(SCENE 1: बाजपेई निवास - सुबह की चाय का समय)
SFX: (सुबह की चिड़ियों की चहचहाहट, चाय की चुस्कियां, अखबार पलटने की आवाज़)
सूत्रधार: दुनिया में एक सच्चाई कभी नहीं बदलती—कि अगर कोई लड़का अमीर है, कुंवारा है और सेटल्ड है... तो उसे एक बीवी की सख्त ज़रूरत है। कम से कम रोशनपुर की माताओं का तो यही मानना है। और इसी गलतफहमी... माफ़ कीजियेगा, इसी उम्मीद के साथ शुरू होती है हमारी कहानी बाजपेई परिवार के घर से।
SFX: (तेज़ कदमों की आवाज़, जैसे कोई दौड़ता हुआ आ रहा हो)
शोभा (सांस फूलते हुए, उत्साहित): अरे सुनिए! ओ जी सुनिए! आपने खबर सुनी क्या?
हरीश (शांत भाव से): नहीं शोभा, मैंने नहीं सुनी। और मुझे यकीन है कि तुम मुझे बताने के लिए ही भागी आ रही हो।
शोभा: अरे मज़ाक छोड़िये! खबर पक्की है। वो सामने वाली 'सफेद कोठी' है ना? वो आखिरकार बिक गई! और उसे किसी मामूली आदमी ने नहीं खरीदा।
हरीश: अच्छा? तो किसने खरीदा?
शोभा: मिस्टर कबीर सिंघानिया ने! दिल्ली के बहुत बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट हैं। कल ही अपनी मर्सिडीज़ में आए थे। नौजवान हैं, अमीर हैं और सबसे बड़ी बात... कुंवारे हैं!
हरीश: तो? इससे हमारा क्या लेना-देना?
शोभा (झुंझलाते हुए): हे भगवान! आप कितने भोले हैं या बनने का नाटक करते हैं? हमारे घर में पाँच-पाँच कुंवारी बेटियां बैठी हैं! आपको नहीं लगता कि उनमें से किसी एक की किस्मत खुल सकती है?
हरीश: अच्छा! तो वो यहाँ हमारी किसी बेटी से शादी करने के इरादे से आए हैं?
शोभा: उफ्फ! आप भी ना! इरादा तो हम बनाएंगे ना। सुनिए, आपको आज ही जाकर उनसे मिलना होगा।
इशिता (हंसते हुए, एंट्री लेती है): माँ, अभी तो वो आए भी नहीं हैं और आपने शादी की शहनाई बजा दी? बेचारे को सांस तो लेने दीजिये।
शोभा: तू चुप कर इशिता! अपनी किताबों में ही घुसी रह। तुझे क्या पता दुनियादारी? जाह्नवी! ओ जाह्नवी! अपनी नीली साड़ी निकाल ले, हमें सिंघानिया जी की 'वेलकम पार्टी' में जाना है।
SFX: (संगीत का हल्का ट्रांजिशन - थोड़ा तेज़ और मॉडर्न)
(SCENE 2: 'दि ग्रैंड रोशनपुर क्लब' - वेलकम पार्टी)
SFX: (पार्टी का शोर, कांच के गिलास टकराने की आवाज़, बैकग्राउंड में हल्का बॉलीवुड इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक)
सूत्रधार: और वो शाम आ ही गई। कबीर सिंघानिया ने शहर के सभी रईसों के लिए एक शानदार पार्टी रखी। पूरा शहर उमड़ पड़ा था। लेकिन सबकी नज़रें सिर्फ दो लोगों पर थीं।
SFX: (अचानक संगीत धीमा होता है, फुसफुसाहटें बढ़ती हैं)
एक औरत (फुसफुसाते हुए): अरे वो देखो! वो जो हंस रहा है, वो कबीर सिंघानिया है। कितना हैंडसम है ना!
दूसरी औरत: हाँ, लेकिन उसके साथ वो दूसरा कौन है? वो लंबा वाला, ब्लैक सूट में?
पहली औरत: सुना है वो कबीर का बचपन का दोस्त और बिजनेस पार्टनर है। 'विक्रांत राठौर'। खानदानी रईस है। कबीर से भी दस गुना ज्यादा अमीर!
शोभा (फुसफुसाते हुए): जाह्नवी, इशिता... कमर सीधी करो। वो लोग इधर ही देख रहे हैं। मुस्कुराओ!
(कबीर और विक्रांत पास आते हैं)
कबीर (हंसमुख आवाज़ में): हेलो! मैं कबीर। और यह मेरे दोस्त विक्रांत राठौर। माफ़ कीजियेगा, हम यहाँ नए हैं तो ज्यादा लोगों को जानते नहीं।
शोभा (अति उत्साह में): अरे कोई बात नहीं बेटा! हम हैं ना। मैं मिसेज शोभा बाजपेई। ये मेरी बड़ी बेटी जाह्नवी, और ये उससे छोटी इशिता।
कबीर: अरे वाह! मिस जाह्नवी, क्या मैं आपसे एक डांस की गुजारिश कर सकता हूँ?
