(SCENE 1: व्हाइट कोठी - ड्राइंग रूम - शाम का वक्त)
SFX: (बाहर हल्की बारिश की आवाज़, दीवार घड़ी की टिक-टिक, लैपटॉप की कीज़ पर टाइप करने की आवाज़)
सूत्रधार: जाह्नवी की तबीयत खराब होने की वजह से इशिता को व्हाइट कोठी में ही रुकना पड़ा। बाहर मौसम ठंडा था, लेकिन कोठी के ड्राइंग रूम का माहौल गर्म होने वाला था। एक तरफ कबीर और उसकी बहन किरण थे, दूसरी तरफ विक्रांत अपनी बिज़नेस डील्स में खोया था, और इशिता... वो बस एक मौका ढूंढ रही थी कि कब विक्रांत के घमंड को तोड़ा जाए।
कबीर: इशिता जी, जाह्नवी कैसी है अब?
इशिता: बुखार कम है कबीर जी, लेकिन सिरदर्द अभी भी है। वो सो रही है, तो मैं नीचे आ गई। उम्मीद है आप लोगों को डिस्टर्ब नहीं कर रही?
किरण (बनावटी मुस्कान के साथ): अरे नहीं, डिस्टर्ब कैसा? वैसे भी तुम अपनी बहन की नर्स बनकर आई हो। (विक्रांत की ओर मुड़कर) विक्रांत, तुम अपनी बहन जियॉर्जियाना को ईमेल लिख रहे हो ना? मेरी तरफ से भी 'प्यार' लिख देना। वैसे, उसकी हैंडराइटिंग कितनी सुंदर है ना?
विक्रांत (बिना सिर उठाए): हम्म।
किरण: काश मैं भी उसकी तरह पेंटिंग कर पाती, पियानो बजा पाती। सच में, आज के ज़माने में "सर्वगुण संपन्न" (Accomplished) लड़कियाँ मिलती ही कहाँ हैं?
कबीर (हंसते हुए): अरे किरण, मेरी नज़र में तो सारी लड़कियाँ सर्वगुण संपन्न हैं। वो पेंटिंग करती हैं, पर्स सजाती हैं, गाना गाती हैं... मुझे तो समझ नहीं आता तुम लोग इतना सब कैसे कर लेती हो।
विक्रांत (लैपटॉप बंद करते हुए, गंभीर आवाज़ में): कबीर, तुम्हारा पैमाना बहुत छोटा है। मैं अपनी ज़िंदगी में सिर्फ 5-6 महिलाओं को जानता हूँ जिन्हें मैं वाकई 'सर्वगुण संपन्न' कह सकता हूँ।
(इशिता, जो अब तक किताब पढ़ रही थी, सिर उठाती है।)
इशिता: सिर्फ 5 या 6? तो फिर मिस्टर राठौर, आपकी नज़र में एक "परफेक्ट वूमन" की परिभाषा क्या है?
विक्रांत (कुर्सी पर पीछे झुकते हुए): एक ऐसी महिला... जिसे संगीत, पेंटिंग, डांस और मॉडर्न लैंग्वेज का गहरा ज्ञान हो। जिसकी चाल-ढाल में एक ग्रेस हो, बात करने का सलीका हो। और इन सबसे बढ़कर... (इशिता की आँखों में देखते हुए) ...जिसने खूब किताबें पढ़ी हों ताकि उसकी सोच, आम लोगों जैसी छोटी न हो।
इशिता (हल्का हंसते हुए): वाह! इतनी सारी खूबियां? मुझे तो हैरानी है कि आप 5-6 ऐसी महिलाओं को जानते हैं। मुझे तो लगता है ऐसी कोई औरत दुनिया में है ही नहीं। यह इंसान नहीं, कोई रोबोट या देवी होगी। मिस्टर राठौर, आप शायद बहुत ज्यादा की उम्मीद रखते हैं, इसीलिए हमेशा निराश रहते हैं।
विक्रांत: और आप शायद अपनी दुनिया से बाहर देखना नहीं चाहतीं, इसीलिए हर चीज़ का मज़ाक उड़ाती हैं।
किरण (बीच में कूदते हुए): एक्ज़ेक्टली विक्रांत! इशिता शायद रोशनपुर की लड़कियों को ही जानती है।
SFX: (तनावपूर्ण संगीत का एक छोटा टुकड़ा)
(SCENE 2: अगले दिन की सुबह - ड्राइंग रूम)
SFX: (दरवाजे की घंटी, भारी कदमों की आहट, शोभा बाजपेई की तेज़ आवाज़)
सूत्रधार: बहस अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि अगले दिन एक नया तूफ़ान आ गया। मिसेज शोभा बाजपेई, अपनी बीमार बेटी का हाल जानने (और अपनी रईस बेटी के ससुराल का मुआयना करने) पहुँच गईं।
शोभा (ऊंची आवाज़ में): अरे मेरी बच्ची जाह्नवी! कैसी है तू? हाय, चेहरा कितना उतर गया है। लेकिन फिक्र मत कर, डॉक्टर ने कहा है यहाँ की हवा तेरे लिए अच्छी है। (कबीर की तरफ देखकर) क्यों कबीर बेटा? मेरी बेटी को यहाँ कोई तकलीफ़ तो नहीं ना?
