भाग 1 : दिमाग़ ख़ाली करो — उसूल 1 से 4
उसूल 1 — सब कुछ बाहर निकालो, एक बार में
ये पहला काम है और सबसे भारी है। इसके बाद बाक़ी सब आसान हो जाता है।
दो घंटे चाहिए। एक बार ठीक से, फिर हर छह महीने में हल्का-सा दोहराना।
वो कॉपी लीजिए जिस पर "सब कुछ" लिखा है। और लिखना शुरू कीजिए — हर वो चीज़ जो दिमाग़ में कहीं भी अटकी है।
"गैस बुक करनी है।" "पापा की आँख की जाँच।" "बॉस को रिपोर्ट भेजनी है।" "बाथरूम का नल टपक रहा है।" "राहुल को दो साल से फ़ोन नहीं किया।" "बीमे का प्रीमियम कब है।" "अलमारी ठीक करनी है।" "वो कोर्स जो शुरू किया था।"
एक-एक लाइन। क्रम की चिंता मत कीजिए।
तीन नियम :
कुछ भी छोटा नहीं है। अगर वो दिमाग़ में आया है, तो वो जगह घेर रहा है। "बटन टूटा है" भी लिखिए।
अभी कोई फ़ैसला नहीं। "ये करूँगा या नहीं" — ये सवाल अगले भाग में आएगा। अभी सिर्फ़ बाहर निकालिए।
जब लगे कि ख़त्म हो गया, तब दस मिनट और बैठिए। पहली बीस लाइनें सतह की होती हैं। जो नीचे दबा है, वो तब आता है जब लगता है कि अब कुछ नहीं बचा।
अगर कुछ याद न आए तो इन जगहों पर नज़र डालिए — घर की मरम्मत, पैसा और बिल, सेहत की टली हुई जाँच, कोई बातचीत जो करनी है, अधूरे प्रोजेक्ट, वो फ़ोन जो दो साल से टल रहा है, और वो चीज़ जो आप हमेशा से सीखना चाहते थे।
ज़्यादातर लोगों की लिस्ट में साठ से सौ चीज़ें निकलती हैं। कुछ की डेढ़ सौ।
और जब पूरी लिस्ट सामने आती है तो पहले घबराहट होती है — "इतना सब बाक़ी है?" — और उसके बाद एक अजीब-सा हल्कापन।
क्योंकि दिमाग़ में सौ चीज़ें एक साथ रहती हैं और हर एक पूरी लगती है। काग़ज़ पर वही सौ तीन पन्नों में आ जाती हैं।
और तीन पन्ने संभाले जा सकते हैं।
उसूल 2 — दस जगह मत रखो, एक जगह रखो
गिनिए कि आपकी चीज़ें इस वक़्त कहाँ-कहाँ पड़ी हैं।
फ़ोन के नोट्स में कुछ है। ख़ुद को भेजे हुए व्हाट्सएप मैसेज हैं। मेज़ पर एक पर्ची है। ईमेल में कुछ बिना पढ़ा। जेब में एक काग़ज़। बाक़ी सब दिमाग़ में।
छह जगह।
अब जब आपको देखना हो कि "क्या-क्या करना है", तो आप कहाँ देखेंगे? छहों जगह?
कोई नहीं देखता। इसीलिए किसी एक जगह पर भरोसा नहीं बनता। और जिस सिस्टम पर भरोसा न हो, वो सिस्टम नहीं होता — वो एक और बोझ होता है।
तो एक जगह चुनिए। कॉपी, फ़ोन का एक नोट, कोई ऐप — जो भी आप सच में रोज़ खोलते हैं।
कौन-सी चुनी, ये मायने नहीं रखता। जो मायने रखता है वो ये है : सब कुछ वहीं जाएगा।
घर, ऑफ़िस, बच्चे, अपना — सब एक ही जगह।
यहाँ लोग सबसे बड़ी ग़लती करते हैं — घर के लिए अलग लिस्ट, ऑफ़िस के लिए अलग।
पर आपका दिमाग़ एक है। वो बुधवार की मीटिंग में बच्चे की फ़ीस याद दिलाएगा और इतवार को बॉस की रिपोर्ट।
काग़ज़ के लिए एक असली डिब्बा भी चाहिए — ट्रे, टोकरी, जूते का डिब्बा, कुछ भी। घर में जो भी काग़ज़ आए — बिल, स्कूल की चिट्ठी, कोई पर्ची — वो सीधे उसी डिब्बे में। मेज़ पर नहीं, फ्रिज पर नहीं।
और एक चेतावनी : दस ऐप मत आज़माइए। लोग तीन हफ़्ते ऐप ढूँढने में लगाते हैं और उन्हें लगता है कि वो काम कर रहे हैं। वो टाल रहे हैं, और उसे व्यवस्था का नाम दे रहे हैं।
सबसे मामूली जगह भी, अगर रोज़ इस्तेमाल हो, तो सबसे बढ़िया ऐप से बेहतर है जिसे आप हफ़्ते में एक बार खोलते हैं।
उसूल 3 — "याद रखूँगा" सबसे महँगा झूठ है
