बरेठी में दिन की शुरुआत फाटक से होती है।
सुबह छह बजकर दस मिनट पर पैसेंजर आती है, और उससे सात मिनट पहले फाटक गिर जाता है। उन सात मिनटों में सड़क के दोनों तरफ़ जो जमा होता है, वही असल में बरेठी है — दूध वाले, स्कूल के बच्चे, दो-तीन मोटरसाइकिलें, कोई बूढ़ा आदमी साइकिल पकड़े, और गाय जो फाटक के नीचे से निकल जाती है क्योंकि उसे किसी का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
हरिनाथ मिश्रा सैंतीस साल इसी स्टेशन पर रहे। पहले पंद्रह साल पॉइंट्समैन, फिर बाईस साल सहायक स्टेशन मास्टर। रिटायर हुए छह साल हो गए। पर आदत नहीं गई।
वो अब भी सुबह उठकर फाटक तक चले आते हैं। कोई काम नहीं होता। बस खड़े रहते हैं, हाथ पीछे बाँधे, और गाड़ी को निकलते देखते हैं।
बंसी, जो अब फाटक पर है और जो हरिनाथ के सामने नौकरी में आया था, हर सुबह वही कहता है — "मास्टर साहब, आपका टाइम अब भी सही चल रहा है।"
और हरिनाथ हर सुबह वही जवाब देते हैं — "गाड़ी का टाइम सही चले, वो बड़ी बात है।"
दोनों जानते हैं कि ये बातचीत नहीं है। ये एक तरह का नमस्कार है, जो शब्दों में हो रहा है।
पैसेंजर निकल जाती है। फाटक उठता है। भीड़ छँट जाती है।
हरिनाथ पलटते हैं और घर की तरफ़ चलते हैं। रास्ते में मिश्रा जी की दुकान से एक अख़बार लेते हैं — वही अख़बार जो घर में आता है, पर वो एक और ख़रीद लेते हैं। इसकी कोई वजह उन्होंने कभी किसी को नहीं बताई, और किसी ने पूछा भी नहीं।
वजह ये है कि घर पहुँचकर अख़बार कमला ले लेती हैं। और वो पहले पढ़ती हैं। और जब तक वो पढ़ती रहती हैं, तब तक हरिनाथ को इंतज़ार करना पड़ता है, और इंतज़ार में उन्हें कुछ करने को नहीं होता।
तो अब दो अख़बार आते हैं। कमला ने एक बार पूछा था — "दो क्यों?"
हरिनाथ ने कहा था — "पंडित जी बूढ़े हो गए हैं, उनकी दुकान से भी ले लेता हूँ।"
कमला ने कुछ नहीं कहा। पर उन्हें पता था। कमला को हमेशा पता होता है।
घर पर वो पहले बरामदे में बैठते हैं, फिर अंदर जाते हैं। यही क्रम है, बीस साल से।
रसोई से आवाज़ आती है — "चाय ठंडी हो रही है।"
"आ रहा हूँ।"
"कब से आ रहे हो।"
वो अंदर जाते हैं। कमला मेज़ पर बैठी हैं, चश्मा नाक पर नीचे सरका हुआ, अख़बार का तीसरा पन्ना खुला हुआ। उनके सामने चाय है, हरिनाथ की चाय ढँकी हुई है।
"फाटक पर गए थे?"
"हाँ।"
"वहाँ क्या रखा है अब।"
हरिनाथ चाय उठाते हैं। "कुछ नहीं।"
"तो जाते क्यों हो।"
वो जवाब नहीं देते। कमला भी जवाब की उम्मीद नहीं करतीं। ये भी एक तरह का नमस्कार है।
अड़तालीस साल हो गए इस शादी को।
बरेठी में लोग कहते हैं कि हरिनाथ जी बहुत सहनशील आदमी हैं। ये बात उनके सामने कोई नहीं कहता, पर वो जानते हैं कि कही जाती है। कभी-कभी कोई नया आदमी, जो नहीं जानता कि क्या कहना चाहिए, कह भी देता है — "आपकी वाइफ़ तो बड़ी... सख़्त हैं।"
हरिनाथ मुस्कुरा देते हैं। और बात बदल देते हैं।
उन्होंने कभी किसी से नहीं कहा कि उन्नीस सौ अठहत्तर की उस बाढ़ में, जब पूरा नीचे वाला मोहल्ला डूब गया था और स्कूल में लोग भर गए थे, कमला ने ग्यारह दिन तक उस स्कूल में खाना बनाया था। सुबह चार बजे से रात ग्यारह बजे तक। किसी ने कहा नहीं था। किसी ने बाद में शुक्रिया भी नहीं कहा, क्योंकि कमला ने किसी को बताया ही नहीं।
और जब सब ख़त्म हो गया, तो वो घर आईं, और उन्होंने हरिनाथ से सिर्फ़ इतना कहा — "तुम्हारी क़मीज़ का बटन टूटा हुआ है, दिखता नहीं?"