जाह्नवी (शर्माते हुए): जी... जरूर।
(कबीर और जाह्नवी चले जाते हैं। इशिता और विक्रांत आमने-सामने रह जाते हैं। एक अजीब सी चुप्पी।)
इशिता (कोशिश करते हुए): तो मिस्टर राठौर, आपको रोशनपुर कैसा लगा? दिल्ली के शोर से तो काफी अलग होगा?
विक्रांत (रूखेपन से, भारी आवाज़ में): जी। यहाँ शोर कम है, लेकिन लोगों में तांक-झांक की आदत ज्यादा लगती है।
इशिता: (हल्का हंसते हुए) वह तो छोटे शहरों का प्यार है जनाब। हम इसे 'अपनापन' कहते हैं।
विक्रांत: हम्म्। एक्सक्यूज़ मी।
(विक्रांत बिना बात पूरी किए मुड़ जाता है और दूर चला जाता है।)
इशिता (मन में): अजीब आदमी है! इतना घमंड? जैसे बात करने के भी पैसे लगते हों।
(SCENE 3: पार्टी का एक कोना - विक्रांत और कबीर)
SFX: (पार्टी का शोर अब बैकग्राउंड में है। विक्रांत और कबीर थोड़ी दूर खड़े हैं।)
कबीर (उत्साह में): यार विक्रांत! तुम वहां कोने में क्यों खड़े हो? मज़ा करो ना। और देखो, यहाँ की लड़कियां कितनी सुंदर हैं। वो जाह्नवी... कितनी प्यारी है!
विक्रांत (बोरियत से): तुम हमेशा बहुत जल्दी पिघल जाते हो कबीर। वो लड़की सिर्फ मुस्कुराना जानती है।
कबीर: अच्छा ठीक है, वो छोड़ो। उसकी बहन देखो, इशिता। वो अभी अकेली खड़ी है। जाओ, उसे डांस के लिए पूछो। दिखने में अच्छी है।
(इशिता पास ही खड़ी जूस पी रही है, वह इनकी बातें सुन लेती है।)
विक्रांत: (हल्की हंसी के साथ) कौन? वो? (थोड़ा रुककर) ठीक-ठाक है (She is tolerable)। लेकिन इतनी भी खूबसूरत नहीं कि मैं अपना स्टैंडर्ड गिरा लूँ और उसके पीछे भागूँ। वैसे भी, मुझे ऐसी लड़कियां पसंद नहीं जो हर किसी से चिपके रहने के लिए बेताब हों। तुम जाओ, अपनी उस 'परी' के साथ नाचो, मुझे बख्श दो।
(इशिता के हाथ से जूस का गिलास टेबल पर ज़ोर से रखने की आवाज़ आती है।)
SFX: (ड्रामेटिक संगीत का एक तेज़ झटका)
(SCENE 4: इशिता और उसकी सहेली चारु)
SFX: (इशिता तेज़ी से चलकर अपनी सहेली चारु के पास आती है)
चारु: क्या हुआ इशिता? तुम्हारा चेहरा क्यों लाल है? उस 'प्रिंस चार्मिंग' ने कुछ कहा क्या?
इशिता (व्यंग्य भरी हंसी के साथ): प्रिंस चार्मिंग? चारु, वो आदमी 'प्रिंस' नहीं, 'पेन' (Pain) है। अभी मैंने सुना, उसने कबीर से कहा कि मैं "ठीक-ठाक" हूँ, पर उसके 'हाई स्टैंडर्ड' के लायक नहीं।
चारु: क्या? उसकी इतनी हिम्मत! घमंडी कहीं का! तुम रोना मत यार।
इशिता: रोना? मैं? (हंसते हुए) अरे चारु, मुझे रोना नहीं, हंसी आ रही है। अगर उसे लगता है कि उसका वो अकड़ भरा चेहरा देखकर मैं इम्प्रेस हो जाउंगी, तो वो बहुत बड़ी गलतफहमी में है।
चारु: तो अब क्या?
इशिता: अब कुछ नहीं। बस देखते जाओ। मिस्टर विक्रांत राठौर ने आज एक गलती कर दी। उन्होंने इशिता बाजपेई को 'हल्के' में ले लिया। अब मैं इस 'गुरूर' के पहाड़ को बताऊंगी कि हम छोटे शहर वाले क्या चीज़ हैं।
सूत्रधार: और इसी के साथ, रोशनपुर की उस सर्द रात में, एक जंग का ऐलान हो गया। एक तरफ था विक्रांत का बेशुमार गुरूर (Pride), और दूसरी तरफ थी इशिता की गलतफहमी (Prejudice)।
SFX: (समापन संगीत - शहनाई और रॉक गिटार का फ्यूज़न)
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें