हर मनुष्य का जीवन चित की इन्हीं आंतरिक और बाह्य शक्तियों के ऐसे बिखराव तथा संघर्ष–स्थल बना रहता है।
अणु–अणु परमाणु में मन की यह शक्ति समाई हुई है।
इसका एक हिस्सा बाहर है तो एक अंदर।
इसमें से एक हिस्सा तो व्यक्ति को प्रवृत्ति की तरफ ले जाता है और दूसरा निवृत्ति की तरफ।
मूल वासनाएं ही मन की असली प्रवृत्तियां कहलाती हैं।
हर तरह की वासनाओं या मूल प्रवृत्तियों का वर्गीकरण किया जाए तो —
वित्तैषणा, दारैषणा और लोकेषणा
इन तीनों हिस्सों में सभी वासनाओं अथवा मन की मूल प्रवृत्तियों का समावेश हो जाता है।
धन, स्त्री, पुत्र और यश आदि की इच्छा के मूल में आनंद का उपयोग रहता है।
इसी तरह की वासनाओं, इच्छाओं या प्रवृत्तियों का प्राण आनंद नहीं होता।
तैत्तिरीय उपनिषद का मानना है कि —
आनंद से ही भूतों की उत्पत्ति होती है,
आनंद से ही उत्पन्न सारी वस्तु तथा जीव–समुदाय जीवित रहते हैं
तथा आनंद में ही लीन होते हैं।
आनंद ही सब कुछ है।
वृहदारण्यक उपनिषद के अंतर्गत आनंद का एकमात्र स्थान जननेन्द्रिय है।
बाकी सभी चीजें आनंद के साधन हैं।
वित्त, स्त्री और लोक सभी कुछ आनंद को बढ़ाने की इच्छा रखते हैं।
स्वामी शंकराचार्य के मतानुसार —
अंतरात्मा पहली अकेली थी लेकिन कालांतर में वह विषयों को खोजने लगा,
जैसे — मेरी स्त्री, पुत्र हो और उनके भरण–पोषण के लिए धन हो।
उन्हीं के लिए व्यक्ति अपने प्राणों की परवाह न करते हुए बहुत–सी परेशानियों को झेलकर काम करता है।
वह उनसे बढ़कर और किसी चीज को सही नहीं मानता।
यदि बताई गई चीजों में से कोई भी एक चीज उपलब्ध नहीं होती
तो वह अपनी जिंदगी को बेकार समझता है।
जीवन की पूर्णता अथवा अपूर्णता, सफलता अथवा असफलता का मापक यंत्र —
आनंद को माना जाता है।
विषयों से ताल्लुक रखने में मनुष्य को भरपूर आनंद मिलता है।
इस प्रकार यह पूरी तरह से साबित हो चुका है
कि उसके इच्छित विषयों में से एक के भी समाप्त होने पर
वह मनुष्य अपने आपका सर्वनाश कर देता है
और उसकी उपलब्धि से वह अपने आपको यथार्थ समझता है।
शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र के शांकट भाष्य के अंतर्गत
इस बात को स्वीकार किया है।
उन उदाहरणों के द्वारा यह निष्कर्ष निकलता है कि —
हर व्यक्ति जोड़े के द्वारा अपनी पूर्णता की इच्छा रखता है।
सृष्टि की शुरुआत में जब ब्रह्म अकेले थे तो उनके मन में यही संकल्प पैदा हुआ —
एकोऽहम बहुस्याम।
एक से बहुत सारे हो जाने की ख्वाहिश ही
अपूर्णता से पैदा होने वाले अभाव को व्यक्त करती है।
हर मनुष्य रति को तलाश करना चाहता है,
उसे बढ़ाने की कोशिश करता है,
अनेक होकर आनंद का उपभोग करना चाहता है।
अकेले में उसे आनंद प्राप्त नहीं होता,
अकेले में किसी तरह का आनंद नहीं है
इसलिए उसे दूसरे की जरूरत पड़ती है।
इसके द्वारा 3 बातें सिद्ध होती हैं —
दो भिन्नताओं के बीच के संबंध को काम कहते हैं।
यह एक प्रवृत्ति है जो विषय और विषयी को एकात्मा बनाती है।
काम–प्रवृत्ति विषय और रमण की इच्छा आदि शक्ति है।
वह अकेला था — इसका उसे बोध था।
पहले वे आत्मा से एक ही था।
वह पुरुष विद् था।
उसने अपने अलावा और किसी को नहीं पाया।
“मैं हूं” — इस तरह पहले उसने वाक्य कहा।
“मैं हूं” का बोध होने पर भी वह खुश नहीं हुआ,
इसलिए दूसरे की इच्छा की —
स द्वितीयमैच्छत।
वह दूसरा विषय था।
फिर विषय ने अनेक का रूप धारण कर लिया —
सोऽकामयत बहुस्याम् प्रजायेयेति।
(मैं अनेक हो जाऊँ, उत्पन्न करूं)
उसने सोचा —
मैं अनेक हो जाऊँ।
मैं सृजन करूं।
स ऐक्षत लोकान् नु सृजा इति।
(उसने सोचा कि मैं लोकों की सृष्टि करूं)
इसके चाहने और सोचने पर भी
इन सभी क्रियाओं के मूल में सिर्फ काम–प्रवृत्ति है।
उसे जैसे ही अहं अस्मि — मैं हूं
का बोध हुआ
वैसे ही वह डरा
तथा एक मददगार की इच्छा करने लगा।
जब जीव अविद्या–ग्रस्त हुआ
तो उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान हुआ —
कि मैं हूं।
इसके बाद उसे अपनी पहले की स्थिति को जानने की इच्छा हुई
जिससे उसके दिल में दूसरे का बोध हुआ।
दूसरे के बारे में दिमाग में आते ही
वह डर गया।
उसे उस तरफ से विकर्षण हुआ
और फिर विकर्षण से
आकर्षण पैदा हुआ —
कि अकेले संभोग नहीं किया जा सकता
इसलिए दिल में दूसरे की इच्छा पैदा हुई।
सबसे पहले जीव को दूसरे का बोध होता है
उसके बाद डर पैदा होता है।
डर तभी पैदा होता है जब भिन्नता उत्पन्न होती है।
जिस जगह पर डर पैदा होता है
वहाँ पर डर को दूर करने के लिए
खोई हुई चीज की इच्छा पैदा होती है।
दार्शनिक की दृष्टि में
इसी प्रेम–भय, प्रवृत्ति–निवृत्ति, आकर्षण–विकर्षण,
राग–द्वेष में
अविद्या का स्वरूप स्थिर रहता है।
पुराने समय से
अनंत जीव–समुदाय
इसी में फंसा हुआ है।
इस तरह के सभी अज्ञान के मूल में
दूसरे के प्रति आकर्षण
और दूसरों को अपने से अलग ही जानना चाहिए।
इसलिए साबित होता है कि
काम और आकर्षण की इच्छा ही
विश्व–वासना कहलाती है।
अविद्या, आकर्षण आदि सभी वासनाओं के मूल में
काम मौजूद है।
इसी प्रकार से
वेदों–पुराणों में भी
काम को आदिदेव कहा गया है।
काम शुरुआत में पैदा हुआ।
पितर, देवता या व्यक्ति
उसकी बराबरी न कर सके।
शैव धर्म में
पूरे संसार के मूल में
शिव और शक्ति का संयोग माना जाता है।
यही नहीं —
शैव मत के अंतर्गत
आध्यात्मिक पक्ष में
आदि वासना पुरुष और प्रकृति के संबंध में प्रकाशित है,
तथा वही भौतिक पक्ष में
स्त्री और पुरुष के संभोग में परिणत है।
पूरी दुनिया को
शिव पुराण और शक्तिमान से
पैदा हुआ
शैव तथा शाक्त
समझता है।
पुरुष और स्त्री के द्वारा पैदा हुआ
यह जगत
स्त्री–पुंसात्मक ही है।
ब्रह्म — शिव होता है
तथा माया — शिव होती है।
पुरुष को परम–ईशान
