आपका दिमाग़ ख़राब नहीं है। वो ठीक वही कर रहा है जिसके लिए बना था — बस ज़माना बदल गया और वो नहीं बदला।
हज़ारों साल पहले की बात है। एक आदमी जंगल के किनारे बैठा है। झाड़ी में कुछ हिलता है।
अब दो तरह के लोग थे। पहला सोचता था — "हवा होगी।" दूसरा सोचता था — "शेर हो सकता है।" ज़्यादातर बार हवा ही होती थी। पहला वाला आदमी ज़्यादा सही रहता था।
लेकिन एक बार, सिर्फ़ एक बार, अगर सच में शेर निकला — तो पहला वाला ख़त्म। और दूसरा वाला, जो हमेशा सबसे बुरा सोचता था, वो बच गया। वो ज़िंदा रहा। उसके बच्चे हुए।
हम सब उसी दूसरे वाले आदमी की औलाद हैं।
ये समझ लीजिए, क्योंकि इससे बहुत कुछ हल्का हो जाता है। आपका दिमाग़ आपको ख़ुश रखने के लिए नहीं बना। वो आपको ज़िंदा रखने के लिए बना। और ज़िंदा रखने का उसका तरीक़ा यही है — ख़तरा ढूँढो, बार-बार ढूँढो, और जब तक हल न मिले, चैन से मत बैठो।
दिक्क़त ये है कि अब झाड़ी में शेर नहीं है। अब झाड़ी में बॉस का वो मैसेज है जिसमें लिखा है "कल मिलते हैं।" और दिमाग़ उसे भी उसी तरह ट्रीट करता है जैसे शेर को करता था।
दिमाग़ अधूरी बात नहीं छोड़ पाता
एक और वजह है, और ये और भी दिलचस्प है।
आपने देखा होगा — जो फ़िल्म आपने पूरी देख ली, वो दिमाग़ से उतर जाती है। जो सीरीज़ बीच में छूट गई, वो हफ़्तों याद रहती है। जो झगड़ा सुलझ गया, वो भूल जाता है। जो झगड़ा अधूरा रह गया, वो सालों बाद भी रात में जाग जाता है।
दिमाग़ अधूरी चीज़ों को पकड़कर रखता है। ये उसका सिस्टम है — "काम बाक़ी है" वाली फ़ाइल वो बंद नहीं करता।
अब सोचिए। ज़्यादा सोचने वाली ज़्यादातर बातें कैसी होती हैं? अधूरी। "उसने ऐसा क्यों कहा" — जवाब कभी नहीं मिलेगा। "अगर मैंने वो नौकरी ले ली होती तो" — पता कभी नहीं चलेगा। "वो मेरे बारे में क्या सोचता है" — कोई बताएगा नहीं।
ये सब हमेशा के लिए अधूरी फ़ाइलें हैं। और दिमाग़ उन्हें बार-बार खोलता रहता है, ये सोचकर कि इस बार शायद पूरा हो जाए।
सबसे बड़ा धोखा — "सोचने से कंट्रोल में है"
ये वाली बात ध्यान से पढ़िए, क्योंकि यही असली जड़ है।
जब कोई चीज़ आपके हाथ में नहीं होती, तो बहुत बेचैनी होती है। रिपोर्ट आने वाली है, इंटरव्यू का जवाब आना है, बच्चे का रिज़ल्ट आना है। आप कुछ नहीं कर सकते। और कुछ न कर पाना, इंसान के लिए सबसे मुश्किल हालत है।
तो दिमाग़ एक जुगाड़ करता है। वो सोचना शुरू कर देता है।
सोचने से लगता है कि आप कुछ कर रहे हैं। हाथ-पैर भले न हिल रहे हों, पर अंदर कुछ चल रहा है। ऐसा महसूस होता है जैसे आप हालात पर मेहनत कर रहे हैं।
ये पूरा धोखा है। हवाई जहाज़ में बैठकर घबराने से जहाज़ सुरक्षित नहीं होता। रिज़ल्ट के बारे में रातभर सोचने से नंबर नहीं बदलते।
पर दिमाग़ को थोड़ा-सा आराम ज़रूर मिल जाता है — "चलो, कम से कम मैं इसे नज़रअंदाज़ तो नहीं कर रहा।" और यही थोड़ा-सा आराम इस आदत को ज़िंदा रखता है। जैसे खुजली — खुजाने से अच्छा लगता है, और खुजली बढ़ जाती है।
फिर उम्मीद कहाँ है
यहाँ — दिमाग़ बदल सकता है।
दिमाग़ पत्थर नहीं है। वो रास्तों की तरह काम करता है। जिस रास्ते पर आप बार-बार चलते हैं, वो चौड़ा और आसान हो जाता है। जिस पर नहीं चलते, उस पर घास उग आती है।
पिछले कई सालों से आप एक ही रास्ते पर चल रहे हैं — सोचो, घूमो, थको। वो रास्ता अब हाइवे बन चुका है। इसलिए दिमाग़ अपने आप उसी पर मुड़ जाता है।
पर जिस दिन आप बार-बार दूसरा रास्ता लेना शुरू करेंगे — वो नया रास्ता भी चौड़ा होने लगेगा। और पुराना हाइवे धीरे-धीरे सुनसान।
इसमें जादू नहीं है, वक़्त लगता है। पर ये होता है। हर उस इंसान के साथ हुआ है जिसने कोशिश की।
तो आज से अपने दिमाग़ को दुश्मन मत समझिए। वो आपका पुराना चौकीदार है, जो ज़रूरत से ज़्यादा वफ़ादार हो गया है। उससे लड़ना नहीं है। उसे नया काम सिखाना है।
एक लाइन में
दिमाग़ आपको ख़ुश रखने नहीं, ज़िंदा रखने के लिए बना है — और वो अब भी हर मैसेज में शेर ढूँढ रहा है।
आज ये करो
आज जब भी सोच का दौरा पड़े, मन में एक लाइन कहिए — "ये मेरा चौकीदार है, ख़तरा नहीं।" बस इतना। इसे रोकने की कोशिश मत कीजिए, सिर्फ़ नाम दे दीजिए।
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