वो आवाज़ आपके साथ पैदा नहीं हुई थी। कोई बच्चा अपने आप से ये नहीं कहता कि "मैं बेकार हूँ।" ये उसने कहीं से सीखा होता है।
किसी छोटे बच्चे को देखिए जो चलना सीख रहा है।
वो गिरता है। उठता है। फिर गिरता है। फिर उठता है।
क्या वो गिरने के बाद अपने आप से कहता है — "मैं कितना बेकार हूँ, मुझसे तो चला भी नहीं जाता, सब बच्चे चल रहे हैं बस मैं ही नहीं"?
नहीं। वो बस उठता है और फिर कोशिश करता है।
तो वो आवाज़ जो आज आपके अंदर हर ग़लती पर बोलती है — वो कब आई?
तीन जगहें जहाँ से ये आती है
पहली : बड़ों के शब्द
बच्चे में जाँचने की ताक़त नहीं होती। जब कोई बड़ा कुछ कहता है, तो वो उसे सच मान लेता है — क्योंकि उस उम्र में सवाल करना आता ही नहीं।
"तू किसी काम का नहीं।"
"अपने भाई से कुछ सीख।"
"तुझसे तो ये भी नहीं होता।"
"बस, बहुत हो गया, चुप बैठ।"
ये लाइनें अक्सर ग़ुस्से में, थकान में, या बिना सोचे कही जाती हैं। कहने वाला दस मिनट में भूल जाता है।
और बच्चा तीस साल तक याद रखता है — शब्दों की तरह नहीं, अपनी पहचान की तरह।
दूसरी : तुलना
हमारे यहाँ ये सबसे बड़ा हथियार है, और इसे प्रेरणा समझकर इस्तेमाल किया जाता है।
"शर्मा जी का बेटा देखो।"
"तेरी बहन कितनी समझदार है।"
"पूरे मोहल्ले में सबसे कम नंबर तेरे आए हैं।"
माँ-बाप सोचते हैं कि इससे बच्चा मेहनत करेगा।
होता ये है कि बच्चे के अंदर एक तराज़ू बैठ जाता है, जो पूरी ज़िंदगी चलता रहता है। और उस तराज़ू में वो हमेशा हल्का पड़ता है — चाहे वो कितना भी कर ले।
चालीस साल के लोग आज भी अनजाने में हर आदमी से अपनी तुलना करते हैं। वो तराज़ू कभी बंद नहीं हुआ।
तीसरी : ख़ामोशी
ये सबसे कम पहचानी जाती है।
कुछ घरों में कोई कड़वी बात नहीं कही जाती। बस कभी कुछ अच्छा भी नहीं कहा जाता।
बच्चा अच्छा करता है — कोई कुछ नहीं कहता। ग़लती करता है — तब बोलते हैं।
ऐसे बच्चे के अंदर ये बैठ जाता है कि "अच्छा करना सामान्य है, उस पर कुछ नहीं मिलता। ध्यान सिर्फ़ ग़लती पर जाता है।"
और वो बड़ा होकर ठीक वैसा ही अपने साथ करता है। अपनी सारी कामयाबियाँ टाल देता है — "इसमें क्या था" — और हर छोटी ग़लती पर हफ़्तों रुका रहता है।
एक बहुत ज़रूरी बात
ये अध्याय अपने माँ-बाप को दोष देने के लिए नहीं है।
ज़्यादातर माता-पिता ने वही किया जो उन्हें आता था। उनके साथ भी शायद वैसा ही हुआ था, या उससे बुरा। किसी ने उन्हें ये नहीं सिखाया कि बच्चे से कैसे बात करनी है।
और उनका इरादा लगभग हमेशा अच्छा था। वो चाहते थे कि आप आगे बढ़ें।
तो ये समझना दोष देना नहीं है।
ये सिर्फ़ ये जानना है कि वो आवाज़ आपकी नहीं है।
और यही इस अध्याय का पूरा मक़सद है। क्योंकि जब तक आपको लगता है कि वो आपकी अपनी राय है, आप उससे बहस नहीं कर सकते। जिस पल आपको दिखता है कि वो किसी और की कही हुई बात है — उसका आधा ज़ोर वहीं ख़त्म हो जाता है।
अपनी आवाज़ का पता लगाइए
एक काम कीजिए, और ये चौंकाने वाला हो सकता है।
अपनी सबसे कड़वी वाली अंदरूनी लाइन लिखिए। वो जो सबसे ज़्यादा आती है।
अब आँख बंद करके उसे मन में सुनिए।
और पूछिए — "ये किसकी आवाज़ है?"
ज़्यादातर लोगों को एक चेहरा दिख जाता है। कोई मास्टरजी। कोई रिश्तेदार। पिता। कभी-कभी माँ। कभी कोई ऐसा जिसका नाम भी याद नहीं, बस लहजा याद है।
और कुछ लोगों को कोई चेहरा नहीं दिखता — बस "सब लोग" दिखते हैं। वो भी ठीक है।
जो भी दिखे, उसे लिख लीजिए।
क्योंकि अगले अध्यायों में हम उसी आवाज़ के साथ काम करेंगे। और उससे पहले ये जान लेना ज़रूरी था कि वो कहाँ से आई।
और एक उम्मीद वाली बात
जो चीज़ सीखी गई है, वो भुलाई भी जा सकती है।
ये आपकी बनावट नहीं है। ये आपका स्वभाव नहीं है। ये एक आदत है — बहुत पुरानी, बहुत गहरी, पर फिर भी एक आदत।
और आदतें बदलती हैं। धीरे, पर बदलती हैं।
एक लाइन में
कोई बच्चा ख़ुद को कोसना लेकर पैदा नहीं होता — वो आवाज़ सीखी गई है, इसलिए बदली भी जा सकती है।
आज ये करो
अपनी सबसे कड़वी अंदरूनी लाइन लिखिए। नीचे लिखिए — "ये पहली बार किसने कही थी?" और अगर चेहरा याद आए, तो उसका नाम भी लिख दीजिए।
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