सोचना आपको आगे ले जाता है। ज़्यादा सोचना आपको उसी जगह गोल-गोल घुमाता रहता है — और थका देता है।
एक बात से शुरू करते हैं जो ज़्यादातर लोग गड़बड़ कर देते हैं।
लोग समझते हैं कि ओवरथिंकिंग का मतलब है "बहुत सोचना"। ग़लत। मात्रा की बात ही नहीं है। एक इंजीनियर घंटों किसी डिज़ाइन पर सोचता है — वो ओवरथिंकिंग नहीं है। एक माँ पूरे दिन बच्चे के एडमिशन के बारे में सोचती है — वो भी ज़रूरी नहीं कि ओवरथिंकिंग हो।
फ़र्क़ समय का नहीं, दिशा का है।
सोचना सीधी लाइन में चलता है। ज़्यादा सोचना गोल घूमता है।
ये समझिए। आपको कल ऑफ़िस में एक प्रेज़ेंटेशन देना है।
सोचना ऐसा दिखता है — "स्लाइड्स तैयार हैं? नहीं, तीन बाकी हैं। ठीक है, आज रात एक घंटा लगाऊँगा। बॉस शायद बजट पर सवाल पूछेंगे, उसके नंबर याद कर लेता हूँ।" ये सोच कहीं पहुँचती है। इसके बाद आप उठकर काम करते हैं। और जब काम हो जाता है, सोच अपने आप बंद हो जाती है।
ज़्यादा सोचना ऐसा दिखता है — "कल अगर बॉस ने बीच में टोक दिया तो? पिछली बार भी तो टोका था। सबके सामने बेइज़्ज़ती हो गई थी। वैसे मुझे ये प्रोजेक्ट लेना ही नहीं चाहिए था। मैं इस काम के लिए बना ही नहीं हूँ। अगर कल भी ऐसा हुआ तो शायद अप्रेज़ल में असर पड़ेगा। और अगर अप्रेज़ल ख़राब हुआ तो..." — और डेढ़ घंटे बाद आप उसी जगह हैं जहाँ से शुरू किया था। स्लाइड्स अभी भी तीन बाक़ी हैं।
यही असली पहचान है। सोचने के बाद कुछ बदलता है। ज़्यादा सोचने के बाद सिर्फ़ आप थकते हैं।
पहचानने के चार आसान इशारे
एक — कोई नई बात नहीं आती। आप वही तीन-चार लाइनें बार-बार दोहरा रहे हैं। दसवीं बार सोचने पर भी वही निकल रहा है जो पहली बार निकला था। अगर सोचने से कोई नई जानकारी नहीं आ रही, तो वो सोचना नहीं है — वो रिकॉर्डिंग है जो लूप पर चल रही है।
दो — कोई फ़ैसला नहीं निकलता। असली सोच का अंत होता है — "ठीक है, ये करूँगा।" ओवरथिंकिंग का कोई अंत नहीं होता। वो थकने पर रुकती है, हल मिलने पर नहीं।
तीन — सवाल "क्यों" और "अगर" से शुरू होते हैं। "उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?" "अगर मैंने वो नौकरी ले ली होती तो?" इन सवालों का कोई जवाब है ही नहीं। ये सवाल दिखते सवाल जैसे हैं, पर असल में ये दरवाज़े हैं जो सिर्फ़ अंदर खुलते हैं। इनके मुक़ाबले "अब मैं क्या कर सकता हूँ?" — इस सवाल का जवाब हमेशा होता है।
चार — शरीर तंग आ जाता है। कंधे अकड़ जाते हैं, जबड़ा भिंच जाता है, पेट में अजीब-सा भारीपन रहता है। साधारण सोच शरीर पर असर नहीं डालती। ओवरथिंकिंग डालती है, क्योंकि शरीर को लगता है कि सच में कोई ख़तरा सामने खड़ा है।
एक और चीज़ जिससे धोखा होता है
ओवरथिंकिंग बहुत चालाक है। वो ख़ुद को "तैयारी" बताकर आती है।
आप ख़ुद से कहते हैं — "मैं सोच नहीं रहा, मैं तो हर पहलू देख रहा हूँ। समझदार आदमी ऐसे ही करता है।" और यहीं वो आपको फँसा लेती है। क्योंकि तैयारी और चिंता में एक साफ़ फ़र्क़ है।
तैयारी का नतीजा होता है — आप शांत हो जाते हैं। चिंता का नतीजा होता है — आप और घबरा जाते हैं।
अगर आधा घंटा सोचने के बाद आपके अंदर हल्कापन है, तो वो तैयारी थी। अगर आधे घंटे बाद आप पहले से ज़्यादा भारी महसूस कर रहे हैं, तो नाम कुछ भी रख लीजिए — वो चिंता ही थी।
तो करना क्या है
अभी कुछ नहीं। इस अध्याय का काम इलाज करना नहीं, पहचान करवाना है।
अगले कुछ दिन बस देखिए। जब भी सोच में डूबे मिलें, अपने आप से एक सवाल पूछिए — "ये सोच मुझे कहीं ले जा रही है, या गोल घुमा रही है?"
जवाब आपको तुरंत पता चल जाएगा। और यही जानना, ये पूरी किताब की पहली सीढ़ी है।
एक लाइन में
सोचने से हल निकलता है, ज़्यादा सोचने से सिर्फ़ थकान — फ़र्क़ समय का नहीं, दिशा का है।
आज ये करो
आज दिन में एक बार, जब आप किसी बात में उलझे हों, ख़ुद से पूछिए — "पिछले दस मिनट में कोई नई बात मिली?" अगर जवाब "नहीं" है, वहीं उठ जाइए। कहीं भी। बस उस कुर्सी से उठ जाइए।
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