बरेठी में कमला मिश्रा को लेकर दो बातें कही जाती हैं, और दोनों सच हैं।
पहली — कि उनसे बहस मत करो।
दूसरी — कि अगर सच में मुसीबत आ जाए, तो उन्हीं के पास जाओ।
ये दोनों बातें एक साथ कैसे सच हो सकती हैं, इस पर बरेठी ने कभी ठीक से नहीं सोचा। लोग सिर्फ़ जानते हैं कि ऐसा ही है।
सुबह नौ बजे वो सब्ज़ी मंडी से गुज़रती हैं। सफ़ेद बालों का जूड़ा, सूती साड़ी, कंधे पर झोला, हाथ में कुछ नहीं। चलने की रफ़्तार वही है जो अड़तीस साल से है — तेज़, बिना रुके, आगे देखते हुए।
दुकानदार उन्हें दूर से देख लेते हैं।
"नमस्ते मैडम।"
"नमस्ते। ये टमाटर कब के हैं?"
"आज सुबह के हैं मैडम।"
कमला एक टमाटर उठाती हैं, दबाती हैं, वापस रख देती हैं।
"आज सुबह के हैं तो मैं परसों की हूँ।"
आस-पास खड़े दो-तीन लोग हँस पड़ते हैं। दुकानदार भी हँसता है, थोड़ा शर्मिंदा।
"मैडम, आपसे कौन जीत सकता है।"
वो आधा किलो टमाटर तुलवाती हैं। उन्हीं टमाटरों में से।
ये भी बरेठी जानता है — कमला मिश्रा पकड़ लेंगी, कहेंगी, और फिर ले भी लेंगी। वो किसी की रोज़ी नहीं मारतीं। वो बस चाहती हैं कि आदमी को पता हो कि वो पकड़ी गई है।
मंडी के आख़िर में शर्मा जनरल स्टोर है।
निर्मला शर्मा वहीं बैठी रहती हैं, गद्दी पर, अपने पति के बग़ल में, और पूरे बाज़ार की जानकारी रखती हैं। बरेठी में कोई ख़बर तब तक ख़बर नहीं होती जब तक निर्मला शर्मा को न पता चल जाए।
"अरे मैडम! बहुत दिन बाद।"
"कल ही तो आई थी।"
"हाँ हाँ, बस ऐसे ही।" निर्मला थोड़ा आगे झुकती हैं। "सुना है आपका बेटा आने वाला है?"
कमला रुकती हैं।
एक पल के लिए। इतना छोटा कि निर्मला को शायद दिखा भी न हो।
"कहाँ से सुना?"
"अरे वो सुधा बता रही थी, दवाई लेने आई थी तो..."
"अच्छा।" कमला झोला ठीक करती हैं। "एक किलो चीनी दे दीजिए।"
"मैडम, चीनी तो कल ही ली थी आपने।"
"तो आज फिर ले रही हूँ।"
निर्मला चीनी तौलती हैं। और तौलते-तौलते वो कहती हैं, बिना ऊपर देखे — "बहू भी आ रही है क्या?"
कमला पैसे निकालती हैं, गिनती हैं, गद्दी पर रखती हैं।
"पचास का छुट्टा नहीं है?"
"है मैडम, है।"
वो छुट्टा लेती हैं, झोले में चीनी डालती हैं, और चली जाती हैं।
निर्मला अपने पति की तरफ़ देखती हैं और भौंहें उठाती हैं। और उनका पति, जो चालीस साल से इसी गद्दी पर बैठा है और जिसने बहुत कुछ देखा है, कहता है — "रहने दो।"
घर लौटते हुए कमला एक और रास्ता लेती हैं।
ये उनका आदतन रास्ता नहीं है। ये कॉलेज के सामने से निकलता है।
गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कॉलेज, बरेठी। पीली दीवार, नीम का पेड़, वही लोहे का गेट जिसका एक कब्ज़ा हमेशा से ढीला है।
वो गेट के सामने रुकती नहीं। बस धीमी हो जाती हैं।
अंदर से आवाज़ आ रही है — कोई क्लास चल रही है, कोई लड़की ऊँची आवाज़ में कुछ पढ़ रही है। शब्द साफ़ नहीं सुनाई देते।
अड़तीस साल।
चार हज़ार से ज़्यादा लड़कियाँ, अगर कोई गिने। कमला ने कभी गिना नहीं, पर उन्हें नाम याद हैं। बहुत सारे नाम। और उससे भी ज़्यादा चेहरे।
रिटायरमेंट के दिन प्रिंसिपल ने भाषण दिया था। लड़कियों ने माला पहनाई थी। किसी ने कहा था — "मैडम, आप हमारी माँ जैसी थीं।"
कमला ने उस दिन कुछ नहीं कहा था। सिर्फ़ सिर हिलाया था और चली आई थीं।
घर आकर उन्होंने साड़ी बदली, बाल खोले, और रसोई में जाकर खाना बनाना शुरू कर दिया। हरिनाथ ने कुछ पूछने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था — "प्याज़ ख़त्म हैं, कल ले आना।"
और उस रात, बहुत रात को, हरिनाथ की आँख खुली तो बगल की जगह ख़ाली थी। वो उठकर बाहर आए। कमला बरामदे में बैठी थीं, अंधेरे में।
उन्होंने पूछा नहीं। वो लौट आए और लेट गए।
ये उनकी शादी की सबसे समझदार बात थी, और सबसे बुरी भी। उन्हें दोनों का अंदाज़ा है।
कॉलेज से आगे बढ़कर सड़क मुड़ती है, और वहाँ बैंक है।
प्रीति उस बैंक में है। कैशियर।
कमला उस तरफ़ नहीं देखतीं। कभी नहीं देखतीं।
बरेठी छोटी जगह है — तीस हज़ार की आबादी, तीन बड़ी सड़कें, एक बाज़ार। यहाँ किसी से बचना आसान नहीं है। पर पंद्रह साल से कमला मिश्रा और प्रीति सक्सेना ने एक-दूसरे से बचने का तरीक़ा निकाल रखा है।
बात इतनी बड़ी नहीं थी। कमला ने उन्नीस सौ छियानबे में एक वाक्य कहा था, स्टाफ़ रूम के बाहर, दो और टीचरों के सामने।
प्रीति उस वक़्त सोलह की थी।
कमला को वो वाक्य याद है। ये उन्हें ख़ुद हैरान करता है — कि इतने सालों में इतना कुछ कहा गया, और यही एक वाक्य क्यों टिका रह गया।
पर उन्होंने कभी किसी से इस बारे में बात नहीं की। और अब पंद्रह साल बाद, उस बात का ज़िक्र करना और भी अजीब लगेगा।
तो वो बैंक के सामने से गुज़र जाती हैं, तेज़ चाल से, आगे देखते हुए।
घर पर हरिनाथ बरामदे में बैठे मिलते हैं।
"आ गईं?"
"नहीं, दिख नहीं रही?"
वो झोला रसोई में रखती हैं। चीनी का डिब्बा पहले से भरा हुआ है। वो नई चीनी उसके ऊपर डाल देती हैं और ढक्कन बंद कर देती हैं।
फिर बाहर आती हैं।
"सुधा ने निर्मला शर्मा को बताया है कि आलोक आ रहा है।"
हरिनाथ अख़बार से ऊपर देखते हैं। "तो?"
"तो कुछ नहीं।" कमला कुर्सी खींचकर बैठ जाती हैं। "अभी तो उसने कहा भी नहीं है ठीक से। और पूरा बाज़ार जान गया।"
"छोटी जगह है।"
"छोटी जगह है," वो दोहराती हैं। "यही सबसे बड़ी दिक़्क़त है।"
कुछ देर दोनों चुप बैठे रहते हैं। सड़क पर एक ट्रैक्टर गुज़रता है।
फिर हरिनाथ कहते हैं, बहुत सादे तरीक़े से — "वो आ रहा है, यही बड़ी बात है।"
कमला जवाब नहीं देतीं।
पर वो उठती भी नहीं। वो वहीं बैठी रहती हैं, हरिनाथ के बगल में, बहुत देर तक — जो कि उनके हिसाब से एक बहुत लंबा जवाब है।
दोपहर में वो अलमारी खोलती हैं।
ऊपर वाले ख़ाने में चादरें हैं, जो सालों से इस्तेमाल नहीं हुईं। अच्छी वाली चादरें। शादी में मिली थीं।
वो एक निकालती हैं, खोलकर देखती हैं। तह वाली जगह पर हल्का पीलापन आ गया है।
वो उसे वापस रख देती हैं और दूसरी निकालती हैं।
फिर वो अलमारी बंद कर देती हैं, बिना कुछ निकाले।
अभी तारीख़ तय नहीं हुई है। अभी सिर्फ़ इतना है कि आलोक ने पिछले फ़ोन में कहा था — "देखते हैं, शायद इस बार आ जाएँ।"
"शायद।"
कमला उस शब्द को अच्छी तरह जानती हैं। अड़तीस साल तक उन्होंने लड़कियों को यही सिखाया है कि शब्द मायने रखते हैं। कौन-सा शब्द कहाँ रखा गया है, इससे पूरा वाक्य बदल जाता है।
"शायद आ जाएँ" का मतलब है कि अभी टिकट नहीं ली गई है।
और अभी टिकट नहीं ली गई है, इसका मतलब है कि अभी उस औरत से बात नहीं हुई है।
कमला अलमारी के सामने खड़ी रहती हैं, कुछ देर।
फिर वो रसोई में चली जाती हैं और दाल चढ़ा देती हैं, जो अभी चढ़ाने का वक़्त नहीं है।
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