ये बात हरिनाथ को अब भी याद है।
वो कभी नहीं समझ पाए कि उस औरत के अंदर वो सब कहाँ रहता है — और वो बाहर क्यों नहीं आता।
नौ बजे कमला तैयार होकर निकलती हैं। बाज़ार जाती हैं, हालाँकि सब्ज़ी वाला घर तक आता है।
हरिनाथ जानते हैं कि वो बाज़ार क्यों जाती हैं। तीस साल तक वो रोज़ इस सड़क से गुज़री हैं, कॉलेज जाते हुए। पूरा बरेठी उन्हें उसी रास्ते पर देखने का आदी है। और अब जब वो नहीं पढ़ातीं, तब भी वो उसी वक़्त उसी सड़क पर निकलती हैं।
अगर कोई पूछे तो वो कहेंगी — "धनिया लेना था।"
दरवाज़ा बंद होता है। घर ख़ाली हो जाता है।
और हरिनाथ, जो सैंतीस साल तक हर दिन जानते थे कि अगले घंटे में उन्हें क्या करना है, अब बरामदे में बैठ जाते हैं और सड़क देखते हैं।
दोपहर में डाकिया आता है। कुछ नहीं लाता — बिजली का बिल, कोई सरकारी काग़ज़, कभी-कभी बैंक से कुछ।
पर हरिनाथ फिर भी बरामदे में रहते हैं, उस वक़्त।
आलोक को गए ग्यारह साल हो गए। पहले तीन साल वो हर महीने चिट्ठी लिखता था। फिर फ़ोन आ गया, और चिट्ठियाँ बंद हो गईं। ये ठीक ही हुआ, हरिनाथ ने अपने आप से कहा था। फ़ोन में आवाज़ तो सुनाई देती है।
पर एक बात है जो उन्होंने कभी किसी से नहीं कही।
चिट्ठी को आप बार-बार पढ़ सकते हैं।
वो चिट्ठियाँ अब भी अलमारी में हैं, एक पुराने लिफ़ाफ़े में, रबर बैंड से बँधी हुई। कमला को पता है कि वो वहाँ हैं। उन्होंने कभी उन्हें छुआ नहीं, और कभी उनका ज़िक्र नहीं किया।
शाम को सुधा आती है।
वो हर तीसरे दिन आती है, कभी-कभी रोज़। उसका घर दो गली छोड़कर है। वो कुछ न कुछ लेकर आती है — दवा, सब्ज़ी, कोई मिठाई — और बीस मिनट बैठकर चली जाती है।
"पापा, दवा खाई?"
"खा ली।"
"सच में?"
"अरे खा ली, बेटा।"
कमला रसोई से बोलती हैं — "नहीं खाई। डिब्बे में गोली पड़ी है, मैंने देखी है।"
सुधा हँसती है। हरिनाथ भी हँस देते हैं, थोड़ा शर्मिंदा होकर, और गोली निकालकर खा लेते हैं।
सुधा जाने लगती है तो कमला दरवाज़े तक आती हैं और कहती हैं — "अगली बार इतनी जल्दी मत जाना।"
सुधा कहती है — "अच्छा।"
और चली जाती है।
दोनों जानती हैं कि "अगली बार इतनी जल्दी मत जाना" का मतलब कुछ और था। पर वो शब्द इस घर में उपलब्ध नहीं हैं।
रात को खाना जल्दी होता है। साढ़े आठ बजे लाइट बंद।
बिस्तर पर लेटे-लेटे कभी-कभी हरिनाथ कोई बात छेड़ते हैं। ज़्यादातर बरेठी की बात — किसकी दुकान बंद हो गई, कौन बीमार है, चीनी मिल के गेट पर अब भी वही ताला है।
कमला हूँ-हाँ करती हैं।
और फिर, बहुत बार, जब हरिनाथ को लगता है कि वो सो गई हैं, तब अंधेरे में उनकी आवाज़ आती है :
"आलोक का फ़ोन इस महीने आया था?"
हरिनाथ कुछ देर चुप रहते हैं। फिर कहते हैं — "आया था। पिछले इतवार।"
"क्या कह रहा था।"
"ठीक है। सब ठीक है वहाँ।"
"बच्चा कैसा है।"
"अच्छा है।"
फिर चुप्पी।
फिर — "तुमने मेरे बारे में पूछा था उससे?"
और यहाँ हरिनाथ हमेशा झूठ बोलते हैं।
"पूछा था। कह रहा था माँ को नमस्ते बोल देना।"
अंधेरे में कुछ नहीं होता। कोई आवाज़ नहीं, कोई हरकत नहीं। पर हरिनाथ को हर बार लगता है कि उनके बगल में कोई चीज़ थोड़ी-सी ढीली पड़ती है।
फिर कमला कहती हैं — "सो जाओ। सुबह फिर फाटक पर जाना है।"
ये उनकी ज़िंदगी है।
बाहर से देखने पर बरेठी के किसी भी घर जैसी। एक बूढ़ा आदमी जो सुबह फाटक तक जाता है। एक बूढ़ी औरत जो बिना ज़रूरत के बाज़ार जाती है। एक बेटी जो दो गली छोड़कर रहती है और रोज़ आती है। एक बेटा जो बहुत दूर है।
और उन सबके बीच में एक चीज़ है जो कभी कही नहीं गई।
वो चीज़ छह साल पहले, आलोक की शादी के दिन कही गई थी। एक वाक्य। कमला के मुँह से।
उस दिन के बाद से बहुत कुछ कहा गया है — फ़ोन पर, त्योहारों पर, चिट्ठियों में — पर वो वाक्य कभी वापस नहीं लिया गया।
और जब तक वो वापस नहीं लिया जाता, बाक़ी सब कुछ बस शोर है।
सुबह छह बजकर तीन मिनट पर फाटक फिर गिरेगा।
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