ज़्यादातर लोग अपनी क़ाबिलियत का आधा भी इस्तेमाल किए बिना चले जाते हैं। नाकाम होकर नहीं — बस बहुत छोटा लक्ष्य लेकर, और उसे पा लेकर।
एक आदमी की कहानी सुनिए। शायद आपको जानी-पहचानी लगे।
उसने ठीक-ठाक पढ़ाई की। ठीक-ठाक नौकरी मिल गई। शादी हो गई, बच्चे हुए, घर की किश्त शुरू हो गई।
अब वो पचास साल का है। सब कुछ ठीक है। कोई बड़ी शिकायत नहीं।
पर कभी-कभी, रात में, जब सब सो जाते हैं — उसके अंदर एक अजीब-सा सवाल उठता है।
"बस? यही था?"
वो किसी से ये नहीं कहता। कहेगा भी तो लोग हँसेंगे — "और क्या चाहिए तुझे?"
पर वो सवाल जाता नहीं। क्योंकि उसे कहीं गहरे पता है कि उसके अंदर कुछ और भी था, जो कभी बाहर नहीं आया।
ये किताब उसी "कुछ और" के बारे में है।
पहले एक ग़लतफ़हमी दूर करते हैं
"अपनी असली ऊँचाई तक पहुँचना" सुनते ही लोगों के दिमाग़ में एक तस्वीर बनती है — करोड़ों रुपये, बड़ी गाड़ी, स्टेज, तालियाँ, लोग आपका नाम जानते हों।
ये किताब उसके बारे में नहीं है।
मशहूर होना और अपनी क़ाबिलियत तक पहुँचना — दो अलग चीज़ें हैं। बहुत से मशहूर लोग अंदर से ख़ाली हैं। और बहुत से ऐसे लोग जिन्हें कोई नहीं जानता, अपनी पूरी ऊँचाई पर जी रहे हैं।
असली सवाल ये है :
जो आपके अंदर है, क्या वो बाहर आ रहा है?
वो टीचर जो अपने बच्चों को सच में बदल देती है — वो अपनी ऊँचाई पर है।
वो कारीगर जिसके काम में जान है — वो अपनी ऊँचाई पर है।
वो माँ जो अपने बच्चों को एक बेहतर इंसान बना रही है — वो अपनी ऊँचाई पर है।
ऊँचाई का मतलब दूसरों से ऊपर होना नहीं है। इसका मतलब है अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचना।
असली दुश्मन नाकामी नहीं है
हम सोचते हैं कि सबसे बड़ा ख़तरा नाकाम होना है।
ग़लत।
सबसे बड़ा ख़तरा है — आराम से मिली हुई औसत ज़िंदगी।
नाकामी दर्द देती है, और दर्द आपको हिलाता है। आप कुछ बदलते हैं।
पर एक ठीक-ठाक ज़िंदगी में दर्द नहीं होता। बस एक हल्की-सी बेचैनी होती है, जो इतनी छोटी होती है कि आप उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं। साल दर साल।
और यही आपको सबसे धीमे तरीक़े से रोक देती है — बिना किसी शोर के।
ये किताब आपसे क्या माँगेगी
तीन चीज़ें। पहले से बता देता हूँ।
पहली : ईमानदारी। कुछ अध्यायों में आपको ऐसे सवालों के जवाब देने होंगे जिनसे आप बच रहे हैं। अगर आप वहाँ अच्छा दिखने की कोशिश करेंगे, तो किताब बेकार हो जाएगी।
दूसरी : धीरज। यहाँ कोई नब्बे दिन में ज़िंदगी बदलने वाला वादा नहीं है। जो चीज़ें असल में बदलती हैं, वो सालों में बदलती हैं। हाँ, दिशा नब्बे दिन में बदल सकती है — और दिशा ही सब कुछ है।
तीसरी : काम। हर अध्याय के अंत में एक छोटा काम है। पढ़ने से समझ आता है, करने से बदलाव आता है। दोनों को एक मत समझिए।
और ये किताब क्या नहीं करेगी
ये आपसे ये नहीं कहेगी कि "बस सोच लो और सब मिल जाएगा।"
ये आपसे ये भी नहीं कहेगी कि "रोज़ चार बजे उठो, नहीं तो तुम्हारा कुछ नहीं होगा।"
और ये आपको बताने की कोशिश नहीं करेगी कि आपकी ऊँचाई क्या होनी चाहिए। ये सिर्फ़ आपको वो सवाल देगी जिनसे आप ख़ुद ये तय कर सकें।
क्योंकि किसी और का बताया हुआ लक्ष्य पाकर भी वही ख़ालीपन रहता है। ये बहुत लोगों के साथ होता है — वो पहुँच जाते हैं, और फिर पूछते हैं, "अब क्या?"
एक सवाल, शुरू करने से पहले
अपने आप से एक सवाल पूछिए। और जल्दी जवाब मत दीजिए।
"अगर मैं अगले दस साल बिल्कुल ऐसे ही जिया जैसे पिछला एक साल जिया है — तो दस साल बाद मैं कहाँ खड़ा होऊँगा?"
तस्वीर बनाइए। सच्ची वाली।
कुछ लोगों को ये तस्वीर अच्छी लगेगी। अगर आपको लगती है, तो बहुत बढ़िया — आप सही रास्ते पर हैं, बस चलते रहिए।
और अगर उस तस्वीर को देखकर अंदर कुछ खटकता है — तो ये किताब आपके लिए है।
वो खटकना बुरी चीज़ नहीं है। वो आपके अंदर का वो हिस्सा है जो जानता है कि आप इससे ज़्यादा के लायक़ हैं।
उसे सुनिए।
एक लाइन में
सबसे बड़ा ख़तरा नाकामी नहीं, आराम से मिली औसत ज़िंदगी है — जो बिना शोर किए आपको रोक देती है।
आज ये करो
एक काग़ज़ पर उस सवाल का जवाब लिखिए — "अगर अगले दस साल बिल्कुल ऐसे ही चले, तो मैं कहाँ खड़ा होऊँगा?" तीन-चार लाइन में, ईमानदारी से। इसे संभालकर रखिए, आख़िरी अध्याय में काम आएगा।
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