कोई रास्ते में मिलता है और कहता है — "वो काग़ज़ भेज देना।" और आप कहते हैं — "हाँ हाँ, याद है।"
उस पल आपको सच में याद होता है। झूठ ये मान लेना है कि चार घंटे बाद भी याद रहेगा।
जब आप कोई चीज़ याद रखने का ज़िम्मा लेते हैं, तो दिमाग़ उसके लिए एक खिड़की खोलकर रख देता है। वो तब तक बंद नहीं होती जब तक काम न हो जाए या वो कहीं लिख न दी जाए।
एक चीज़ का असर नहीं दिखता। पर आपके पास चालीस हैं।
और चालीस खुली खिड़कियों के साथ चलने वाले आदमी को शाम को थकान होती है, भले उसने कोई भारी काम न किया हो। वो थकान काम की नहीं, खिड़कियों की होती है।
तो नियम एक ही है — जो दिमाग़ में आए, दो सेकंड में लिख दीजिए।
पूरा वाक्य मत लिखिए, "गैस" काफ़ी है। ये मत सोचिए कि करना है या नहीं। और शर्म मत कीजिए — बीच बातचीत में एक लाइन लिख लेना बदतमीज़ी नहीं है। उल्टा, जो सामने ही लिख लेता है उस पर भरोसा बढ़ता है। "याद रखूँगा" कहने वाले पर नहीं बढ़ता, क्योंकि सबको पता है कि वो भूल जाएगा।
तीन जगहों पर कॉपी रखिए :
बाथरूम के बाहर। सबसे अच्छे ख़याल नहाते वक़्त आते हैं क्योंकि वहाँ दिमाग़ ख़ाली होता है। और वो सब भूल जाते हैं, क्योंकि आप पूरे वक़्त उन्हें दोहराते रहते हैं ताकि याद रहें।
गाड़ी में। लिख नहीं सकते तो वॉइस नोट कर लीजिए।
तकिए के पास। सबसे ज़रूरी। रात की चीज़ें सबसे तेज़ आती हैं और सबसे ज़्यादा जगाती हैं। एक लाइन लिखिए और कहिए — "कल देख लूँगा।"
और रात को फ़ोन में मत लिखिए। रात को फ़ोन उठाने वाला आदमी लिखता है, फिर एक मैसेज देखता है, फिर बीस मिनट स्क्रॉल करता है। ये आप जानते हैं।
उसूल 4 — दिमाग़ अधूरी चीज़ नहीं छोड़ता
एक बात पर ग़ौर कीजिए।
जो फ़िल्म आपने पूरी देख ली, वो उतर जाती है। जो सीरीज़ बीच में छूटी, वो हफ़्तों याद रहती है।
जो झगड़ा सुलझ गया, वो भूल जाता है। जो अधूरा रह गया, वो सालों बाद भी रात में जाग जाता है।
दिमाग़ का सिस्टम यही है — जो फ़ाइल "पूरी" पर बंद नहीं हुई, वो वो बंद नहीं करता।
अब यहाँ एक बहुत काम की बात है, और ज़्यादातर लोगों को ये नहीं पता :
फ़ाइल बंद करने के लिए काम पूरा करना ज़रूरी नहीं है। सिर्फ़ अगला क़दम तय करना काफ़ी है।
यानी अगर आपके दिमाग़ में "बच्चे का एडमिशन" घूम रहा है, तो उसे शांत करने के लिए एडमिशन कराना नहीं पड़ेगा।
बस इतना लिख देना काफ़ी है — "कल शर्मा जी को फ़ोन करके स्कूल का नाम पूछना है।"
दिमाग़ शांत हो जाएगा। क्योंकि अब वो अधूरी फ़ाइल नहीं रही। अब वो एक तय क़दम है, जो एक भरोसेमंद जगह पर लिखा है।
यही इस पूरी किताब का इंजन है। बाक़ी सब इसी के आस-पास बना हुआ है।
और यही वजह है कि सिर्फ़ लिस्ट बनाने से काम नहीं चलता।
अगर आपकी लिस्ट में "बच्चे का एडमिशन" लिखा है, तो हर बार जब आप उसे पढ़ेंगे, दिमाग़ फिर से हिसाब लगाना शुरू करेगा — कौन-सा स्कूल, किससे पूछें, फ़ीस कितनी होगी।
यानी वो लाइन आपको थका रही है, हल्का नहीं कर रही।
अगले भाग में हम यही ठीक करेंगे।
इस महीने ये करो
पहला हफ़्ता : दो घंटे निकालकर सब कुछ कॉपी में उतारिए।
दूसरा हफ़्ता : एक जगह और एक डिब्बा तय कीजिए।
तीसरा हफ़्ता : तीन जगहों पर कॉपी-पेन रखिए और दो सेकंड का नियम चलाइए।
चौथा हफ़्ता : अपनी लिस्ट में से पाँच लाइनें चुनकर उनके आगे अगला क़दम लिखिए।
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें