तत्समयावबोधकेभ्यश्चाचार्येभ्यः ॥
अर्थ —
इसी वजह से धर्म, अर्थ और काम के मूल तत्व का बोध करने वाले आचार्यो को प्रणाम करता हूँ। वह नमस्कार करने के काबिल है क्योंकि उन्होने अपने समय के देशकाल को ध्यान में रखते हुए धर्म, अर्थ और काम तत्व की व्याख्या की है।
तत्सम्बन्धात् ॥
अर्थ —
पुराने समय के आचार्यों ने सिद्धांत और व्यवहार रूप में यह साबित करके बताया है कि काम को मर्यादित करके उसको अर्थ और मोक्ष के मुताबिक बनाना सिर्फ धर्म के अधीन है।
न रुकने वाले काम (उत्तेजना) को काबू में करके तथा मर्यादा में रहकर मोक्ष, अर्थ और काम के बीच सामंजस्य धर्म ही स्थापित कर सकता है।
इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म के मुताबिक जीवन बिताकर मनुष्य लोक और परलोक दोनों ही बना सकता है।
वैशेषिक दर्शन में —
यतोऽभ्यूदयानिः श्रेयससिद्धि स धर्मः
कहकर यह साफ कर दिया है कि धर्म वही होता है जिससे अर्थ–काम संबंधी इस संसार के सुख और मोक्ष संबंधी परलौकिक सुख की सिद्धि होती है।
यहाँ अर्थ और काम से इतना ही मतलब है जितने से शरीर यात्रा और मन की संतुष्टि का गुजारा हो सके और अर्थ तथा काम में डूबे होने का भाव पैदा न हो।
इसी का समर्थन करते हुए मनु कहते हैं —
जो व्यक्ति अर्थ और काम में डूबा हुआ नहीं है उन्ही लोगों के लिए धर्मज्ञान कहा गया है तथा इस धर्मज्ञान की जिज्ञासा रखने वालों के लिए वेद ही मार्गदर्शक है।
इस बात से साबित होता है कि वैशेषिक दर्शन के मत से अभ्युदय का अर्थ —
लोकनिर्वाह मात्र ही वेद अनुकूल धर्म होता है।
धर्म की मीमांसा करते हुए मीमांसा दर्शन ने कहा है —
वेद की आज्ञा ही धर्म है।
वेद की शिक्षा ही हिन्दू सभ्यता की बुनियाद मानी जाती है।
इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि संसार से इतना ही अर्थ और काम लिया जाए जिससे मोक्ष को सहायता मिल सके।
इसी धर्म के लिए महाभारत के रचनाकार ने बड़े मार्मिक शब्दों में बताया है —
मैं अपने दोनों हाथों को उठाकर और चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूं कि अर्थ और काम को धर्म के अनुसार ही ग्रहण करने में भलाई है।
लेकिन इस बात को कोई नहीं मानता है।
वस्तुतः धर्म एक ऐसा नियम है जो लोक और परलोक के बीच में निकटता स्थापित करता है,
जिसके जरिए से अर्थ, काम और मोक्ष सरलता से प्राप्त हो जाते हैं।
पुराने आचार्यो द्वारा बताया गया यही धर्म के तत्व का बोध माना गया है।
धर्म की तरह अर्थ भी भारतीय सभ्यता का मूल है।
मनुष्य जब तक अर्थमुक्त नहीं हो जाता तब तक उसको मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता।
जिस तरह —
आत्मा के लिए मोक्ष जरूरी
मन के लिए काम
बुद्धि के लिए धर्म
उसी प्रकार
शरीर के लिए अर्थ
इसलिए भारतीय विचारकों ने बहुत ही सावधानी से विवेचन किया है।
मनु के मतानुसार —
सभी पवित्रताओं में अर्थ की पवित्रता को सबसे अच्छा माना गया है।
मनु ने अर्थ संग्रह के लिए कहा है —
जिस व्यापार में जीवों को बिल्कुल भी दुख न पहुंचे या थोड़ा सा दुख पहुंचे,
उसी कार्य–व्यापार से गुजारा करना चाहिए।
अपने शरीर को किसी तरह की परेशानी पहुंचाए बिना
ध्यान–मनन उपायों द्वारा सिर्फ गुजारे के लिए अर्थ संग्रह करना चाहिए।
जो भी परमात्मा ने दिया है उसी में संतोष कर लेना चाहिए।
इसी प्रकार पूरी जिंदगी काम करते रहने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इसके अलावा और कोई उपाय संभव नहीं है।
वेदों–उपनिषदों के अलावा आचार्यों ने अपने द्वारा रचित शास्त्रों में
अर्थ से संबंधित जो भी ज्ञान बोध कराया है,
उनका सारांश यही निकलता है —
मुमुक्षु को संसार से उतने ही भोग्य पदार्थों को लेना चाहिए
जितने के लेने से किसी भी प्राणी को दुख न पहुंचे।
धर्म और अर्थ की तरह काम को भी हिंदू सभ्यता का आधार माना गया है।
धर्म और अर्थ की तरह इसको भी मोक्ष का ही सहायक माना जाता है।
अगर काम को काबू तथा मर्यादित न किया जाए तो —
अर्थ कभी मर्यादित नहीं हो सकता,
और बिना अर्थ–मर्यादा के मोक्ष प्राप्त नहीं होगा।
इसी कारण से भारत के आचार्यों ने काम के बारे में बहुत ही गंभीरता से विचार किया है।
दुनिया के किसी भी ग्रंथ में आज तक
अर्थशुद्धि के मूल आधार — काम —
पर उतनी गंभीरता से नहीं सोचा गया है
जितना कि भारतीय ग्रंथों में हुआ है।
भारतीय विचारकों ने काम और अर्थ को एक ही जानकर विचार किया है,
लेकिन भारतीय आचार्यों ने जिस तरह शरीर और मन को अलग रखकर विचार किया है
उसी तरह शरीर से संबंधित अर्थ को और
मन से संबंधित काम को
एक-दूसरे से अलग मानकर विचार किया है।
काम —
एक महती मन की ताकत है।
भौतिक कार्यों में प्रकट होकर यह ताकत
अन्तःकरण की क्रियाओं द्वारा अभिव्यक्त होकर
दो भागों में बंट जाती है।
यह ताकत —
कभी भौतिक शक्ति,
कभी चैतन्य
के रूप में प्रकट होती है।
कहीं-कहीं तो वह छितराकर काम करती है,
तो कहीं संवरण रूप में काम करती है।
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