नीला, गहरा, उछलता, गरजता। लहरें इतनी ऊँची कि शिखर तक छाँव डालें।
हनुमान् ने एक थकी निगाह से सागर को देखा।
"भाई सागर! तुम क्या जानो कि एक भक्त की पीड़ा क्या होती है। मेरा स्वामी अपनी पत्नी के लिए तड़प रहा है। और तू — बीच में खड़ा है। मैं तुझे लाँघूँगा। पर तू मुझे क्षमा करना।"
सागर हुङ्कारता रहा। उसकी अपनी भाषा में — एक अभिनन्दन।
हनुमान् ने चारों दिशाओं को नमस्कार किया।
पूर्व-दिशा को नमस्कार — जहाँ से सूर्य उदय होता है। मेरे विद्या-गुरु। सूर्य-देव! आपने मुझे समस्त शास्त्र पढ़ाए। आज वह विद्या काम आएगी।
पश्चिम-दिशा को नमस्कार — जहाँ वरुण-देव रहते हैं। जल के स्वामी। आज मैं आपके राज्य से होकर जाऊँगा। मुझे रोकना मत।
उत्तर-दिशा को नमस्कार — जहाँ हिमालय खड़ा है। मेरे आराध्य शिव का धाम। हे शिव! एक छोटा-सा बल दीजिए।
दक्षिण-दिशा को नमस्कार — जहाँ लङ्का है। जहाँ सीताजी हैं। मेरे लक्ष्य की दिशा। आज तुम मुझे उस माता तक पहुँचा देना।
शिखर पर खड़े-खड़े हनुमान् को बचपन याद आया।
एक दिन — सूर्य आसमान में चढ़ रहा था। बालक हनुमान् ने सोचा — "वह क्या है? लाल फल! खाऊँ?" और एक छलाँग। आसमान को लाँघते-लाँघते सूर्य के पास पहुँच गए। सूर्य ने भागने का प्रयास किया। पर बालक हनुमान् ने पकड़ ही लिया — सूर्य अपने मुँह में।
देवताओं में हाहाकार। ब्रह्माण्ड में अन्धकार। इन्द्र ने वज्र चलाया। ठुड्डी पर चोट। बालक नीचे गिरे। सूर्य मुक्त हुए।
पवन-देव क्रोधित। सम्पूर्ण पवन रोक दी। ब्रह्माण्ड में सब प्राणी छटपटाने लगे। तब ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, सब देवताओं ने पवन-देव को मनाया। और हनुमान् को अनेक वरदान दिए — कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं काटेगा। मृत्यु अपनी इच्छा से। ज्ञान-विद्या में अद्वितीय।
"वही बालक — आज पर्वत-शिखर पर। अब छलाँग छोटी नहीं — बड़ी। पर सिद्धान्त वही — एक स्वामी के लिए।"
हनुमान् के होंठों पर एक छोटी मुस्कान।
हनुमान् ने धीरे-धीरे अपने शरीर को बढ़ाना आरम्भ किया।
पहले — एक साधारण वानर। फिर — एक हाथी जैसा। फिर — एक पर्वत जैसा। फिर — एक छोटा बादल जैसा। फिर — आसमान को छूने वाला।
शरीर के साथ-साथ शक्ति भी बढ़ती गई। पर्वत के पत्थर हनुमान् के पैरों के नीचे टूटने लगे। समुद्र की लहरें उठने लगीं। आकाश में गरुड़ चकित — "यह कौन?"
देवताओं ने स्वर्ग से देखा — एक विशाल शरीर पर्वत-शिखर पर। पूँछ हवा में लहरा रही। आँखें — आग की दो ज्वालाएँ। मुख खुला — एक हुङ्कार की प्रतीक्षा में।
"पवन-पुत्र। राम-दूत। आज वह क्षण आ गया।"
नीचे — पर्वत के तल पर — सम्पूर्ण वानर-दल खड़ा। अंगद, जाम्बवान्, नल, नील, मैन्द, द्विविद, सहस्रों वानर। सब की आँखें ऊपर। पर्वत-शिखर पर — एक विशाल शरीर।
अंगद ने जाम्बवान् से कहा — "यह — यह वही हनुमान्? जो थोड़ी देर पहले मेरे पास चुप-चाप बैठा था?"
