काशी. भारत की सबसे पुरानी पवित्र नगरी. गंगा का पवित्र किनारा. यहाँ पंद्रहवीं सदी के मध्य में लहरतारा नाम का एक छोटा सा तालाब था. आज भी वो जगह है — कबीर भक्तों का तीर्थ-स्थान. उसके किनारे एक मुसलमान जुलाहा दम्पती रहता था — नीरू और नीमा.
नीरू-नीमा का जीवन साधारण था. नीरू सुबह-शाम कपड़ा बुनता. नीमा घर का काम करती. उनकी कोई संतान नहीं थी. कई बरस बीत गए — पर माँ की गोद नहीं भरी. नीमा रोज़ रात अल्लाह से दुआ करती — "हे रब्ब, मुझे एक औलाद दे. एक बच्चा भी काफ़ी है."
एक दिन सुबह नीरू नहाने लहरतारा गया था. वो तालाब के पानी में डुबकी मार रहा था. अचानक उसकी नज़र पानी पर तैर रहे एक कमल के फूल पर पड़ी. लेकिन फूल साधारण नहीं था. उस पर — चमत्कारिक रूप से — एक नवजात शिशु लेटा हुआ था. आँखें बंद. साँस चल रही. लेकिन — कमल के फूल पर बच्चा? कैसे?
नीरू ने भीगे हाथों से उसे उठाया. बच्चा बहुत सुंदर था. सुनहरी त्वचा. घुँघराले बाल. और जब उसने आँखें खोलीं — नीरू को लगा जैसे उन आँखों में कुछ अलौकिक सा था. एक हलकी सी मुस्कान बच्चे के होठों पर थी. जैसे वो जानता हो कि कौन उसे उठा रहा है.
नीरू के हाथ काँपने लगे. उसे समझ नहीं आया क्या करे. क्या यह बच्चा किसी का है? कोई इसे यहाँ छोड़ गया? या यह कोई चमत्कार है? वह घबरा कर घर भागा. नीमा को सब बताया. नीमा ने अपनी गोद में बच्चे को लिया — और रो पड़ी. ख़ुशी के आँसू.
"नीरू, यह तो ख़ुदा का तोहफ़ा है. हम बेऔलाद थे. ख़ुदा ने हमें यह बच्चा भेजा है. इसे पालेंगे." नीरू ने सिर हिलाया. लेकिन उसके मन में अभी भी सवाल थे.
मोहल्ले के लोगों ने सुना — नीरू को तालाब में बच्चा मिला. कुछ लोग जलते हुए कहने लगे — "यह कोई हराम का बच्चा होगा. किसी ने वहाँ छोड़ दिया होगा. नीरू, इसे मत रखो. मुसीबत में पड़ोगे." कुछ अन्य लोग कहते — "रखो. अल्लाह ने भेजा है. यह बरकत लाएगा." नीरू-नीमा ने ज़माने के तानों की परवाह नहीं की. उन्होंने बच्चे को अपना बेटा मान लिया. और नाम रखा — कबीर.
बच्चा बड़ा होने लगा. लेकिन कुछ अलग था उसमें. वो दूसरे बच्चों की तरह नहीं था. वो शांत था. कम बोलता था. जब कोई उसके सामने झगड़ा करता — उसकी आँखें भर आतीं. जब कोई किसी पर अत्याचार करता — वो चुपचाप जाकर उस पीड़ित के पास बैठ जाता.
नीमा अक्सर देखती — कबीर अकेले में बैठा कुछ बुदबुदाता रहता. वो पास जाकर सुनती. कभी "राम" शब्द. कभी "रहीम" शब्द. कभी कोई अज्ञात मंत्र. वो हैरान होकर पूछती — "बेटा, तू क्या बोल रहा है?" कबीर मुस्कुराकर कहता — "अम्मा, मेरे अंदर एक आवाज़ है. वो मुझसे बोलती है. मैं बस उसका जवाब दे रहा हूँ."
नीमा को कुछ समझ नहीं आता. लेकिन उसके दिल में एक अहसास होता — यह बच्चा कोई साधारण बच्चा नहीं है.
एक दिन छोटा कबीर अपनी अम्मा नीमा से पूछा — "अम्मा, जब हम मस्जिद जाते हैं, हम अल्लाह को पुकारते हैं. लेकिन जब काशी के पंडित मंदिर जाते हैं, वो भगवान को पुकारते हैं. क्या ये दोनों एक ही हैं? या अलग-अलग हैं?"
नीमा हैरान रह गई. एक छह साल का बच्चा ऐसे सवाल कैसे पूछता है? उसने कहा — "बेटा, तू अभी छोटा है. ये सब तू बड़ा होकर समझेगा."
लेकिन कबीर के मन से सवाल नहीं हटा. वो हर रोज़ सोचता. क्या अल्लाह और राम एक हैं? अगर हाँ, तो लोग दो धर्मों में क्यों लड़ते हैं? अगर अलग हैं, तो असली ख़ुदा कौन सा है?
जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया, इन सवालों ने उसके दिल में जड़ पकड़ ली. वो काशी के घाटों पर घूमता. साधुओं को देखता. पंडितों को देखता. मुल्लाओं को देखता. हर एक से कुछ सीखने की कोशिश करता. लेकिन कोई भी उसे संतोषजनक जवाब नहीं देता था. हर कोई बस अपनी पूजा-पद्धति को सही ठहराता. कबीर थक गया था इन ख़ोखले जवाबों से.
एक रात कबीर बिस्तर पर लेटा था. उसकी उम्र अब बारह साल हो चुकी थी. वो छत की तरफ़ देख रहा था. और मन में एक प्रबल इच्छा उठी — "मुझे कोई गुरु चाहिए. ऐसा गुरु जो मुझे सीधे ईश्वर तक पहुँचा दे. कोई पंडित नहीं, कोई मुल्ला नहीं — एक सच्चा गुरु."
उसने आँखें बंद कीं. और अंदर से एक आवाज़ आई — "स्वामी रामानंद. काशी के सबसे बड़े संत. वो ही तेरे गुरु बनेंगे."
कबीर ने आँखें खोलीं. उसके मन में अब एक नया मक़सद था. कल सुबह वो रामानंद जी के पास जाएगा. चाहे जो भी हो. और इस मुलाक़ात ने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया. वो कथा हम अगले अध्याय में पढ़ेंगे.
जय कबीर साहब.
जय राम-रहीम.
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