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🌅 अगली सुबह
रात्री आज बहुत सुबह उठ गई थी।
कल रात ही वे लोग इस हवेली में पहुँचे थे, इसलिए आसपास ठीक से देखने का मौका नहीं मिला था। लेकिन सुबह की हल्की धूप में यह जगह कुछ अलग ही लग रही थी।
वह धीरे-धीरे छत पर आ गई।
चारों तरफ नज़र दौड़ाई—
जहाँ तक आँखें जाती थीं, बस खेत… और घना जंगल।
दूर कहीं एक पुराना, जर्जर मंदिर दिखाई दे रहा था।
इतनी बड़ी जगह…
लेकिन आसपास कोई बस्ती नहीं। कोई घर नहीं। कोई इंसान नहीं। रात्री के मन में एक अजीब सा सवाल उठा—
“इस गाँव में इतना सन्नाटा क्यों है?”
वह कुछ पल चुप रही, फिर खुद ही हल्का सा मुस्कुरा दी।
“शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ… माँ, पापा और ऊषा तो यहाँ आकर बहुत खुश हैं। उनकी खुशी में ही मेरी खुशी है…” 🙂
तभी… मानो हवा के साथ कोई फुसफुसाया— “क्या सोच रही है… रात्रि?”
रात्री चौंककर इधर-उधर देखने लगी। कोई नहीं।
आवाज़ फिर आई— मगर इस बार रात्रि अंजान थी।
-- “तू यहाँ अपनी मर्ज़ी से नहीं आई है…
मैं तुझे यहाँ खींचकर लाया हूँ…” रात्री के शरीर में सिहरन दौड़ गई। “तेरी मौत तुझे यहाँ बुला लाई है…
मैं तुझे धीरे-धीरे खत्म करूँगा…”
आवाज़ अब और भारी हो चुकी थी। “तीन सौ सालों से मैं बंदी हूँ…
मेरी शक्ति कम हो गई है… लेकिन मैं उसे वापस पा लूँगा…”
रात्री की सांसें तेज़ हो गईं। “पिछले जन्म में तूने मुझे कैद किया था…
इस जन्म में… तू ही मुझे आज़ाद करेगी…”
एक भयानक हँसी गूँज उठी— “हा… हा… हा…
मेरे हाथों से तुझे कोई नहीं बचा पाएगा…”
अचानक…सब कुछ शांत हो गया। जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
रात्री जल्दी से नीचे उतर आई। उसका दिल अब भी तेज़ धड़क रहा था। नीचे आकर उसने देखा— उसकी माँ घर सजाने में व्यस्त थी।
रसोई से स्वादिष्ट खाने की खुशबू आ रही थी।
पूरा माहौल ऐसा लग रहा था जैसे घर में कोई खास मेहमान आने वाला हो। रात्री ने ऊषा को देखा—
-- “अरे! आज तुझे क्या हो गया? सुबह-सुबह इतना काम?”
ऊषा ने दीवार साफ करते हुए कहा—
- “बस, घर को थोड़ा ठीक कर रही हूँ… देख ना, कितनी खराब हालत हो गई है।”
रात्री हँस पड़ी—
- “आज सूरज कहाँ से निकला है? जो लड़की सुबह 9 बजे से पहले उठती नहीं… वो आज इतनी जल्दी काम कर रही है!” 😦
ऊषा ने मुस्कुराते हुए कहा—“अरे दीदी, मेहमान आने वाले हैं। ऐसे घर में कैसे रहेंगे?”
रात्री चौंक गई—
“कौन मेहमान?”
ऊषा ने शरारती मुस्कान के साथ कहा—
“तुझे देखने…” 😬
“क्या??”
तभी माँ की तेज़ आवाज़ आई—
“ऊषा!” 😠
ऊषा हँस पड़ी—
“अरे, मज़ाक कर रही थी! पापा के दोस्त अपनी फैमिली के साथ छुट्टियाँ मनाने आ रहे हैं।”
रात्री ने राहत की सांस ली—
“ओह… मैं तो सच में डर गई थी…”
दोपहर में खाना खाने के बाद, रात्री अपने कमरे में बैठकर एक कहानी की किताब पढ़ रही थी।
धीरे-धीरे उसकी आँखें भारी होने लगीं।
तभी…एक ठंडी हवा का झोंका खिड़की से आया और उसे छू गया।
रात्री अचानक चौंक गई।
- “अचानक इतनी ठंड…?”
उसने खिड़की की तरफ देखा। सब कुछ सामान्य था।
लेकिन उसके दिल में एक अजीब सा डर बैठ गया।
तभी…
ठक… ठक… ठक… किसी दरवाज़े पर जोर से दस्तक देने की आवाज़ आई। रात्री ध्यान से सुनने लगी।
“ये आवाज़… ऊपर से आ रही है…”
वह धीरे-धीरे तीसरी मंज़िल की ओर बढ़ी।
दूसरी मंज़िल तक सब कुछ साफ और रोशन था। लेकिन तीसरी मंज़िल अंधेरे में डूबी हुई थी। रात्री ने छत का दरवाज़ा खोला। थोड़ी रोशनी अंदर आई।
लेकिन आवाज़ अब भी आ रही थी। ठक… ठक… ठक…
रात्री ने डरते हुए आगे कदम बढ़ाया।
“लगता है कोई… अंदर से दरवाज़ा पीट रहा है…”
वह उत्तर-पश्चिम दिशा वाले कमरे के सामने जाकर रुक गई।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
🔒 बंद दरवाज़ा
“आवाज़… यहीं से आ रही है…”
उसने दरवाज़े को ध्यान से देखा—
दरवाज़े पर कई ताबीज़ बंधे हुए थे।
और उस पर लगा ताला… बहुत बड़ा। अजीब सा।
डरावना। रात्री फुसफुसाई—
“इतने ताबीज़… क्यों?”
उसने धीरे से दरवाज़े को छूने के लिए हाथ बढ़ाया—
“अगर कमरा बंद है…
तो अंदर से आवाज़ कौन कर रहा है…?”
उसकी सांस अटक गई।
“आखिर इस कमरे में है कौन…?”
रक्त पिशाच इंतकाल: आओ, रात्री, आकर मुझे मुक्त कर दो। तुमने मुझे इस कमरे में बंद कर दिया था, इसलिए अब मुझे केवल तुम ही मुक्त कर सकती हो। आओ, देर मत करो। तीन सौ सालों से इस दिन का इंतजार कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि तुम मेरी बात नहीं सुन पा रही हो, लेकिन तुम्हारे भीतर जो इस कमरे के बारे में जिज्ञासा पैदा हुई है, वही तुम्हें मजबूर करेगी इस दरवाजे को खोलने के लिए। हाहाहा 😈
रात्रि: मेरे पास इस कमरे की चाबी नहीं है।
(रात्रि दरवाजे को छूने ही वाली थी तभी...)
केयरटेकर: तुम क्या कर रही हो, बेटी? यहाँ क्यों आई हो?
रात्रि: दादा, इस कमरे से आवाज़ आ रही थी। ऐसा लगा जैसे कोई अंदर से दरवाजे को धक्का दे रहा हो।
केयरटेकर: नहीं, बेटी, यहाँ बिल्कुल मत आओ। यह कमरा अभिशप्त है। मैंने यह अपने दादा से सुना था। यहाँ से चले जाओ, बेटी।
रात्रि: अभिशप्त कमरा? लेकिन फिर वह आवाज़ कौन कर रहा था?
केयरटेकर: हमारे साथ ऐसी कई घटनाएँ होती हैं जिनका कोई तर्क नहीं होता। भूल जाओ, बेटी।
(रात्रि नीचे चली गई।)
रात्रि: मेरा मन तब तक शांत नहीं होगा जब तक मैं यह नहीं जान लेती कि उस कमरे में क्या है।
एयरपोर्ट पर:
अखिल बाबू: तो हम आखिरकार भारत आ ही गए।
निलय (अखिल बाबू का बड़ा बेटा): हाँ डैड, लेकिन अब अगला प्लान क्या है? हम किसी होटल में तो जा रहे होंगे? क्या आपने होटल बुक किया है?
अबीर (अखिल बाबू का छोटा बेटा): नहीं, भाई। हम किसी होटल में नहीं ठहरेंगे। हम तो...
अखिल बाबू: मेरे एक दोस्त के घर रुकेंगे।
निलय: क्यों, डैड?
सुमित्रा देवी: यहाँ के वॉशरूम कितने गंदे हैं! हमारे लंदन की तरह ताजगी नहीं है।
अखिल बाबू: भूलो मत, यही हमारा देश है। लंदन को अपना देश मत कहो। भारत की संस्कृति और लंदन की संस्कृति की तुलना मत करो। भारतवासियों जैसी प्रेम, सम्मान और श्रद्धा लंदनवासी कभी नहीं दे सकते। भारतवर्ष सूरज के समान है।
अबीर: डैड, जरा इधर सुनो...
