श्रीराम-कथा के सात काण्डों में सुन्दरकाण्ड वह काण्ड है जहाँ मनुष्य की आशा सबसे ऊँची उड़ान भरती है। जहाँ एक भक्त अपने स्वामी के एक संकेत-मात्र पर सौ योजन का सागर लाँघ जाता है। यही सुन्दर है — यही काण्ड का नाम है। आरम्भ में हम मंगलाचरण से, फिर कथा-प्रसंग से, फिर हनुमान्-चरित से उस यात्रा को आरम्भ करते हैं जो भक्ति, बल, और बुद्धि — तीनों का परम-उदाहरण है।
श्रीगुरु को नमस्कार। श्रीराम-लक्ष्मण-जानकी-हनुमान् को नमस्कार। उस आदि-कवि वाल्मीकि को नमस्कार जिनकी वाणी ने इस कथा को इस लोक के लिए सुरक्षित कर दिया। उस तुलसी-दास को नमस्कार जिन्होंने इस कथा को जन-भाषा में, जन-कण्ठ में, जन-हृदय में स्थापित किया। और उस अंजनी-नन्दन हनुमान् को सहस्र प्रणाम — जिनके चरित्र का ही नाम सुन्दर-काण्ड है।
श्रीसीता-राम-चरण-कमल का स्मरण करते हुए, हम इस काण्ड का आरम्भ करते हैं। यहाँ कोई वैभव-वर्णन नहीं — एक भक्त की यात्रा है। यहाँ कोई युद्ध-वर्णन नहीं — एक खोज है। यहाँ कोई राजसूय-यज्ञ नहीं — एक मुद्रिका का आदान-प्रदान है। फिर भी — सम्पूर्ण रामायण का सबसे प्रिय, सबसे पठित, सबसे सुनाया जाने वाला काण्ड यही है। क्योंकि — यहाँ का नायक हनुमान् है। और हनुमान् — हम सबके भीतर है।
किष्किन्धा-काण्ड के अन्त में हम देख आए हैं — सुग्रीव ने वानर-दल को चारों दिशाओं में सीताजी की खोज के लिए भेजा। दक्षिण की ओर अंगद, जाम्बवान्, हनुमान्, नल, नील, और सहस्रों वानर निकले। उन्होंने वन-पर्वत-गुफा-तीर्थ — सब छान मारे। पर सीता का कोई समाचार नहीं मिला। एक माह की अवधि बीत गई — सुग्रीव की दी हुई अवधि। निराशा। थकान। प्राण-त्याग का संकल्प।
तब सम्पाती मिले — गृध्र-राज जटायु के बड़े भाई। उन्होंने अपनी दिव्य-दृष्टि से देखा — "सौ योजन दूर सागर के पार लङ्का है। वहाँ रावण के अशोक-वन में एक दुःखिनी स्त्री बैठी है — उसी के चारों ओर राक्षसियाँ पहरा दे रही हैं। वही जानकी हैं।"
वानर-दल को नई आशा मिली। पर एक नई समस्या भी — सौ योजन का सागर कौन लाँघे? अंगद ने कहा — "मैं उठा लूँगा।" पर "वापस आ सकूँगा कि नहीं — कह नहीं सकता।" जाम्बवान् ने कहा — "मैं युवावस्था में लाँघ सकता था — अब वह बल नहीं।" नल, नील, मैन्द, द्विविद — सब ने अपनी सीमा बताई।
तब जाम्बवान् ने हनुमान् की ओर देखा। एक कोने में चुप-चाप बैठे हनुमान्। बल-बुद्धि-विद्या के निधि। पर अपनी ही शक्ति से अनभिज्ञ। एक बालक की तरह — एक ब्रह्मचारी की तरह।
अंजनी और केसरी के पुत्र। पवन-देव के क्षेत्रज पुत्र। बाल-काल में सूर्य को फल समझ कर निगलने को उठ गए। इन्द्र के वज्र से ठुड्डी पर चोट लगी — इसी कारण नाम 'हनु-मान्' पड़ा। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर — सब देवताओं ने वरदान दिए — कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं काट सकेगा। मृत्यु अपनी इच्छा से ही होगी। ज्ञान-विद्या में अद्वितीय।
पर — एक श्राप भी। बचपन में ऋषियों के साथ बहुत शरारत की थी। ऋषियों ने श्राप दिया — "तुम्हें अपनी शक्ति का स्मरण नहीं रहेगा। जब कोई याद दिलाएगा — तब-तब जागेगी।" इसी कारण हनुमान् अब चुप-चाप बैठे थे। अपनी शक्ति का बोध नहीं था।
जाम्बवान् ने धीरे से कहा — "हनुमान्! तुम चुप क्यों? यह कार्य तुम्हीं कर सकते हो। तुम पवन-पुत्र हो। तुम्हारे लिए सौ योजन क्या? तुमने बचपन में सूर्य को निगलने का प्रयास किया था। आज याद करो।"
