(SCENE 1: बाजपेई निवास - रात का समय - इशिता और जाह्नवी का कमरा)
SFX: (रात के झींगुरों की आवाज़, रजाई की सरसराहट, घड़ी की टिक-टिक)
जाह्नवी (सपनों में खोई हुई आवाज़): ईशू... क्या तुमने देखा उसने मुझे कितनी बार डांस के लिए पूछा? कबीर सिंघानिया... वो बिल्कुल वैसे हैं जैसा मैं हमेशा से चाहती थी। विनम्र, हंसमुख और...
इशिता (हंसते हुए): और अमीर?
जाह्नवी: नहीं! तुम हमेशा मज़ाक उड़ाती हो। मुझे उनकी सादगी अच्छी लगी।
इशिता: दीदी, उनकी सादगी अच्छी है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन उनके वो दोस्त? मिस्टर 'अकडू' राठौर? मुझे समझ नहीं आता कि कबीर जैसा प्यारा इंसान, विक्रांत जैसे घमंडी आदमी को अपना बेस्ट फ्रेंड कैसे बना सकता है।
जाह्नवी: अरे, शायद वो शर्मीले हों? हमें उन्हें जानने का मौका देना चाहिए।
इशिता: मौका? (हंसते हुए) मैंने उन्हें अपनी राय बनाते हुए सुन लिया है, दीदी। वो आदमी खुद को खुदा समझता है। भगवान बचाए ऐसे 'शर्मीले' लोगों से।
SFX: (दरवाजा जोर से खुलने की आवाज़)
शोभा (उत्साह में अंदर आती है): अरे, तुम दोनों अभी तक जगी हो? जाह्नवी, मेरी बच्ची! आज तो तूने कमाल कर दिया। मैंने देखा कैसे वो कबीर तुझसे नज़रें नहीं हटा पा रहा था। मेरी मान, तो शादी पक्की समझ!
इशिता: माँ, अभी तो बस एक डांस हुआ है।
शोभा: एक डांस से ही सब शुरू होता है, पगली! लेकिन वो उसका दोस्त... वो लंबा खंभा, विक्रांत! कितना बदतमीज़ है। मेरी तरफ देखा तक नहीं। मैं तो कहती हूँ, उससे दूर ही रहना। वैसे भी, कबीर के पास 500 करोड़ की जायदाद है, और विक्रांत के पास सिर्फ अकड़। हमें क्या?
(SCENE 2: अगला दिन - नाश्ते की मेज)
SFX: (चम्मच और प्लेट की आवाज़, बैकग्राउंड में टीवी चल रहा है)
इशिता: दीदी, तुम्हारे लिए एक लेटर आया है। 'व्हाइट कोठी' से।
शोभा (चहकते हुए): ला मुझे दिखा! (कागज फड़फड़ाने की आवाज़) अरे वाह! कबीर की बहन, किरण सिंघानिया ने जाह्नवी को लंच पर बुलाया है। देखा? मैंने कहा था ना!
जाह्नवी: पर माँ, लेटर में लिखा है कि कबीर और विक्रांत घर पर नहीं हैं। वो शहर गए हैं। सिर्फ किरण और मैं होंगे।
शोभा: अरे तो क्या हुआ? दोस्ती तो बढ़ा। तू तैयार हो जा।
जाह्नवी: ठीक है, मैं पापा से कहती हूँ कि गाड़ी निकाल लें। बादल बहुत घने हैं, बारिश हो सकती है।
शोभा (चालाकी से): गाड़ी? नहीं-नहीं! तुम्हारे पापा को गाड़ी चाहिए, उन्हें... अह... कहीं जाना है।
हरीश (अखबार के पीछे से): मुझे? मुझे तो कहीं नहीं...
शोभा (हरीश को कोहनी मारते हुए - दबी आवाज़ में): चुप रहिये! (ऊंची आवाज़ में) हाँ, इन्हें काम है। जाह्नवी, तू अपनी स्कूटी ले जा।
जाह्नवी: स्कूटी? माँ, बारिश होने वाली है। मैं भीग जाऊँगी।
शोभा (खुश होकर): अरे तो और भी अच्छा है ना! अगर तू भीग गई, तो बीमार पड़ जाएगी। और अगर तू बीमार पड़ गई, तो तुझे आज की रात वहीं 'व्हाइट कोठी' में, कबीर के घर रुकना पड़ेगा!
इशिता: माँ! यह कैसी प्लानिंग है? आप चाहती हैं कि दीदी बीमार पड़ जाएं?
शोभा: इसे 'प्लानिंग' नहीं, 'मौके का फायदा उठाना' कहते हैं। जा जाह्नवी, निकल जा, इससे पहले कि बारिश शुरू हो!
