बुरी ज़िंदगी आपको नहीं रोकती। आप उससे भाग जाते हैं। जो चीज़ आपको सालों तक एक जगह बाँधे रखती है, वो एक ठीक-ठाक ज़िंदगी होती है।
एक बात पर ग़ौर कीजिए।
अगर आपकी नौकरी बहुत बुरी हो — बॉस बदतमीज़, तनख़्वाह कम, इज़्ज़त नहीं — तो आप छोड़ देंगे। शायद तीन महीने में।
पर अगर वो नौकरी ठीक-ठाक हो? तनख़्वाह चल जाती है, लोग ठीक हैं, ज़्यादा दबाव नहीं?
तो आप दस साल रुक जाएँगे।
यही जाल है। और ये सबसे ख़तरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें कोई तकलीफ़ नहीं होती। तकलीफ़ इंसान को हिलाती है। आराम नहीं हिलाता।
तीन चीज़ें जो आपको बाँधे रखती हैं
पहली : "ठीक तो चल रहा है"
ये चार शब्द दुनिया की सबसे ज़्यादा क़ाबिलियत बर्बाद कर चुके हैं।
क्योंकि ये सच होते हैं। सच में ठीक चल रहा होता है। खाना मिल रहा है, छत है, कोई बड़ी मुसीबत नहीं।
और जब तक कुछ "ग़लत" न हो, बदलने की कोई वजह नहीं दिखती।
पर एक बात याद रखिए — "ठीक" हमेशा "बहुत बढ़िया" का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। जो चीज़ ठीक चल रही है, उसे छोड़ना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि छोड़ने की कोई मजबूरी नहीं होती।
दूसरी : आस-पास के लोग
अगर आपके सारे दोस्त वही कर रहे हैं जो आप कर रहे हैं — वही नौकरी, वही शिकायतें, वही शनिवार — तो आपको कभी नहीं लगेगा कि कुछ छूट रहा है।
औसत का पैमाना आपके आस-पास से बनता है। और अगर आपके आस-पास सब औसत हैं, तो औसत ही "सामान्य" लगता है।
इसीलिए बहुत से लोग तब जागते हैं जब वो किसी नई जगह जाते हैं और देखते हैं कि लोग कैसे जी रहे हैं।
तीसरी : पहचान बन जाना
दस साल एक जगह रहने के बाद वो जगह आपकी नौकरी नहीं रहती। वो आपकी पहचान बन जाती है।
"मैं बैंक वाला हूँ।" "मैं टीचर हूँ।" "हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता।"
और पहचान छोड़ना नौकरी छोड़ने से हज़ार गुना मुश्किल है। क्योंकि तब सवाल ये नहीं रहता कि "मैं क्या करूँगा" — सवाल ये हो जाता है कि "फिर मैं कौन हूँ?"
एक सवाल जो जाल दिखा देता है
अपने आप से पूछिए :
"पिछले तीन साल में मैंने ऐसा क्या किया जो पहले नहीं कर पाता था?"
कोई नया हुनर। कोई नई ज़िम्मेदारी। कोई ऐसी चीज़ जो पहले मुश्किल लगती थी।
अगर जवाब आसानी से आ जाए — बढ़िया, आप बढ़ रहे हैं।
अगर जवाब देने में देर लगे, या ईमानदारी से कहें तो कुछ याद न आए — तो आपने तीन साल जिए नहीं। आपने एक साल जिया, तीन बार।
ये बात कड़वी है। पर इसे जानना ज़रूरी है, क्योंकि जो चीज़ दिखती नहीं, वो बदली नहीं जा सकती।
अब सबसे ज़रूरी बात
इस अध्याय को पढ़कर एक ग़लत नतीजा मत निकालिए।
मैं ये नहीं कह रहा कि सबको नौकरी छोड़ देनी चाहिए, या हर आदमी को कुछ बड़ा करना ही चाहिए।
बहुत से लोगों की ज़िंदगी में एक साधारण, स्थिर, शांत ढाँचा होना ज़रूरी है — क्योंकि घर चल रहा है, बच्चे पढ़ रहे हैं, माता-पिता की दवा आ रही है। ये कोई कमज़ोरी नहीं है। ये ज़िम्मेदारी है, और उसका सम्मान है।
सवाल नौकरी छोड़ने का है ही नहीं।
सवाल ये है — क्या आप अपनी ज़िंदगी के उस हिस्से में भी नहीं बढ़ रहे जो पूरी तरह आपके हाथ में है?
आपकी नौकरी शायद आपके हाथ में न हो। पर वो दो घंटे जो आप रोज़ फ़ोन पर बिताते हैं, वो आपके हाथ में हैं।
आपकी तनख़्वाह शायद आपके हाथ में न हो। पर आप कोई नया हुनर सीख रहे हैं या नहीं, ये आपके हाथ में है।
औसत का जाल पैसे का जाल नहीं है। ये उस सोच का जाल है जो कहती है — "मेरे पास कोई विकल्प नहीं है।"
ज़्यादातर लोगों के पास कम विकल्प होते हैं, ये सच है। पर शून्य विकल्प लगभग किसी के पास नहीं होते।
बाहर निकलने का पहला क़दम
पूरी छलाँग मत लगाइए। ये सबसे बड़ी ग़लती है — लोग सब कुछ छोड़कर कूद जाते हैं और छह महीने में वापस आ जाते हैं।
छोटा दरवाज़ा खोलिए।
हफ़्ते में पाँच घंटे निकालिए। सिर्फ़ पाँच। और उन पाँच घंटों में वो चीज़ शुरू कीजिए जो आपके दिल में सालों से पड़ी है।
सीखना, बनाना, लिखना, पढ़ाना, कुछ बेचना — जो भी हो।
पाँच घंटे से कोई ज़िंदगी रातों-रात नहीं बदलती। पर एक साल में ढाई सौ घंटे हो जाते हैं। और ढाई सौ घंटे में इंसान कुछ भी शुरू कर सकता है।
दरवाज़ा खोलना ज़रूरी है। बाहर निकलने की जल्दी नहीं है।
एक लाइन में
"ठीक चल रहा है" ही सबसे बड़ा जाल है — बुरी ज़िंदगी से लोग भाग जाते हैं, ठीक-ठाक ज़िंदगी में दस साल बैठे रहते हैं।
आज ये करो
उस सवाल का जवाब लिखिए — "पिछले तीन साल में मैंने ऐसा क्या सीखा जो पहले नहीं आता था?" और इस हफ़्ते के लिए पाँच घंटे कैलेंडर में तय कर दीजिए। कौन-से दिन, कौन-सा वक़्त — लिख दीजिए।
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