जो हमने कभी नहीं कहा
बरेठी एक छोटा क़स्बा है — एक रेलवे फाटक, एक बंद पड़ी चीनी मिल, और एक डिग्री कॉलेज। कमला मिश्रा वहाँ अड़तीस साल हिंदी पढ़ाती रहीं — तीखी ज़बान वाली, डरी जाने वाली, और उससे कहीं ज़्यादा नरम जितना कोई देख पाता है। उनके पति हरिनाथ रेलवे से रिटायर हैं और रोज़ सुबह उस फाटक तक जाते हैं जहाँ अब उनका कोई काम नहीं। बेटा आलोक बेंगलुरु में है और महीने में चार मिनट फ़ोन करता है। बेटी सुधा दो गली छोड़कर रहती है और सब कुछ संभालती है, चुपचाप। और इन सबके बीच छह साल पुराना एक वाक्य है, जो एक शादी में तीन सौ लोगों के सामने कहा गया था — और कभी वापस नहीं लिया गया। चौबीस अध्यायों का उपन्यास, जिसमें हर अध्याय क़स्बे के एक अलग इंसान पर ठहरता है और कमला उन सबसे होकर गुज़रती हैं — कभी केंद्र में, कभी किसी और की ज़िंदगी के किनारे से। उन बातों के बारे में जो कही नहीं जातीं, और उस क़ीमत के बारे में जो चुकानी पड़ती है।
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