1 अध्याय १: भूमिका — कबीर साहब का काल और संदेश FREE 2 अध्याय २: लहरतारा तालाब और चमत्कारी बालक FREE 3 अध्याय ३: रामानंद की दीक्षा — एक अद्भुत मुलाक़ात FREE 4 अध्याय ४: जुलाहा बना संत — काम और भक्ति का संगम FREE 5 अध्याय ५: लोई से विवाह FREE 6 अध्याय ६: कमाल और कमाली — संतान और संतान-धर्म FREE 7 अध्याय ७: हिंदू-मुसलमान — दोनों का खंडन FREE 8 अध्याय ८: पंडितों से वाद-विवाद FREE 9 अध्याय ९: मुल्लाओं से वाद-विवाद FREE 10 अध्याय १०: सिकंदर लोदी का प्रसंग FREE 11 अध्याय ११: साधुओं की संगति FREE 12 अध्याय १२: ब्रह्म ज्ञान — पहली अनुभूति FREE 13 अध्याय १३: दोहे और साखियाँ — रचना का जन्म FREE 14 अध्याय १४: एक चोर का परिवर्तन FREE 15 अध्याय १५: भक्ति बनाम कर्मकांड FREE 16 अध्याय १६: एक राजा का अहंकार-नाश FREE 17 अध्याय १७: ग़रीब विधवा की मदद FREE 18 अध्याय १८: साईं की भक्ति का स्वरूप FREE
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अध्याय ३: रामानंद की दीक्षा — एक अद्भुत मुलाक़ात

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पंद्रहवीं सदी की काशी में एक संत का नाम सबकी ज़बान पर था — स्वामी रामानंद. वैष्णव संप्रदाय के महान आचार्य. हजारों शिष्यों के गुरु. उनका आश्रम पंचगंगा घाट पर था. वहाँ हर रोज़ सैकड़ों भक्त इकठ्ठा होते. राम-नाम का जप गूंजता. भजन-कीर्तन होता. रामानंद जी का तेज ऐसा था कि एक नज़र देखने से ही लोगों के दिल बदल जाते.

लेकिन एक बात थी. रामानंद जी एक ब्राह्मण आचार्य थे — और उस ज़माने में जातिगत नियम बहुत कठोर थे. ब्राह्मण गुरु अपने शिष्य भी ब्राह्मण ही चुनते. किसी निम्न जाति के व्यक्ति को — और मुसलमान को तो बिल्कुल भी — मंत्र-दीक्षा नहीं देते थे.

बारह साल का कबीर यह सब जानता था. वह जानता था कि अगर वो सीधे रामानंद जी के पास जाकर शिष्य बनने की प्रार्थना करेगा — तो उसे टका-सा जवाब मिलेगा. एक मुसलमान जुलाहे का बेटा — एक हिंदू ब्राह्मण आचार्य का शिष्य? असंभव.

लेकिन कबीर के मन में एक प्रबल विश्वास था. उसे लगता था — रामानंद जी ही मेरे गुरु हैं. यह बात सिर्फ़ उसे ही नहीं — रामानंद जी को भी पता है. बस — उन्हें यह कहने का तरीक़ा खोजना था.

कबीर ने एक दिन-रात बैठ कर सोचा. और एक तरकीब निकाली. एक चालाक तरकीब. एक ऐसी तरकीब जो शायद किसी भक्त-कथा में पहले कभी न सुनी गई हो.

रामानंद जी का नियम था — हर रोज़ सुबह तीन बजे — पूरी काशी सोई होती थी — वे पंचगंगा घाट पर स्नान के लिए जाते थे. उनके साथ कोई शिष्य नहीं. कोई सेवक नहीं. वो अकेले — हाथ में लोटा — सीढ़ियाँ उतरते. ब्रह्म-मुहूर्त की उस अंधेरी पवित्रता में उनका स्नान होता.

कबीर को यह सब पता चल गया. उसने तय किया — कल सुबह तीन बजे मैं उसी सीढ़ी पर लेट जाऊँगा. इस तरह कि गुरु जी का पैर मुझ पर पड़े. मेरे ऊपर पैर पड़ते ही — चौंक कर — उनके मुँह से कुछ निकलेगा. वही मेरा गुरु-मंत्र होगा.

रात गुजरी. कबीर चुपके से घर से निकला. पंचगंगा घाट पर पहुँचा. अंधेरा था. सिर्फ़ गंगा का पानी मद्धम सी आवाज़ कर रहा था. कबीर ने एक सीढ़ी चुनी — बीच की एक सीढ़ी. वहाँ चुपचाप लेट गया. कंबल ओढ़ा. आँखें बंद कीं. और इंतज़ार किया.

तीन बजे — रामानंद जी आए. हाथ में लोटा. साधारण भगवा वेष. वो सीढ़ियाँ उतरते थे — एक-एक कदम — ध्यान से. लेकिन उस अंधेरे में, उन्होंने देखा नहीं कि बीच में कोई लेटा है. उनका दायाँ पैर — सीधे — कबीर की छाती पर पड़ा.

रामानंद जी चौंके. हैरान हो गए. एक पल को बैलेंस खो बैठे. लेकिन उन्होंने तुरंत संभाला. और जो शब्द उनके मुँह से अनायास निकले — वो थे —

"राम राम, बेटा! तू यहाँ क्या कर रहा है?"

वो शब्द — "राम राम" — कबीर ने सीधे कान से सुने. उसकी आँखें खुलीं. वो उठा. रामानंद जी के पैरों पर साष्टांग गिरा. और कहा —

"गुरु जी, आज से आप मेरे गुरु हैं. आपने मुझे राम-नाम का दान दिया. यही मेरा मंत्र है. यही मेरी दीक्षा."

रामानंद जी हतप्रभ हो गए. उन्होंने पूछा — "बेटा, तू कौन है? तेरा नाम क्या है?"

कबीर ने अपना नाम बताया. अपना मोहल्ला बताया. अपने नीरू-नीमा माँ-बाप के बारे में बताया. रामानंद जी सुनते रहे. उनकी आँखों में पहले हैरानी थी. फिर — धीरे-धीरे — एक मुस्कान फैली. एक गहरी, करुणा भरी मुस्कान.

उन्होंने कबीर के सिर पर हाथ रखा. और कहा — "बेटा, तू एक मुसलमान का बेटा है. लेकिन तेरे दिल में जो श्रद्धा है — वो किसी ब्राह्मण के दिल में भी मुश्किल से होगी. तूने जो तरकीब निकाली — वो भी ख़ुद ईश्वर ने ही निकलवाई होगी. क्योंकि अगर तू सीधे आता — मैं शायद ना कहता. लेकिन अब — मैं ना नहीं कह सकता. क्योंकि तेरी श्रद्धा ने मुझे पराजित कर दिया."

"आज से तू मेरा शिष्य है. राम-नाम तेरा गुरु-मंत्र है. इस मंत्र को कभी मत भूलना. इसे रात-दिन जपना. यही तेरे जीवन की चाबी है."

कबीर के चेहरे पर आँसू थे. ख़ुशी के आँसू. उसने रामानंद जी का हाथ पकड़ा. और कहा — "गुरु जी, आपने मुझे अपना ख़ज़ाना दिया है. मैं आपका जीवन भर कृतज्ञ रहूँगा. आपके राम-नाम की ज्योति मेरे दिल में जलती रहेगी."

रामानंद जी ने कबीर को आशीर्वाद दिया. और कहा — "बेटा, मेरे आश्रम में आ जा. यहाँ बैठ कर अध्ययन कर." कबीर ने मना किया. कहा — "गुरु जी, मुझे अध्ययन की ज़रूरत नहीं. आपने मुझे जो दिया है — वो काफ़ी है. अब मैं अपनी जुलाहागिरी जारी रखूँगा. कपड़ा बुनूँगा. लेकिन हर ताने-बाने के साथ — राम-नाम का जप करूँगा. यही मेरी पूजा होगी."

रामानंद जी मुस्कुराए. कहा — "तू सच्चा शिष्य है. ऐसी बातें — कोई-कोई शिष्य ही समझता है. जा. अपना काम कर. और राम-नाम जप. एक दिन तेरी ख्याति काशी से बाहर निकल कर पूरी दुनिया में फैलेगी."

कबीर लौटा. उसके दिल में अब एक मंत्र था — "राम". वो काम करता. कपड़ा बुनता. खाता-पीता. सोता. लेकिन हर साँस के साथ — राम-नाम. हर ताने-बाने के साथ — राम-नाम. हर एक काम — राम के नाम पर.

और इस "राम" में जो कबीर ने देखा — वो हिंदुओं का सीमित राम नहीं था. वो एक निराकार, सर्वव्यापी, सबका राम था. जो अल्लाह भी था. जो रहीम भी था. जो ख़ुदा भी था. एक ही ज्योति — हज़ार नाम.

जय कबीर साहब. जय गुरु रामानंद.

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