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वात्स्यायन का कामसूत्र - साधारणम्‌

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Funtel
21 Mar 2026

धर्मार्थकामेभ्यो नमः।।

अर्थ–
मै धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार करने के बाद में इस ग्रंथ की शुरुआत करता हूं।

भारतीय सभ्यता, संस्कृति और साहित्य का यह बहुत पुराना चलन रहा है कि ग्रंथ की शुरुआत, बीच और अंत में मंगलाचरण किया जाता है। इसके बाद आचार्य वात्सायन ने ग्रंथ की शुरुआत करते हुए अर्थ, धर्म और काम की वंदना की है।

दिए गए पहले सूत्र में किसी देवी या देवता की वंदना मंगलाचरण द्वारा न करके, ग्रंथ में प्रतिपाद्य विषय—धर्म, अर्थ और काम की वंदना को महत्व दिया है।

इसको साफ करते हुए आचार्य वात्स्यायन ने खुद कहा है कि काम, धर्म और अर्थ तीनों ही विषय अलग-अलग है फिर भी आपस में जुड़े हुए हैं।

भगवान शिव सारे तत्वों को जानने वाले हैं। वह प्रणाम करने योग्य है। उनको प्रणाम करके ही मंगलाचरण की श्रेष्ठता पाई जा सकती है।

जिस प्रकार से चार वर्ण (जाति) ब्राहमण, शुद्र, क्षत्रिय और वेश्य होते हैं उसी प्रकार से चार आश्रम भी होते है– धर्म, अर्थ, मोक्ष और काम।

धर्म सबके लिए इसलिए जरूरी होता है क्योंकि इसके बगैर मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं है। अर्थ इसलिए जरूरी होता है क्योंकि अर्थोपार्जन के बिना जीवन नहीं चल सकता है।

दूसरे जीव प्रकृति पर निर्भर रहकर प्राकृतिक रूप से अपना जीवन चला सकते हैं लेकिन मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता है क्योंकि वह दूसरे जीवों से बुद्धिमान होता है।

वह सामाजिक प्राणी है और समाज के नियमों में बंधकर चलता है और चलना पसंद करता है। समाज के नियम है कि मनुष्य गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है तो सामाजिक, धार्मिक नियमों में बंधा होना जरूरी समझता है और जब वह सामाजिक-धामिक नियमों में बंधा होता है तो उसे काम-विषयक ज्ञान को भी नियमबद्ध रूप से अपनाना जरूरी हो जाता है।

यही कारण है कि मनुष्य किसी खास मौसम में ही संभोग का सुख नहीं भोगता बल्कि हर दिन वह इस क्रिया का आनंद उठाना चाहता है।

इसी ध्येय को सामने रखते हुए आचार्य वात्स्यायन ने काम के सूत्रों की रचना की है।

इन सूत्रों में काम के नियम बताए गए हैं। इन नियमों का पालन करके मनुष्य संभोग सुख को और भी ज्यादा लंबे समय तक चलने वाला और आनंदमय बना सकता है।

आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र की शुरुआत करते हुए पहले ही सूत्र में धर्म को महत्व दिया है तथा धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार किया है।


श्लोक (2)

शास्त्रो प्रकृतत्वात्‌।।

अर्थ –
आचार्य वात्स्यायन ने काम के इस शास्त्र में मुख्य रूप से धर्म, अर्थ और काम — इनको महत्व दिया है और इन्हे नमस्कार किया है।

भारतीय सभ्यता की आधारशिला 4 वर्ग होते हैं–धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मनुष्य की सारी इच्छाएं इन्हीं चारों के अंदर मौजूद होती है।

मनुष्य के शरीर में जरूरतों को चाहने वाले जो अंग हों यह चारों पदार्थ उनकी पूर्ति किया करते हैं।

इसके अंतर्गत—

  • शरीर

  • बुद्धि

  • मन

  • आत्मा

यह 4 अंग सारी जरूरतों और इच्छाओं के चाहने वाले होते हैं। इनकी पूर्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष द्वारा होती है।

शरीर के विकास और पोषण के लिए अर्थ की जरूरत होती है। शरीर के पोषण के बाद उसका झुकाव संभोग की ओर होता है।

बुद्धि के लिए धर्म ज्ञान देता है—अच्छाई और बुराई का ज्ञान देने के साथ-साथ उसे सही रास्ता देता है।

