पंद्रहवीं सदी का भारत. सिकंदर लोदी का दिल्ली पर राज. हिंदू और मुसलमान — दो धाराएँ देश में बहती. हर तरफ़ धर्म के नाम पर भेद-भाव. हर तरफ़ अहंकार. हर तरफ़ अपने-अपने ईश्वर की लड़ाई. एक तरफ़ ब्राह्मण कहते — "हमारा राम सत्य है." दूसरी तरफ़ मुल्ला कहते — "हमारा अल्लाह असली है." और बीच में पिसते — साधारण लोग — समझ ही नहीं पाते — असली ख़ुदा है कौन?
ऐसे काले समय में काशी की उन तंग गलियों में, गंगा के किनारे — एक अद्भुत आत्मा का अवतार होने वाला था. एक ऐसी आत्मा जो दोनों सम्प्रदायों को छोड़ कर सीधे ईश्वर तक का रास्ता दिखा देगी. एक ऐसी आत्मा जिसे न हिंदू अपना कह पाएँगे, न मुसलमान — फिर भी दोनों उसके सामने झुकेंगे. एक ऐसी आत्मा जो एक साधारण जुलाहे के घर में पलेगी पर पूरी दुनिया को आध्यात्मिक चमक देगी.
उसका नाम था — कबीर.
कबीर साहब के बारे में अनेक बातें कही जाती हैं. एक कथा कहती है — वे एक विधवा ब्राह्मणी की संतान थे, जो लोक-लाज के डर से बच्चे को लहरतारा तालाब में छोड़ आई. एक कथा कहती है — वे साईं की कृपा से सीधे लहरतारा तालाब में प्रकट हुए — एक कमल की पंखुड़ियों पर पड़े हुए. एक कथा कहती है — वे एक गुप्त ब्राह्मण विधवा के बच्चे थे जिन्हें मुसलमान दम्पती ने उठा लिया. इन बातों में सच्चाई कितनी है — इसका उत्तर कबीर साहब ख़ुद नहीं देते. वे कहते — "मैं हूँ कौन — यह जानने की कोशिश मत करो. मैं हूँ क्या — यह समझो."
जो भी सत्य हो, इतना तो निश्चित है — कबीर का पालन-पोषण नीरू और नीमा नाम के एक मुसलमान जुलाहे दम्पती ने किया. वे काशी की एक तंग गली में रहते थे. कपड़ा बुनना — यही उनका जीवन-निर्वाह. लहरतारा तालाब के पास से एक दिन वे एक नवजात शिशु लेकर आए. उन्हें कोई पता नहीं था यह बच्चा कौन है, कहाँ से आया है. लेकिन उसकी आँखों में जो तेज था — उसने उन दोनों के दिल को छू लिया. उन्होंने उसे अपना बेटा माना. और नाम रखा — कबीर.
कबीर — एक अरबी शब्द. इसका अर्थ है — महान. जो सबसे बड़ा है. जो सबसे ऊँचा है. क्या नीरू-नीमा को कुछ अंदाज़ा था कि उन्होंने जो नाम रखा वो कितना सही साबित होगा? शायद नहीं. वो तो बस एक मुसलमान बच्चे के लिए मनभावन नाम चुन रहे थे. लेकिन भविष्य के पन्नों में यह नाम पाँच सौ साल बाद भी, करोड़ों दिलों में गूंजेगा.
कबीर बड़े होने लगे. लेकिन वे साधारण बच्चे की तरह नहीं थे. वे शुरू से ही कुछ अलग थे. हिंदू पंडितों की पूजा देखते — और मन में सवाल उठते. मुल्लाओं की नमाज़ देखते — और मन में सवाल उठते. वे माँ नीमा से पूछते — "अम्मा, ये लोग किसे पूजते हैं? क्या वो भगवान सब के लिए अलग-अलग है?"
नीमा के पास इन सवालों का जवाब नहीं होता. वो बस अपने बेटे के सिर पर हाथ फेर देती और कहती — "बेटा, तू बड़ा होकर अपने आप जान लेगा."
और कबीर ने सच में बड़े होकर जान लिया. उन्होंने जान लिया कि — हिंदू का राम और मुसलमान का रहीम — एक ही है. वे दो नाम हैं — एक ही ज्योति के. उन्होंने जान लिया कि — मूर्ति की पूजा भी मायने नहीं रखती और मस्जिद की नमाज़ भी मायने नहीं रखती — अगर भीतर का दिल साफ़ नहीं है तो. उन्होंने जान लिया कि — जात-पात, ऊँच-नीच, गरीब-अमीर — ये सब इंसान के बनाए हुए विभाग हैं. ईश्वर के यहाँ ये कुछ नहीं हैं.
और इस ज्ञान को उन्होंने एक अद्भुत तरीके से व्यक्त किया — दोहों में, साखियों में, पदों में. साधारण भाषा. साधारण उदाहरण. किसान की भाषा. जुलाहे की भाषा. लेकिन उन शब्दों में जो गहराई थी — आज भी पाँच सौ साल बाद — दुनिया उसे समझने की कोशिश कर रही है.
कबीर साहब ने कोई मठ नहीं बनाया. कोई संप्रदाय नहीं बनाया. कोई शिष्य-परंपरा नहीं चलाई. वे कहते — "मेरे साथ तुम्हें कहीं नहीं जाना है. तुम जहाँ हो — वहीं से ईश्वर को पाओ. अपना रास्ता ख़ुद बनाओ. बाहरी पूजा-पाठ छोड़ो. अंदर झाँको. वहीं वो छिपा है."
यह संदेश इतना सरल था कि साधारण लोगों को भी समझ में आया. यह संदेश इतना गहरा था कि बड़े-बड़े विद्वान भी कबीर साहब के सामने झुक गए. और यह संदेश इतना समय-बाह्य था कि आज भी, पाँच शताब्दियों बाद भी, करोड़ों लोग कबीर साहब के दोहों को अपने जीवन का आधार मानते हैं.
इस तीस अध्यायों की किताब में हम कबीर साहब की पूरी जीवन-गाथा पढ़ेंगे. उनके जन्म से लेकर उनकी मगहर की महानिर्वाण तक. हर अध्याय में एक नई कथा. एक नई शिक्षा. एक नया दीप जो आपके दिल में जलेगा.
लेकिन कथा शुरू करने से पहले — एक पल रुक जाइए. आँखें बंद कीजिए. और मन में एक बार सोचिए —
"साधो, कौन गांव?"
ये कबीर साहब की एक प्रसिद्ध पुकार है. साधो — मतलब साधक, सज्जन, खोजी. और साधो को वे पूछते थे — तेरा गांव कौन सा है? तेरा असली घर कहाँ है? यह दुनिया तेरा घर नहीं है — यह तो बस एक रास्ता है. असली घर — जहाँ तू जाने वाला है — वहाँ तेरा कौन है?
इस सवाल का जवाब — हम तीस अध्यायों के अंत में पाएँगे.
जय जय कबीर साहब.
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