जाम्बवान् ने एक-एक करके वरदान, शक्ति, बाल-लीला — सब याद दिलाए। हनुमान् की आँखों में चमक आती गई। शरीर बढ़ने लगा। एक छोटा-सा शान्त वानर — अब विशाल पर्वत की तरह।
हनुमान् ने उठकर एक हुङ्कार भरा। समस्त वानर-दल के रोंगटे खड़े हो गए। फिर एक मीठी मुस्कान।
"भाइयो! मैं जाऊँगा। सौ योजन क्या — सहस्र योजन भी पार करूँगा। मेरे स्वामी की पत्नी का दर्शन-मात्र मेरा लक्ष्य।"
उस क्षण — सम्पूर्ण वानर-दल ने हनुमान् की जय-जयकार की। अंगद ने हनुमान् के चरण-स्पर्श किए। जाम्बवान् ने आशीर्वाद दिया। नल-नील ने माला पहनाई।
हनुमान् ने धीरे से सीताजी का स्मरण किया। फिर श्रीराम का। फिर अपने आराध्य के चरण-कमलों का। एक भक्त के लिए — स्वामी का स्मरण ही सबसे बड़ी शक्ति है। मन्त्र है। कवच है।
"राम!" — एक छोटा-सा शब्द। पर इस शब्द में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया था।
हनुमान् ने महेन्द्र पर्वत की ओर देखा। यही पर्वत — दक्षिण-समुद्र के तट पर — सबसे ऊँचा। यहीं से छलाङ्ग लगानी थी।
एक धीमे, स्थिर पग से हनुमान् चले। पर्वत पर चढ़े। समस्त वानर-दल पीछे — एक मेले की तरह — पर्वत के नीचे एकत्र। सब की आँखें — पर्वत-चूड़ा पर खड़े उस एकाकी वानर पर।
हनुमान् — पर्वत पर खड़े। नीचे — अनन्त सागर। उछलती लहरें। दूर — कोहरा। पार — कुछ नहीं। केवल विश्वास।
"राम!" — एक बार और। और हनुमान् का शरीर — विशाल। विशाल। और विशाल। समस्त पर्वत उनके पैरों के नीचे काँपने लगा।
हनुमान् ने आँखें मूँदीं। एक छोटी प्रार्थना —
"हे राम! मैं तुम्हारा दास। मेरा कोई बल नहीं। मेरी कोई बुद्धि नहीं। जो तुम कराओगे — वही करूँगा। जिस ओर ले जाओगे — उसी ओर जाऊँगा। मेरे स्वामी की पत्नी का दर्शन — यही मेरा लक्ष्य। मुझे पार उतारो।"
हवा रुक गई। समुद्र शान्त हो गया। एक क्षण — पूरा ब्रह्माण्ड — एक भक्त की प्रार्थना में डूब गया।
और तब — हनुमान् ने अपनी पूँछ को थोड़ा हिलाया। शरीर को थोड़ा झुकाया। एक छलाङ्ग की तैयारी।
सुन्दरकाण्ड का आरम्भ हो रहा था।
सुन्दरकाण्ड क्यों सुन्दर? — क्योंकि यहाँ का नायक एक भक्त है। राजा नहीं, राजकुमार नहीं, ऋषि नहीं — एक वानर। एक सेवक। और यह सेवक — एक ही पल में — समस्त ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा वीर बन जाता है। क्यों? — क्योंकि उसकी प्रेरणा भौतिक नहीं, आध्यात्मिक है। उसका लक्ष्य अपना नहीं, स्वामी का है। उसकी शक्ति का स्रोत स्वयं नहीं, राम-नाम है।
आगामी अध्यायों में — हम हनुमान् के साथ-साथ — सागर लाँघेंगे, मैनाक से मिलेंगे, सुरसा की परीक्षा देंगे, सिंहिका को मारेंगे, लङ्का में प्रवेश करेंगे, सीताजी का दर्शन करेंगे, अशोक वाटिका को उजाड़ेंगे, अक्षय कुमार को मारेंगे, मेघनाद के ब्रह्मास्त्र में बँधेंगे, रावण-सभा में जाएँगे, लङ्का-दहन करेंगे, और श्रीराम के पास लौटकर — चूड़ामणि सौंपेंगे।
यह यात्रा — एक बाहरी यात्रा है। पर — एक भीतरी यात्रा भी। हम सब के भीतर — एक हनुमान् बैठा है — जो अपनी शक्ति को भूल चुका है। एक जाम्बवान् की पुकार चाहिए — और भीतरी हनुमान् जाग जाएगा। और सीता-स्वरूप अपनी आत्मा को — रावण-स्वरूप मन-कामनाओं के बीच से — खोज निकालेगा।
"जो भक्त है — उसके लिए कोई सागर सौ योजन का नहीं। कोई पर्वत ऊँचा नहीं। कोई अग्नि जलाने वाली नहीं। क्योंकि — एक राम-नाम — सब का उत्तर है।"
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