सद्मार्ग से आत्मा को शांति मिलती है। आत्मा की शांति से मनुष्य मोक्ष के रास्ते की ओर बढ़ने का प्रयास करता है।

यह नियम हर काल में एक ही जैसे रहे हैं और ऐसे ही रहेंगे।

आदि मानव के युग में भी शरीर के लिए अर्थ का महत्व था। जंगलों में रहने वाले कंद-मूल और फल-फूल के रूप में भोजन और शिकार की जरूरत पड़ती थी।

संयुक्त परिवार कबीले के रूप में होने के कारण उनकी संभोग संबंधित विषय की पूर्ति बहुत ही आसानी से हो जाती थी।

मृत्यु के बाद शरीर को जलाया या दफनाया इसीलिए जाता था ताकि मरे हुए मनुष्य को मुक्ति मिल सके।

इस प्रकार अगर भोजन न किया जाए तो शरीर बेजान सा हो जाता है। काम (संभोग) के बिना मन कुंठित सा हो जाता है।

अगर मन में कुंठा होती है तो वह धर्म पर असर डालती है और कुंठित मन मोक्ष के द्वार नहीं खोल सकता।

इस प्रकार से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं।

बिना धर्म के बुद्धि खराब हो जाती है और बिना मोक्ष की इच्छा किए मनुष्य पतन के रास्ते पर चल पड़ता है।

बुद्धि के ज्ञान के कारण समवाय संबंध बना रहता है। जैसे ही ज्ञान की बढ़ोतरी होती है वैसे ही बुद्धि का विकास भी होता जाता है।

अगर देखा जाए तो बुद्धि और ज्ञान एक ही पदार्थ के दो हिस्से हैं।

जिस तरह से बुद्धि और ज्ञान एक ही है उसी तरह धर्म और ज्ञान भी एक ही पदार्थ के दो भाग है क्योंकि ज्ञान के बढ़ने से धर्म की बढ़ोतरी होती है।

धर्म के ज्ञान में जितना भाग मिलता है तथा ज्ञान के अंतर्गत धर्म का जितना भाग पाया जाता है उसी के मुताबिक बुद्धि में स्थिरता पैदा होती है।

बुद्धि का संबंध जिस तरह से धर्म से है उसी तरह शरीर का अर्थ से संबंध है, मन का काम से संबंध है और आत्मा का मोक्ष का संबंध है।

इन्हीं अर्थ, धर्म, काम में मनुष्य के जीवन, रति, मान, ज्ञान, न्याय, स्वर्ग आदि की सारी इच्छाएं मौजूद रहती हैं।

अर्थ — जीवन की इच्छा
काम — स्त्री, पुत्र आदि की
ज्ञान तथा न्याय — धर्म
मोक्ष — परलोक

इस प्रकार चारों पदार्थ एक-दूसरे के बिना अधूरे रहते हैं।

अर्थ — भोजन, कपड़ों के बिना शरीर की कोई स्थिति नहीं हो सकती
काम — संभोग के बिना शरीर की उत्पत्ति नहीं हो सकती
शरीर के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता
मोक्ष के बिना अर्थ और काम सिद्ध नहीं हो सकते

इस प्रकार मोक्ष की सच्ची इच्छा रखकर ही काम और अर्थ का उपयोग करना चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति मोक्ष की सच्ची इच्छा रखकर काम और अर्थ का उपयोग करता है तो वह व्यक्ति लालची और कामी माना जाता है।

ऐसे व्यक्ति देश और समाज के दुश्मन होते हैं।

सिर्फ धर्म द्वारा प्राप्त अर्थ और काम ही मोक्ष के सहायक माने जाते हैं। यह धर्म के विरुद्ध नहीं है।

आर्य सभ्यता के मुताबिक धर्मपूर्वक अर्थ और काम को ग्रहण करके मोक्ष की प्राप्ति ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

आचार्य वात्स्यायन इस प्रकार कामसूत्र को शुरू करते हुए धर्म, अर्थ और काम की वंदना करते हैं।

आचार्य वात्स्यायन का कामसूत्र वासनाओं को भड़काने के लिए नहीं है बल्कि जो लोग काम और मोक्ष को सहायक मानते हैं तथा धर्म के अनुसार स्त्री का उपभोग करते हैं, उन्हीं के लिए है।

नीचे दिए गए सूत्र द्वारा आचार्य वात्स्यायन ने यही बताने की कोशिश की है।

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