अखिल बाबू: क्या हुआ, अबीर?
अबीर: क्या हम सही कर रहे हैं?
अखिल बाबू: समझा नहीं, क्या सही नहीं कर रहे?
अबीर: भाई और मम्मी को तो पता ही नहीं है कि हम भारत क्यों आए हैं। मम्मी को क्या पसंद आएगा, भाई के लिए यहाँ की लड़की?
अखिल बाबू: तुम्हारी भाभी को देखकर तुम्हारी मम्मी का सिर चकरा जाएगा। इतनी सुंदर लड़की कहां मिलेगी? लड़की जितनी सुंदर है, उतनी ही पढ़ी-लिखी भी है।
सुमित्रा देवी: तुम दोनों इतनी प्राइवेट बातें क्यों कर रहे हो?
अबीर: कुछ नहीं, मम्मी। एक बिजनेस डील के बारे में बात कर रहे थे।
सुमित्रा: यहाँ भी बिजनेस की बातें शुरू कर दीं?
निलय: कौन सी डील? मुझे भी बताओ।
अबीर: नहीं, भाई, असल में... 😅
ड्राइवर: क्या आप अखिल बाबू हैं?
अखिल बाबू: हाँ। आप कौन हैं?
ड्राइवर: मुझे प्रीतम बाबू (रात्रि के पिता) ने आपको लेने के लिए भेजा है। आइए।
(रात आठ बजे अखिल बाबू अपने परिवार के साथ महल के सामने पहुंचे।)
अबीर: Wow! So Beautiful..
निलय: यह तो किसी राजमहल जैसा लग रहा है। हम यहाँ क्यों आए, डैड?
अखिल बाबू: मेरा दोस्त प्रीतम ने यह घर खरीदा है।
सुमित्रा: ओह, सच में? हम इस महल में रहेंगे? मैं बहुत उत्साहित हूँ!
प्रीतम बाबू (रात्रि के पिता): बिल्कुल नहीं बदले हो, आज भी उतने ही जवान लग रहे हो!
(अखिल बाबू ने खुशी से प्रीतम बाबू को गले लगाया।)
प्रीतम बाबू: कितने दिनों बाद हम फिर से मिले हैं। वैसे, ये मेरी पत्नी प्रतिमा हैं।
अखिल बाबू: नमस्कार, भाभी जी।
प्रतिमा देवी: नमस्कार।
अखिल बाबू: मिलिए, ये मेरी पत्नी सुमित्रा हैं। और ये मेरा बड़ा बेटा निलय और छोटा बेटा अबीर है।
(निलय और अबीर ने नमस्कार किया।)
प्रीतम बाबू: आइए, अंदर आइए।
(ऊषा नीचे डाइनिंग रूम में थी, लेकिन रात्रि यहाँ नहीं दिख रही थी।)
प्रीतम बाबू: ये मेरी छोटी बेटी ऊषा है। ऊषा, आंटी-आंकल को प्रणाम करो।
सुमित्रा देवी: नहीं, नहीं, ठीक है। ऊषा, तुम किस क्लास में पढ़ती हो?
ऊषा: क्लास 12 में।
सुमित्रा देवी: बहुत अच्छा।
अखिल बाबू: मैं तुम्हारी बड़ी बेटी को नहीं देख रहा हूँ।
प्रीतम बाबू: शायद रात्रि अपने कमरे में है। अभी-अभी आई है, थोड़ी देर आराम कर लो। लंबी यात्रा करके आए हो। अबीर, निलय, तुम लोग बाहर क्यों खड़े हो? अंदर आओ।
निलय: जी, अंकल।
ऊषा (सोचते हुए): मेरा जीजू कौन है? दोनों ही बहुत हैंडसम हैं। कौन हो सकता है मेरा जीजू?
रक्तपिशाच इंतकाल: नहीं, यह हो ही नहीं सकता। पृथ्वीराज नीलांबरी की जिंदगी में फिर से नहीं आ सकता। मैंने पिछले जन्म में तुम्हें एक नहीं होने दिया था, और इस बार भी तुम्हें एक नहीं होने दूँगा, किसी भी हालत में नहीं। 👿
🔥 To Be Continued… 😈
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