दिनभर में आप जितनी बातें किसी और से करते हैं, उससे कहीं ज़्यादा अपने आप से करते हैं। और वो बातचीत आपकी ज़िंदगी तय कर रही है — बिना आपकी इजाज़त के।
सुबह आँख खुली। पहला ख़याल क्या था?
शायद — "उफ़, फिर सुबह हो गई।" शायद — "आज बहुत काम है, पता नहीं हो पाएगा या नहीं।"
आईने के सामने खड़े हुए। क्या कहा अपने आप से?
गाड़ी की चाबी नहीं मिली। क्या निकला मुँह से — या मन से?
"मुझे कुछ याद ही नहीं रहता। मैं हूँ ही ऐसा।"
दिन ख़त्म होते-होते ऐसी सैकड़ों लाइनें अंदर से गुज़र चुकी होती हैं। आप उन्हें गिनते नहीं, सुनते भी ठीक से नहीं। पर वो अपना काम कर रही होती हैं।
एक छोटा-सा हिसाब
मान लीजिए दिन में सिर्फ़ पचास बार आप अपने आप से कुछ कहते हैं।
महीने में पंद्रह सौ बार। साल में अठारह हज़ार बार। दस साल में लगभग दो लाख बार।
अब सोचिए — अगर उन दो लाख बार में से आधे भी आपके ख़िलाफ़ थे, तो क्या हुआ होगा?
कोई दुश्मन आपको इतना नुक़सान नहीं पहुँचा सकता जितना आपने अपने आप को पहुँचा दिया — बिना ये जाने कि आप ऐसा कर रहे हैं।
एक सवाल जो लोगों को चुप करा देता है
अगर आपका कोई दोस्त पूरे दिन आपके पीछे-पीछे चलता रहे और हर काम पर वही कहे जो आप अपने आप से कहते हैं —
"देख, फिर गड़बड़ कर दी।"
"तुझसे नहीं होगा।"
"सब तुझसे बेहतर हैं।"
"तू ऐसा ही है, कभी नहीं सुधरेगा।"
— तो आप उसे कितने दिन बर्दाश्त करेंगे?
एक दिन भी नहीं। आप उससे बात करना बंद कर देंगे।
और वही आवाज़ आपके अंदर बीस-तीस साल से चल रही है, चौबीसों घंटे, और आपने उसे कभी टोका तक नहीं।
ये किताब क्या है
ये उस आवाज़ को बदलने की किताब है।
इसमें तीन काम होंगे।
पहला — सुनना। ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता कि वो अपने आप से क्या कहते हैं। वो आवाज़ इतनी पुरानी है कि वो पृष्ठभूमि का शोर बन चुकी है — जैसे पंखे की आवाज़, जो चलती रहती है और सुनाई नहीं देती।
दूसरा — पकड़ना। दिमाग़ कुछ ख़ास तरह के झूठ बार-बार बोलता है। जब आप उन झूठों के नाम जान लेंगे, तो वो पकड़ में आने लगेंगे।
तीसरा — बदलना। और ये सबसे ज़रूरी हिस्सा है — बदलने का मतलब मीठी बातें बोलना नहीं है।
एक चीज़ जो ये किताब नहीं कहेगी
ये आपसे ये नहीं कहेगी कि आईने के सामने खड़े होकर बोलिए — "मैं दुनिया का सबसे बेहतरीन इंसान हूँ, मैं सब कुछ कर सकता हूँ।"
ये तरीक़ा ज़्यादातर लोगों पर काम नहीं करता, और इसकी सीधी वजह है।
जब आप कोई ऐसी बात कहते हैं जिस पर आपको ख़ुद यक़ीन नहीं, तो दिमाग़ तुरंत जवाब देता है — "झूठ। तुझे पता है ये सच नहीं है।"
और अजीब बात ये है कि उस बहस के बाद आप पहले से भी ज़्यादा बुरा महसूस करते हैं। क्योंकि अब आपके पास दो चीज़ें हैं — पुरानी वाली कमी, और ये एहसास कि आप अपने आप को बहला भी नहीं पा रहे।
तो हम वो नहीं करेंगे।
हम जो करेंगे वो ये है — सच्ची, पर साथ देने वाली बात।
"मैं सबसे बेहतरीन हूँ" नहीं।
बल्कि — "ये काम मुश्किल है और अभी मुझे ठीक से नहीं आता। पर मैंने पहले भी मुश्किल चीज़ें सीखी हैं। एक-एक करके देखते हैं।"
ये बात दिमाग़ मान लेता है। क्योंकि ये सच है। और जो बात दिमाग़ मान लेता है, वही असर करती है।
एक बात जो शुरू में ही समझ लीजिए
अंदर की वो कड़वी आवाज़ आपकी दुश्मन नहीं है।
वो किसी वक़्त आपको बचाने के लिए बनी थी। शायद उसने आपको किसी की डाँट से बचाया था, या किसी शर्मिंदगी से।
वो बस अपने ज़माने में फँस गई है। उसे नहीं पता कि आप अब बड़े हो चुके हैं।
तो हम उससे लड़ेंगे नहीं। हम उसे सुनेंगे, समझेंगे, और फिर उसे एक नया काम सिखाएँगे।
कैसे पढ़ें
एक दिन में पूरी मत पढ़िए। एक अध्याय, और नीचे लिखा छोटा काम सच में कीजिए।
क्योंकि ये आदत की किताब है, जानकारी की नहीं। और आदत सिर्फ़ करने से बदलती है।
अगले तीन हफ़्ते में आपके अंदर की आवाज़ पूरी तरह नहीं बदलेगी। ये पक्की बात है।
पर एक चीज़ ज़रूर होगी — आप उसे सुनना शुरू कर देंगे।
और जिस आवाज़ को आप सुन सकते हैं, उससे बात भी की जा सकती है।
एक लाइन में
दिनभर की सबसे लंबी बातचीत आप अपने आप से करते हैं — और वो आपकी ज़िंदगी बना या बिगाड़ रही है।
आज ये करो
आज सिर्फ़ एक बार, किसी भी वक़्त, रुककर सुनिए कि आप उस पल अपने आप से क्या कह रहे हैं। उसे जस का तस, उन्हीं शब्दों में लिख लीजिए। बदलने की कोशिश मत कीजिए — आज सिर्फ़ सुनना है।
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