(SCENE 3: इशिता का घर - अगली सुबह)
SFX: (फोन की घंटी बजती है)
इशिता: हेलो?
जाह्नवी (फोन पर, खांसते हुए और कमज़ोर आवाज़ में): हेलो ईशू... माँ का प्लान काम कर गया। मैं बुरी तरह भीग गई थी। अब मुझे तेज बुखार है और गला भी खराब है। किरण मिसरा ने डॉक्टर बुलाया है।
इशिता (चिंतित): क्या? मैं जानती थी यही होगा। माँ भी ना! दीदी, तुम चिंता मत करो। मैं अभी आती हूँ।
शोभा (पीछे से): अरे कार तो है नहीं। तू कैसे जाएगी?
इशिता: मैं पैदल जाउंगी माँ। तीन किलोमीटर ही तो है। मुझे अपनी बहन की चिंता है, आपकी 'रणनीति' की नहीं।
(SCENE 4: खेत और कच्चा रास्ता - बारिश के बाद)
SFX: (कीचड़ में चलने की आवाज़ - छप-छप, इशिता की तेज सांसें, गीली हवा की सांय-सांय)
सूत्रधार: इशिता ने न धूप देखी, न कीचड़। खेतों के बीच से शॉर्टकट लेते हुए, अपने जूतों और कपड़ों की परवाह किए बिना, वो सीधे 'व्हाइट कोठी' की ओर बढ़ रही थी। उसके बाल बिखर गए थे, चेहरा लाल था, और जूतों पर कीचड़ लगा था। उसे खबर नहीं थी कि उसका यह रूप किसी की सोच बदलने वाला है।
(SCENE 5: व्हाइट कोठी - ड्राइंग रूम)
SFX: (महंगे एसी की हम्मिंग साउंड, नाजुक चाय के कप रखने की आवाज़)
किरण (बिंगली की बहन - ताना मारते हुए): हे भगवान! कबीर, देखो तो सही कौन आया है।
कबीर: अरे इशिता जी! आप? इस हालत में?
इशिता (हांफते हुए): नमस्ते। मैंने सुना दीदी की तबीयत खराब है। गाड़ी मिली नहीं, तो मैं पैदल आ गई। क्या मैं उनसे मिल सकती हूँ?
(विक्रांत भी वहां खड़ा है। वह इशिता को ऊपर से नीचे तक देखता है।)
विक्रांत (मन में - Voiceover): बाल बिखरे हुए हैं। साड़ी पर कीचड़ के दाग हैं। चेहरा धूप से तमतमाया हुआ है... लेकिन... इसकी आँखों में एक अजीब सी चमक है। यह लड़की... आम लड़कियों जैसी नहीं है।
किरण: इशिता, तुम तो ऐसे लग रही हो जैसे किसी जंगल से भागकर आई हो। क्या तुम्हारे घर में कोई नौकर नहीं है जो तुम्हें छोड़ जाता?
इशिता (आत्मविश्वास से): मुझे अपनी बहन से मिलने के लिए किसी नौकर या गाड़ी का मोहताज होना पसंद नहीं, किरण जी। कीचड़ कपड़ों पर लगा है, मेरे इरादों पर नहीं। कबीर जी, दीदी का कमरा कहाँ है?
कबीर: जी, ऊपर दाईं तरफ। प्लीज जाइये।
(इशिता चली जाती है)
किरण (हंसते हुए): देखा विक्रांत? कितना देहातीपन है। तीन किलोमीटर कीचड़ में चलकर आना? इन लोगों को अपनी ग्रूमिंग की कोई फिक्र ही नहीं है।
कबीर: किरण, यह उसका अपनी बहन के लिए प्यार है।
किरण: प्यार? यह पागलपन है। क्यों विक्रांत, तुम्हें तो ऐसी 'जंगली' औरतें पसंद नहीं होंगी ना? जिसकी आँखों में इतनी बेबाकी हो?
विक्रांत (गहरी आवाज़ में): बेबाकी है... पर मुझे यह कहना पड़ेगा किरण, कि इतना पैदल चलने के बाद उसकी आँखें और भी ज्यादा चमकदार लग रही थीं।
किरण (हैरान होकर): क्या? तुम मज़ाक कर रहे हो ना?
SFX: (सस्पेंस भरा संगीत)
सूत्रधार: विक्रांत राठौर का दिल पिघल रहा था, लेकिन इशिता के दिल में अभी भी नफरत की दीवार खड़ी थी। और अब, जाह्नवी की बीमारी के कारण, इशिता और विक्रांत को अगले कुछ दिन एक ही छत के नीचे गुज़ारने थे। तकरार का असली मज़ा तो अब शुरू होगा।
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