जाम्बवान् ने कहा — "बेटा, यही उनकी असली रूप। श्राप था — जब-तब याद दिलाना पड़ा। आज याद आ गई।"
अंगद की आँखों में आँसू। एक पुत्र की तरह — हनुमान् को निहारते हुए। एक प्रार्थना — "हे भाई! तुम पार उतरो। कुशल लौटो।"
नल-नील ने एक छोटा-सा गीत गाया। राम-नाम का। समस्त वानर-दल साथ — "जय राम! जय राम! जय राम-दूत हनुमान्!"
उस ध्वनि से सम्पूर्ण पर्वत गूँज उठा।
हनुमान् ने नीचे देखा। समस्त वानर-दल। एक-एक चेहरे में आशा। एक-एक चेहरे में प्रार्थना।
"भाइयो! तुम सब का प्रेम मेरे साथ। यही मेरी सबसे बड़ी शक्ति।"
फिर हनुमान् ने आँखें मूँदीं। एक अन्तिम प्रार्थना —
"हे श्रीराम! मैं आपका दास। आज एक बड़ा कार्य आरम्भ कर रहा हूँ। सौ योजन का सागर — मेरे लिए छोटा। पर — जो शक्ति आपका दास है, वह मेरी नहीं — आपकी है। आप ही ले जा रहे हैं। आप ही पार उतार रहे हैं। मैं केवल एक माध्यम हूँ। हे राम! जय हो।"
आँखें खोलीं। पूँछ को थोड़ा हिलाया। पैरों से पर्वत को थोड़ा दबाया। पर्वत की चट्टानें भीतर धँस गईं — मानो धरती ने एक धकेल दिया।
और — हनुमान् ने आकाश की ओर — एक हुङ्कार भरी।
"जय श्रीराम!"
उस हुङ्कार से समस्त ब्रह्माण्ड हिल उठा।
देवताओं ने पुष्प-वृष्टि की। नारद ने आकाश में दिव्य-वीणा छेड़ी। गन्धर्वों ने मधुर गान किया।
हनुमान् का शरीर — एक पर्वत के समान। उनकी छाया से समुद्र अन्धकार में डूब गया। उनकी पूँछ — हवा में एक धनुष की तरह तनी। उनके पैर — पर्वत में धँसे। आँखें — दक्षिण की ओर। मन — एक ही ध्येय पर।
"राम!"
एक क्षण।
दो क्षण।
तीन क्षण।
और —
महेन्द्र पर्वत — आज भी दक्षिण-भारत में खड़ा है। केरल, तमिलनाडु के तटों के पास उसकी कई पहचाने जाने वाली जगहें हैं। पर शास्त्रों में महेन्द्र-पर्वत वही है जहाँ से हनुमान् ने सागर लाँघा।
आज भी श्रद्धालु वहाँ जाते हैं। पैरों के निशान खोजते हैं। शिखर पर एक छोटा मन्दिर — हनुमान्-जी की पत्थर की एक मूर्ति। और श्रद्धालु — एक कथा सुनते हैं।
"भाई! इसी पर्वत पर — एक बार — एक भक्त खड़ा था। और एक छलाँग — सौ योजन की। आज भी इस पर्वत के पत्थरों में — उसके पैरों की धूल मिलती है।"
आगामी अध्याय में — वह छलाँग। वह उड़ान। एक भक्त — आकाश में।
"भक्त के लिए — पर्वत-शिखर एक छलाँग की भूमि-मात्र। पर्वत स्वयं — उसके चरण-न्यास से धन्य।"
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