भाग 1 : दिमाग़ ख़ाली करो — उसूल 5 से 8
उसूल 5 — छोटी चीज़ें ही सबसे भारी होती हैं
लोग सोचते हैं कि उन्हें बड़े कामों का बोझ है।
ग़लत।
बड़े काम का बोझ नहीं होता। बड़े काम की चिंता होती है, जो अलग चीज़ है। नौकरी बदलनी है या नहीं — ये चिंता है, बोझ नहीं।
बोझ छोटी चीज़ें बनाती हैं।
वो बटन जो तीन महीने से टूटा है। वो बल्ब जो फ़्यूज़ है। वो मैसेज जिसका जवाब देना है। वो पर्ची जो जेब में पड़ी है।
इनमें से हर एक दो मिनट का काम है। और हर एक पिछले कई हफ़्तों से आपकी एक खिड़की खोले हुए है।
तीस छोटी चीज़ें — तीस खुली खिड़कियाँ।
और यही वो थकान है जिसे लोग "मुझे बहुत काम है" कहते हैं।
असल में आपको बहुत काम नहीं है। आपके पास बहुत सारे अधूरे काम हैं, जिनमें से ज़्यादातर दो मिनट के हैं।
तो एक नियम बना लीजिए, और ये इस पूरी किताब का सबसे तेज़ असर करने वाला नियम है :
अगर कोई काम दो मिनट से कम का है, तो उसे लिस्ट में मत डालिए। वहीं कर दीजिए।
लिस्ट में डालने, फिर पढ़ने, फिर याद करने, फिर करने में — दो मिनट से ज़्यादा लग जाएगा।
ये आज़माकर देखिए। एक शाम, एक घंटा, सिर्फ़ दो-मिनट वाले काम।
बल्ब बदल दीजिए। बटन लगा दीजिए। वो जवाब भेज दीजिए। वो पर्ची फेंक दीजिए।
एक घंटे में पंद्रह-बीस खिड़कियाँ बंद हो जाएँगी।
और उस रात की नींद अलग होगी। ये मैं दावे से कह रहा हूँ।
उसूल 6 — डिब्बा भरना और डिब्बा ख़ाली करना, दो अलग काम हैं
ये बात बहुत लोगों को नहीं पता, और इसी वजह से उनका सिस्टम टूट जाता है।
पकड़ना — यानी चीज़ को डिब्बे में डालना — ये पूरे दिन चलता है। हर वक़्त, बिना सोचे, दो सेकंड में।
और तय करना — यानी डिब्बे को ख़ाली करना — ये अलग वक़्त पर होता है, जान-बूझकर।
ये दोनों एक साथ करने की कोशिश मत कीजिए।
क्योंकि दोनों में दिमाग़ का अलग हिस्सा लगता है।
पकड़ने में सिर्फ़ हाथ लगता है। तय करने में सोचना पड़ता है — ये क्या है, इसका क्या करना है, अगला क़दम क्या है।
अगर आप हर चीज़ आते ही तय करने बैठ जाएँगे, तो आपका पूरा दिन दूसरों की भेजी चीज़ों को छाँटने में निकल जाएगा।
और शाम को आपको लगेगा कि आप दिनभर व्यस्त थे और कुछ हुआ नहीं।
ये लगभग हर उस आदमी की कहानी है जो दिनभर ईमेल के साथ रहता है।
तो डिब्बा भरते रहिए, बिना सोचे।
और डिब्बा ख़ाली करने का एक तय वक़्त रखिए — दिन में एक बार, या दो बार।
उसूल 7 — "कभी नहीं" कहना भी एक फ़ैसला है
जब आप अपनी लिस्ट देखेंगे, तो उसमें बहुत सी चीज़ें ऐसी होंगी जो आप कभी नहीं करेंगे।
वो कोर्स। वो किताब जो लिखनी थी। वो दुकान जो खोलनी थी। वो जगह जहाँ जाना था।
और आप उन्हें लिस्ट में रखे रहते हैं, क्योंकि काट देना ऐसा लगता है जैसे हार मान ली।
पर वो लिस्ट में पड़ी रहकर दो नुक़सान कर रही हैं।
पहला — हर बार जब आप लिस्ट पढ़ते हैं, वो आपको हल्का-सा अपराधबोध देती हैं।
दूसरा — और ये बड़ा है — उनकी वजह से पूरी लिस्ट भरोसे लायक़ नहीं रहती। जब आधी लिस्ट ऐसी चीज़ों की हो जो कभी नहीं होंगी, तो दिमाग़ पूरी लिस्ट को गंभीरता से लेना बंद कर देता है।
तो एक अलग जगह बनाइए। नाम रखिए — "शायद कभी"।
और वो सारी चीज़ें वहाँ डाल दीजिए।
ध्यान दीजिए — ये फेंकना नहीं है। ये अलग रखना है।
ये लिस्ट आप छह महीने में एक बार देखेंगे। और तब दो में से एक होगा : या तो कोई चीज़ अब सच में करने लायक़ लगेगी और आप उसे मुख्य लिस्ट में ले आएँगे, या आप उसे पढ़कर मुस्कुरा देंगे और आगे बढ़ जाएँगे।
दोनों ठीक हैं। दोनों में आपको हल्कापन मिलेगा।
जो नहीं मिलता, वो है उसे मुख्य लिस्ट में सालों तक ढोते रहने से।
उसूल 8 — भरोसा तीन हफ़्ते में बनता है
ये अध्याय एक चेतावनी है, ताकि आप बीच में न छोड़ें।
पहले हफ़्ते में कुछ ख़ास नहीं होगा।
आप चीज़ें लिखेंगे, और दिमाग़ फिर भी वही चीज़ें याद दिलाता रहेगा।
आपको लगेगा कि ये तरीक़ा काम नहीं कर रहा।
ऐसा इसलिए है क्योंकि आपका दिमाग़ आप पर भरोसा नहीं करता — और उसकी ठीक वजह है।
आपने पहले भी लिस्टें बनाई हैं। दो दिन चलीं और छूट गईं। आपने पहले भी कहा है कि "इस बार सिस्टम बना लूँगा"।
दिमाग़ आपका पुराना रिकॉर्ड देख रहा है, और रिकॉर्ड ख़राब है।
तो वो अपनी कॉपी अलग से रखे रहेगा — एहतियात के तौर पर।
तीन हफ़्ते लगते हैं।
तीन हफ़्ते तक अगर आप हर चीज़ उसी एक जगह डालते रहें, और उस जगह को नियम से देखते रहें — तो एक दिन कुछ बदलता है।
वो इस तरह पता चलता है : कोई काम आपको याद ही नहीं आता, और आप उसे लिस्ट में पाकर हैरान होते हैं।
उस दिन समझ लीजिए कि दिमाग़ ने भार सौंप दिया।
और उस दिन के बाद आपके सिर में जो जगह ख़ाली होगी, वो आपको ख़ुद हैरान करेगी।
इस महीने ये करो
पहला हफ़्ता : एक शाम, एक घंटा — सिर्फ़ दो-मिनट वाले काम निपटाइए।
दूसरा हफ़्ता : डिब्बा ख़ाली करने का एक तय समय बनाइए।
तीसरा हफ़्ता : "शायद कभी" वाली अलग लिस्ट बनाइए और उसमें सब डाल दीजिए।
चौथा हफ़्ता : कुछ मत बदलिए। बस चलाते रहिए। तीसरा हफ़्ता वही है जहाँ लोग छोड़ते हैं।
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