और स्त्री को प्रकृति परमेश्वरी
माना गया है।
जगत के सारे पुरुष परमेश्वर
और स्त्री परमेश्वरी है।
इन दोनों का मिथुनात्मक संबंध ही
मूल वासना है
तथा इसी को आकर्षण और काम कहा जाता है।
इसके अलावा
शिवपुराण में
8 से लेकर 2 प्रकरण तक
काम के विषय में जो बताया गया है
उसमें काम को मैथुन–विषयक काम
के अर्थ में ही प्रयोग किया गया है।
उनके अनुसार
यह मानना कितना सच है कि —
विश्वामित्र, सुखदेव, श्रृंगी जैसे ऋषि
और श्रीराम जैसे साक्षात ईश्वर के अवतार
भी काम के जाल में फंसे हुए हैं।
प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थितिनिबंधनं त्रिवर्गस्य साधनमध्यायानां शतसहस्त्रेणाग्रे प्रोवाच।।
अर्थ —
प्रजापति ने प्रजा को रचकर
और उनके रोजाना कार्य धर्म, अर्थ और काम के साधनभूत–शास्त्र का
सबसे पहले
एक लाख श्लोकों में प्रवचन किया है।
भारतीय सिद्धान्त के मुताबिक
जब तक द्वंद्व (अंदरूनी लड़ाई) है
तब तक दुख भी रहेगा।
इसलिए दुख को निकालकर फेंक देना चाहिए।
भगवान शिव के समान
दूसरा कोई नहीं है।
इन तीनों विषयों की ज्वाला
यहां पर नहीं है।
मनुष्य का गम्य स्थान
भारतीय दार्शनिकों ने
इसे ही कहा है।
भारतीय वाङ्मय का निर्माण
भी इसी को प्राप्त करने के लिए ही हुआ है।
ब्रह्मविद्या के अंतर्गत
यह सारी विद्याएं मौजूद हैं।
सारे देवताओं से पहले
पूरे संसार की रचना करने वाले
प्रजापति ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई।
ब्रह्मा ने अपने सबसे बड़े पुत्र
अथर्व के लिए
ब्रह्मविद्या का निर्माण किया
जो कि हर विद्याओं में सबसे बढ़कर है।
इससे इस बात का साफ पता चल जाता है
कि ब्रह्मविद्या के अंतर्गत
कामशास्त्र को भी महत्व दिया गया है।
आचार्य वात्स्यायन के मतानुसार —
ब्रह्मा ने प्रजा को उनके जीवन को नियमित बनाने के लिए
कामसूत्र के बारे में बताया था —
जो कि सुसंगत और परंपरागत माना गया है।
ब्रह्मा ने कामसूत्र को
काम, अर्थ और धर्म का साधन
मानकर इसकी रचना की है
क्योंकि इन तीनों का आखिरी पड़ाव
मोक्ष ही है
और मनुष्य के जीवन का
मकसद भी मोक्ष को प्राप्त करना ही है।
इसलिए जब तक मोक्ष की असली परिभाषा
बहुत अच्छी तरह से समझी नहीं जाएगी
तब तक इसको प्राप्त करना
बहुत मुश्किल है।
ब्रह्मा के लिए कामशास्त्र का निर्माण करना
इसलिए जरूरी है
कि काम आदिदेव है,
इसकी शक्ति अपार है।
जब तक काम का नियमित साधन नहीं किया जाता
तब तक मानव जीवन भी नियमित नहीं हो सकता
और उसकी कठिन से कठिन तपस्या पर भी
पानी फेर सकता है।
योगवशिष्ठ के मतानुसार —
ब्राह्मणों को जीवनमुक्त,
नारदत्तऋषि,
इच्छा–रहित,
बहुज्ञ तथा विरागी
समझा जाता है।
वे देखने में
आकाश की तरह कोमल,
विशद और नित्य होते हैं,
लेकिन फिर भी
वे काम के वशीभूत
किस प्रकार हो गए।
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