अंदर की आवाज़ एक नहीं होती। उसके कई चेहरे हैं, और हर चेहरा अलग तरह से बोलता है। जब तक आप उन्हें अलग-अलग नहीं पहचानेंगे, आप ग़लत जगह लड़ते रहेंगे।
ये अध्याय एक तरह की पहचान परेड है।
पढ़ते हुए ध्यान दीजिए — कौन-सा चेहरा आपको सबसे ज़्यादा जाना-पहचाना लगता है।
पहला : जज
ये हर काम पर फ़ैसला सुनाता है। और उसका फ़ैसला हमेशा आपके ख़िलाफ़ होता है।
"ये तूने ग़लत किया।"
"तुझसे कुछ ठीक नहीं होता।"
"मुझे पहले ही पता था।"
इसकी ख़ासियत ये है कि ये काम पर नहीं, आप पर फ़ैसला देता है। "ये काम ठीक नहीं हुआ" नहीं कहता — "तू ठीक नहीं है" कहता है।
दूसरा : तुलना करने वाला
ये हमेशा किसी और की तरफ़ इशारा करता रहता है।
"वो देख, कहाँ पहुँच गया।"
"तेरी उम्र में लोग बहुत आगे निकल चुके होते हैं।"
"सबकी ज़िंदगी सेट है, बस तेरी नहीं।"
ये कभी नीचे नहीं देखता। हमेशा ऊपर। और ऊपर हमेशा कोई न कोई होता है, इसलिए ये कभी चुप नहीं होता।
तीसरा : डराने वाला
ये आगे की फ़िल्म चलाता है, और उसका अंत हमेशा बुरा होता है।
"अगर ये नहीं हुआ तो?"
"कहीं सब बिगड़ न जाए।"
"ये सब ज़्यादा दिन नहीं चलेगा।"
ये ख़ुद को समझदारी बताता है — "मैं तो बस पहले से तैयार रह रहा हूँ।"
चौथा : परफ़ेक्शन वाला
ये सबसे चालाक है, क्योंकि ये तारीफ़ जैसा लगता है।
"ये अभी काफ़ी अच्छा नहीं है।"
"थोड़ा और सुधार लो, फिर दिखाना।"
"ऐसे-वैसे करने से अच्छा है न करो।"
इसके साथ रहने वाला आदमी बहुत काम करता है और कभी संतुष्ट नहीं होता। और अक्सर वो शुरू ही नहीं करता, क्योंकि "पूरी तैयारी" कभी नहीं होती।
पाँचवाँ : "चाहिए" वाला
ये पूरे दिन नियम पढ़ता रहता है।
"मुझे और मेहनत करनी चाहिए।"
"मुझे इस उम्र तक ये कर लेना चाहिए था।"
"मुझे ग़ुस्सा नहीं करना चाहिए।"
इसकी ख़ासियत ये है कि ये कभी नहीं बताता कि "काफ़ी" कितना है। इसका हर नियम पूरा करने पर एक नया नियम आ जाता है।
छठा : मन पढ़ने वाला
ये दूसरों के दिमाग़ की रिपोर्ट देता रहता है — बिना किसी सबूत के।
"उसने ऐसे देखा, ज़रूर मेरे बारे में कुछ सोचा होगा।"
"सब मुझे बेवक़ूफ़ समझते हैं।"
"उसने जवाब नहीं दिया, मतलब नाराज़ है।"
ये हमेशा सबसे बुरा वाला मतलब चुनता है। और आप उसे जाँचते भी नहीं।
अब एक ज़रूरी बात
इनमें से कोई भी चेहरा दुश्मन नहीं है।
हर एक के पीछे कोई काम था।
जज आपको ग़लती से बचाना चाहता था। तुलना करने वाला आपको आगे बढ़ाना चाहता था। डराने वाला आपको ख़तरे से बचाना चाहता था। परफ़ेक्शन वाला आपको बेइज़्ज़ती से बचाना चाहता था।
सबकी नीयत ठीक थी।
बस उनका तरीक़ा बहुत सख़्त है और उनकी आवाज़ बहुत तेज़ हो गई है — जैसे कोई चौकीदार जो ज़रूरत से ज़्यादा वफ़ादार हो गया हो और अब हर आने-जाने वाले पर भौंकता हो।
तो हमें इन्हें ख़त्म नहीं करना। इनकी आवाज़ धीमी करनी है और इनका काम बदलना है।
पहला असली औज़ार : नाम दे दीजिए
ये सुनने में बहुत मामूली लगता है, और ये सबसे तेज़ काम करता है।
जब भी वो आवाज़ आए, मन में सिर्फ़ इतना कहिए —
"ये जज बोल रहा है।"
"ये तुलना वाला आ गया।"
"ये डराने वाला है।"
बस इतना। न बहस, न सफ़ाई, न भगाना।
ये क्यों काम करता है? क्योंकि जिस पल आप उसे नाम देते हैं, आप उससे अलग हो जाते हैं।
"मैं बेकार हूँ" — इसमें आप और आवाज़ एक हैं।
"जज कह रहा है कि मैं बेकार हूँ" — इसमें आप बाहर खड़े होकर सुन रहे हैं।
और यही पूरी लड़ाई है। आवाज़ के अंदर से बाहर आ जाना।
कुछ लोग इसे और आगे ले जाते हैं — वो अपनी अंदर की आवाज़ को कोई मज़ाक़िया नाम दे देते हैं। "आ गए पंडितजी अपना उपदेश लेकर।"
ये बचकाना लगता है और बहुत असरदार है। क्योंकि जिस चीज़ पर आप हल्की-सी हँसी ला सकें, उसका डर ख़त्म हो जाता है।
एक लाइन में
अंदर की आवाज़ के कई चेहरे हैं — उन्हें नाम दे दीजिए, और आप उनके अंदर से बाहर आ जाएँगे।
आज ये करो
छहों चेहरे दोबारा पढ़िए और अपने दो सबसे तेज़ वाले चुनिए। आज दिनभर, जब भी वो बोलें, मन में सिर्फ़ नाम कहिए — "ये जज है", "ये तुलना वाला है।" कुछ और मत कीजिए।
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