कबीर: अरे बिलकुल नहीं आंटी जी। ये तो हमारा सौभाग्य है।
शोभा: हाय, तुम कितने अच्छे हो! काश बाकी लोग भी इतने ही मिलनसार होते। (विक्रांत की तरफ तिरछी नज़र से देखते हुए) कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जिन्हें लगता है कि वो ही दुनिया के राजा हैं।
इशिता (घबराकर): माँ... प्लीज।
शोभा: क्यों प्लीज? मैं सच ही तो कह रही हूँ। सुनिए मिस्टर राठौर, मैंने सुना है आपको रोशनपुर पसंद नहीं आया? आपको लगता है यहाँ की लड़कियाँ दिल्ली की लड़कियों जितनी सुंदर नहीं होतीं?
विक्रांत (शांति से): मिसेज बाजपेई, शहर कोई भी हो... समझदार लोग हर जगह कम ही मिलते हैं।
शोभा (गुस्से में): क्या मतलब? आप हमें बेवकूफ कह रहे हैं? अरे जाह्नवी की सुंदरता के चर्चे तो पूरे शहर में हैं। एक बार उसकी शादी हो जाए, फिर देखना...
इशिता: माँ! बस कीजिये। हमें चलना चाहिए।
शोभा: अरे अभी कहाँ? कबीर बेटा, तुमने बताया नहीं, तुम परमानेंटली यहीं रहोगे ना? या अपने दोस्त की तरह भाग जाओगे?
कबीर: नहीं आंटी, मुझे रोशनपुर बहुत पसंद है। मैं यहीं रहूँगा।
शोभा: चलो शुक्र है। कोई तो समझदार है।
(विक्रांत खड़ा होता है और खिड़की की तरफ चला जाता है।)
(SCENE 3: उसी शाम - ड्राइंग रूम में सन्नाटा)
SFX: (रात का सन्नाटा, पन्ने पलटने की आवाज़)
सूत्रधार: शोभा के जाने के बाद इशिता शर्मिंदा थी, लेकिन वो यह दिखाना नहीं चाहती थी। वो सोफे पर बैठी थी। विक्रांत कमरे में टहल रहा था।
इशिता (मन में): यह आदमी मेरे सिर पर खड़ा होकर मुझे घूर क्यों रहा है? क्या यह मेरी माँ की बातों का मज़ाक उड़ाने की सोच रहा है?
इशिता (विक्रांत से): मिस्टर राठौर, अगर आप मुझे घूरकर डराने की कोशिश कर रहे हैं, तो मैं बता दूँ... मैं आसानी से नहीं डरती।
विक्रांत: मैं आपको डरा नहीं रहा, मिस इशिता। मैं बस... सोच रहा था।
इशिता: क्या? कि हम छोटे शहर वाले कितने गंवार हैं?
विक्रांत (मुस्कुराते हुए): नहीं। मैं सोच रहा था कि आपकी आँखें बहुत सुंदर हैं। जब आप गुस्सा होती हैं, तो और भी ज़्यादा।
SFX: (एकदम सन्नाटा - चौंकाने वाला संगीत)
इशिता (हड़बड़ाते हुए): क्या? (संभलते हुए) आप... आप मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं?
विक्रांत: हर बात मज़ाक नहीं होती।
किरण (दूर से आती हुई): विक्रांत! यहाँ आओ, मुझे इस म्यूजिक ट्रैक में कुछ समझ नहीं आ रहा।
विक्रांत (इशिता को देखते हुए): एक्सक्यूज़ मी।
(विक्रांत चला जाता है)
इशिता (खुद से): यह आदमी पागल है। अभी इंसल्ट करता है, अभी तारीफ। "आँखें सुंदर हैं?" हुह! ज़रूर कोई चाल होगी। इस पर भरोसा करना बेवकूफी है।
सूत्रधार: इशिता इसे चाल समझ रही थी, लेकिन वो नहीं जानती थी कि विक्रांत राठौर, जो अपनी इज़्ज़त और खानदान पर इतना नाज़ करता था... अब एक बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाला था। उस मुसीबत का नाम था—इश्क़।
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