प्रीति सक्सेना बैंक में तीसरी खिड़की पर बैठती है। नक़दी। सुबह दस से शाम चार।
उन्नीस साल हो गए इसी खिड़की पर। बीच में एक बार तबादला हुआ था, अस्सी किलोमीटर दूर, पर वो सात महीने में वापस आ गई — सास बीमार थीं और बच्चा छोटा था।
अब बच्चा बीस का है और सास नहीं हैं, और प्रीति अब भी तीसरी खिड़की पर बैठती है।
वो अच्छी कैशियर है। नोट गिनने में उसका हाथ इतना तेज़ है कि नए लड़के देखते रह जाते हैं। मैनेजर कहते हैं कि पूरे ज़िले में ऐसी सफ़ाई नहीं मिलेगी।
प्रीति सुनकर मुस्कुरा देती है और अगला ग्राहक बुला लेती है।
दोपहर के क़रीब वो खिड़की से बाहर देखती है और सड़क पर एक सफ़ेद जूड़ा देखती है।
उसका हाथ रुकता नहीं। नोट गिनते रहते हैं। पर उसके अंदर, बहुत नीचे, एक चीज़ अपनी जगह से थोड़ी हिल जाती है।
कमला मैडम आगे देखते हुए चली जाती हैं। उन्होंने बैंक की तरफ़ नहीं देखा।
वो कभी नहीं देखतीं।
प्रीति नोट का बंडल बाँधती है, रबर चढ़ाती है, दराज़ में रखती है।
"अगला।"
बात उन्नीस सौ छियानबे की है। जनवरी का महीना। कॉलेज में निबंध प्रतियोगिता थी।
विषय था — "मेरे गाँव की एक शाम"।
प्रीति ने वो निबंध घर पर लिखा था, रात को, जब सब सो गए थे। उसने बरेठी के बारे में लिखा था — फाटक के बारे में, बंद पड़ी चीनी मिल के बारे में, और उन औरतों के बारे में जो शाम को छत पर आकर बैठती हैं और नीचे देखती हैं और कुछ नहीं कहतीं।
उसने एक जगह लिखा था कि बरेठी की शाम ऐसी लगती है जैसे किसी ने बात शुरू करके बीच में छोड़ दी हो।
वो सोलह की थी। उसे नहीं पता था कि ये अच्छी लाइन है। उसे बस ऐसा लगा था, तो उसने लिख दिया।
तीन दिन बाद उसे स्टाफ़ रूम बुलाया गया।
कमला मैडम खड़ी थीं, हाथ में उसकी कॉपी। बगल में दो और टीचर — सक्सेना मैडम और वो नए वाले सर जो एक साल बाद चले गए थे।
"ये तुमने लिखा है?"
"जी मैडम।"
"पूरा?"
"जी।"
कमला मैडम ने कॉपी खोली और एक जगह उँगली रखी।
"ये लाइन कहाँ से ली है?"
प्रीति समझी नहीं। "मैडम?"
"मैं पूछ रही हूँ कि ये कहाँ से ली है। किसी किताब से? किसी ने लिखवाया?"
और फिर उन्होंने वो वाक्य कहा। बहुत शांत आवाज़ में, बिना ग़ुस्से के, जैसे कोई तथ्य बता रहा हो :
"ये तुम्हारी भाषा नहीं है।"
स्टाफ़ रूम में तीन लोग थे। किसी ने कुछ नहीं कहा।
प्रीति खड़ी रही। उसे लगा कि उसे कुछ कहना चाहिए, पर उसे समझ नहीं आया कि क्या। वो सिर्फ़ इतना बोल पाई — "मैंने ही लिखा है।"
कमला मैडम ने कॉपी बंद कर दी। "ठीक है। जाओ।"
बस।
न कोई सज़ा हुई। न कोई शिकायत गई। नतीजे में उसका नाम भी आया — तीसरा स्थान।
उसे तीसरे स्थान का सर्टिफ़िकेट मिला और उसने उसे घर लाकर अलमारी में रख दिया, और फिर कभी नहीं देखा।
उसने उसके बाद कुछ नहीं लिखा।
ये कोई फ़ैसला नहीं था। उसने ये तय नहीं किया कि "अब मैं नहीं लिखूँगी।" ऐसा कुछ नहीं हुआ।
बस अगली बार जब कुछ लिखने का मन हुआ, तो कॉपी खोलते वक़्त उसे वो स्टाफ़ रूम याद आया। और उसने कॉपी बंद कर दी। सोचा, बाद में लिखूँगी।
फिर बारहवीं आ गई। फिर बी.ए.। फिर बैंक की परीक्षा। फिर शादी।
और उन्नीस साल बाद, वो तीसरी खिड़की पर बैठी नोट गिन रही है।
ये कहना ग़लत होगा कि उसकी ज़िंदगी ख़राब है।
पति ठीक है। सरकारी नौकरी, शराब नहीं पीता, बच्चों से प्यार करता है। बेटा इंजीनियरिंग कर रहा है, भोपाल में। बेटी अभी बारहवीं में है और उससे ज़्यादा बहस करती है जितनी प्रीति ने अपनी ज़िंदगी में कभी की।
घर अपना है। गाड़ी है। पैसे की दिक़्क़त नहीं।
अगर कोई पूछे तो प्रीति कहेगी — "सब ठीक है, भगवान की कृपा है।"
और वो सच बोल रही होगी।
पर कभी-कभी, रात को, जब सब सो जाते हैं, वो रसोई में खड़ी रह जाती है। बिना कुछ किए। बस खड़ी।
और उसे लगता है कि उसकी ज़िंदगी में कहीं एक कमरा है जिसे उसने खोला ही नहीं। दरवाज़ा वहीं है, दीवार में। उसने उसे रोज़ देखा है। पर उसने कभी हाथ नहीं लगाया, क्योंकि सोलह की उम्र में किसी ने कह दिया था कि ये कमरा उसका नहीं है।
पिछले साल बेटी ने स्कूल से एक कविता लाकर दिखाई थी।
"मम्मी, ये देखो, मैंने लिखी है।"
प्रीति ने पढ़ी। ठीक-ठाक थी। सोलह साल की लड़की जैसी।
और फिर उसके अंदर से एक वाक्य ऊपर आया — बहुत तेज़ी से, बिना बुलाए — ये तुम्हारी भाषा नहीं है।
वो सिहर गई।
उसने कविता वापस दी और कहा — "बहुत अच्छी है बेटा। और लिखना।"
बेटी ख़ुश होकर चली गई।
और प्रीति उस रात बहुत देर तक जागी रही। इसलिए नहीं कि कमला मैडम ने उसके साथ क्या किया था।
बल्कि इसलिए कि उसे पता चल गया था कि वो वाक्य अब उसके अंदर रहता है। और अगर वो ज़रा-सा भी ढीली पड़ती, तो वो उसके मुँह से निकलकर उसकी बेटी में चला जाता।
और फिर वो वहाँ अगले तीस साल बैठा रहता।
चार बजे बैंक बंद होता है। साढ़े पाँच तक हिसाब मिलता है।
प्रीति बाहर निकलती है, स्कूटी स्टार्ट करती है, और घर की तरफ़ मुड़ती है।
रास्ता कॉलेज के सामने से जाता है। पीली दीवार, नीम का पेड़, ढीला कब्ज़ा।
और वहीं, गेट से थोड़ा आगे, उसे वो दिखती हैं।
कमला मैडम खड़ी हैं। सड़क के किनारे। कुछ ख़रीद नहीं रहीं, किसी से बात नहीं कर रहीं। बस खड़ी हैं और कॉलेज की तरफ़ देख रही हैं।
प्रीति की स्कूटी धीमी होती है।
वो चाहे तो रुक सकती है। बीस साल हो गए। अब वो सोलह की नहीं है, अब वो अड़तीस की है, उसके अपने बच्चे हैं, और वो पूरे ज़िले में सबसे तेज़ नोट गिनती है।
वो रुक सकती है और कह सकती है — "मैडम, वो निबंध मैंने ही लिखा था।"
बस इतना। एक वाक्य के बदले एक वाक्य।
वो धीमी होती है। और फिर वो एक्सीलेटर घुमा देती है।
घर पर बेटी का पेपर है कल, और उसे खाना बनाना है, और वैसे भी अब क्या फ़ायदा। बीस साल पुरानी बात है। मैडम को शायद याद भी न हो।
वो निकल जाती है।
सड़क के किनारे खड़ी कमला उस स्कूटी को जाते हुए देखती हैं।
उन्होंने उसे पहचान लिया था। वो हमेशा पहचान लेती हैं।
वो कुछ देर वहीं खड़ी रहती हैं, फिर घर की तरफ़ मुड़ जाती हैं।
उस निबंध की एक लाइन उन्हें अब भी याद है। बरेठी की शाम के बारे में — कि वो ऐसी लगती है जैसे किसी ने बात शुरू करके बीच में छोड़ दी हो।
वो लाइन इतनी अच्छी थी कि कमला को यक़ीन नहीं हुआ था।
और यक़ीन न होने और आरोप लगाने के बीच जो एक क़दम होता है, वो उन्होंने उस दिन उठा लिया था — और फिर पूरी ज़िंदगी वापस नहीं ले पाईं।
अड़तीस साल की नौकरी में उन्होंने बहुत लड़कियों को बनते देखा।
पर आदमी को वो एक याद रहता है जिसे उसने तोड़ा हो।
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें