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मिलिए शर्मा परिवार से

S
Sanjana Guha
22 Mar 2026

अगर किसी सेहर में अतीत और वर्त्तमान को एक साथ गुज़रते हुए देखना चाहते हो तो कोलकाता चले आओ। कोलकाता में जैसे आपको पुराने ब्रिटिश structure के घर मिलेगा वैसे ही मिलेगा नए ज़माने का 2BHK। पार हमारी कहानी 2BHK में रहने वाली किसी परिवार की नहीं हैं बल्कि दो बहुत पुराने पड़ोसियों के हैं। जो इस सेहर में करीब ६० साल से रह रहे हैं। उसमे से एक हैं हमारी शर्मा परिवार। वैसे तो पंजाबी हैं, पार पिछले ६० साल यह सेहर ही उन लोगो का घर हैं। किसी बंगाली से भी ज़्यादा वह प्यार करते हैं इसे सेहर को। इन लोगो ६० साल पुराण मिठाई का दूकान हैं यहाँ पे। 

 

आदर्श शर्मा के पिता विजेंद्र शर्मा ने एक छोटे से जगह पे अपना दूकान “शर्माजी की मिठाई और नमकीन” खोली थी। जब उन्होने यह दूकान खोली उनको यह अंदाजा भी नहीं था की आगे चल के इस दूकान का नाम सेहर के चारो और फेल जाइएगा। 

 

अब यह दूकान उनके बेटे आदर्श और आनंद देखते हैं। आदर्श की उमार कुछ ६० के आस-पास होगा और आनंद का कुछ ५५ के आस-पास। आदर्श और आनंद के एक और भाई था, आदर्श से छोटा पर आनंद से बढ़ा। अलोक नाम था उसका, २१ साल पहले ९/११ के World Trade Center पे जो आतंकवादी हमला हुआ था उसपे उन की और उनकी बीवी, नयना, की मौत हो गयी। उन दोनो का एक ६ साल का बेटा था, रोहन। वह अब आपने ताऊजी-ताईजी, चाचा-चाची और आपने भाई-बेहेन के साथ यहाँ, मतलब, कोलकाता में रहते हैं।

 

अभी इस वक़्त वह सो रहा हैं। वैसे वह बहुत देर रात तक किताबे पढ़ता हैं, इसीलिए रोज़ सुबह उसे उठने में बहुत देर हो जाती हैं। आज भी घरी की सुई ९ की तरफ बढ़ रहा हैं लेकिन रोहन अभी भी नहीं उठ रहा देख उसकी ताईजी, सुषमा, उसे जगाने आयी हैं।

 

“रोहन! रोहन बेटा उठ, देख ९ बजनेवाला हैं तुझे काम पे नहीं जाना हैं!” ताईजी रोहन को जगाने की कोशिस में बोला। लेकिन रोहन उठने की वजह कम्बल से अपना सिर ढक के बोलता हैं, “ताईजी सोने दो ना! कौनसा ऑफिस जाना हैं मुझे?”

 

“लेकिन तेरी दुकान तो रोज़ज ९:३० खुल जाता हैं ना?”

 

“आज १२ बाजे खुलेगा!”

 

“बेटा उठ जा! देख में तेरे लिए चाय लायी हु। पी ले, फ्रेश हो जाएगा!” ताईजी की बात सुन कर रोहन उठ बैठता हैं और कहता हैं, “सोने नहीं दोगे ना तुम!”

 

“रात रात भर पढ़ने की क्या ज़रुरत हैं? जल्दी सो जाया कर। जल्दी उठ जायेगा।” ताईजी रोहन को चाय देते हुए बोली। रोहन चाय लेकर बोला, “सच सच बताओ तो काम क्या हैं? इतना टाइम मेरे पीछे क्यों बर्बाद कर रही हैं?”

 

“क्यों में तुझे टाइम नहीं देती?” ताईजी आँखे गोल गोल कर के बोली।

 

“हां देते हो ना। जब आपको सिनेमा देखनी होती हैं और कोई जाने के लिए तैयार नहीं होता हैं तब और तब जब आप मेरे लिए—” इतना बोलके रोहन रुक जाता हैं और फिर कहता हैं, “Oh no! फिर से रिस्ता लेके आयी हैं आप!” रोहन की चीक सुन के ताईजी को लगा अभी बात बिगड़ने वाला हैं। फिर भी बोली, “एक बार मिल तो ले अच्छी लड़की हैं। तेरी ताऊजी तो बोल रहे थे अगर कुछ साल पहले रिस्ता आता तो वह खुद कर लेते शादी!” ताईजी को हँसते हुए देख रोहन चीड़ के बोला, “तो उन्हें बोले करने के लिए मेरे पीछे क्यों पढ़े हो!”

 

अब रोहन के ताईजी गुस्सा होक बोली, “कुछ भी बोले जा रहा हैं! तमीज नाम की कोई चीज़ हैं या नहीं?” रोहन बिस्तर से उतर ते हुए बोला, “नहीं हैं। आपको तो पता होना चाहिए ना!” ताईजी गुस्सा होके कमरे से जाते हुए बोली, “बीन माँ का औलाद हैं देख कर तुझे थोड़ा ज़्यादा प्यार दे दिया था। गलती हो गयी मुझ से। सब सही कहते हैं मैंने ही तुझे बिगाड़ा हैं!”

 

रोहन आँखों में पानी लिए फिर से बिस्तर पे बैठ जाता हैं और फिर अपना आँशु पौहच के मान ही मान कहता हैं, “हां बहुत प्यार करते हैं आप हम से। बस कभी यह भूल नहीं पाते हो की में किसी और का हु आपका नहीं! याद दिला दिया ना बीन माँ का औलाद हु!”

 

ऐसा नहीं हैं की इस घर में रोहन से कोई प्यार नहीं करता हैं। बल्कि वह तो सबका लाडला हैं। पर हां कोई कभी यह नहीं भूलता हैं की रोहन अनाथ हैं और एहि बात रोहन के दिल को चोट पोहचता हैं।

 

****

सुबह का नास्ता पूरा शर्मा परिवार एक साथ करता हैं। यह इन लोगो की पुराणी रीत हैं। आज भी सब एक साथ ही बैठे हैं लेकिन एक कुर्सी खली हैं। वह देख के आदर्श शर्मा का बढ़ा बेटा ऋषब बोला, “रोहन किधर हैं माँ?” 

 

अगर इस घर में कोई रोहन को दिल से चाहता हैं, उसका ख्याल रखता हैं, और उसे डांटने की हिम्मत रखता हैं तो वह हैं ऋषब। और रोहन भी अगर यहाँ किसी की बात सुनता हैं तो वह हैं ऋषब। ऋषब का खुद का छोटा भाई हैं, आदर्श शर्मा का छोटा बेटा। पर ऋषब उससे भी ज़्यादा प्यार करता हैं रोहन को। ऋषब के लिए पूरी दुनिया एक तरफ और रोहन एक तरफ हैं। इसीलिए ज़ाहिर सी बात रोहन का नास्ते के वक़्त न होना ऋषब को परेशान करेगा ही।

 

ऋषब की माँ मतलब रोहन की ताईजी थोड़े से गुस्से के साथ बोली, “वह नहीं खायेगा। वह दुकान चला गाय हैं!” ऋषब यह सुन के हैरान हो गाया और बोला, “चला गाया मतलब? भूका पेट घर से निकल गाया? और आप लोगो ने जाने दिया?”

 

इस बार आदर्श चीड़ कर बोले, “वह जैसे हमारा हर बात मानता हैं! तुझे नहीं मालुम कितना ज़िद्दी हैं वह? एक बार अगर उसने बोल दिया की वह नहीं खायेगा मतलब वह नहीं खायेगा!” ऋषब अब गुस्से में खड़े होक बोले, “आप लोगो वक़्त लेके समझते हो उसे? सिर्फ उसकी ज़िद्द दिखती हैं आप को, हैं न?” फिर वह अपनी माँ की तरफ मूर के बोलता हैं, “आज फिर से रिस्ते की बात की उससे?” ऋषब अपनी माँ और बाकी के घरवालों को अच्छे से जानता हैं। इसीलिए उससे समझने में वक़्त नहीं लगा की किस बारे में रोहन गुस्सा होके नास्ता किये बगैर निकल गाया। उसकी माँ कहता हैं, “आज उसके माँ-बाप ज़िंदा होते तो अब तक शादी हो गया होता तेरे भाई का! एक बार भी सोचा हैं आस-पड़ोस के लोग क्या कहते हैं। सब को तो यही लगता हैं ना हमारा खुद का बच्चा नहीं हैं इसीलिए हम उसका ख्याल नहीं रखते। उसके शादी के बारे में नहीं सोचते।”

 

“माँ कोई क्यों कुछ कहेगा मैंने भी तो अभी तक शादी नहीं की हैं। और लोग क्या कहेगा इसके बारे में क्या सोचना?” ऋषब चीड़ कर बोले। आदर्श अब बोला, “लोगो के बारे में सोचना पढ़ता हैं बेटा। हम एक समाज में रहते हैं। हर बात को हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते हैं। और रही बात तुम्हारी तुम ने खुद आपने business को खड़ा करने के लिए थोड़ा सा वक़्त माँगा हैं। पर रोहन का business तो ठीक-ठाक चलता हैं। उससे शादी क्यों नहीं करना एक वजह तो दे दे!”

 

“आप लोगो से बात करना बेकार हैं। एक ही बात पे आड़े रहते हो आप लोग! बेचारा लड़का भूका पेट निकल गाया इस बात से किसी को कुछ पढ़ी नहीं हैं” यह बोलकर ऋषब टेबल छोड़के दरवाज़े के पास जा के अपना जूता पहनने लगता हैं। वह देख उसकी माँ रोते हुए बोलती हैं, “हां हां दुश्मन हैं हम तेरे भाई का! बीन माँ का औलाद हैं फिर भी आपने बच्चे से अलग नहीं देख हैं मैंने उसे।”

 

“अच्छा?” ऋषब अपना जूता पहन के खड़े होक बोला, “तो फिर बार बार ‘बीन माँ का’ ‘बीन माँ का’ क्यों बोलते हो? क्यों की तुम भी कभी यह भूल नहीं पाती हो की वह तुम्हारा औलाद नहीं हैं। तुम्हारे देवर-देवरानी का हैं। और इसी बात से मुझे ऐतराज़ हैं।” यह कहकर ऋषब वह से निकल जाता हैं।

 

आदर्श का छोटा भाई आनंद देख के बोलता हैं, “अरे देखो यह भी बिना कुछ खाये चला गाया!” अनंद की बेटी रिद्धिमा बोली, “रोहन भइया कुछ नहीं खाये सुबह से। आप को क्या लगता हैं ऋषब भाई खाएंगे?” आनंद कुछ नहीं बोला, आदर्श का छोटा बेटा रजत बोला, “अरे मोल्लाह की दौर मस्जिद तक। रोहन भाई को लेके ज़्यादा फ़िक्र मात करो। आप सब जानते हो वह कहा जा सकता हैं। और वह अभी शायद भूके भी नहीं हैं। इसीलिए आप लोग फ़िक्र करना छोड़ दो। रोहन और ऋषब भाई ज़्यादा देर तक भूके नहीं रहेंगे।”

 

वैसे रजत ने जो कहा वह गलत नहीं था। सच में एक ऐसा घर था जहा पर रोहन उदास होने पर चुप सकता हैं। और वह लोग रोहन, ऋषब और बाकि बच्चो को आपने घर के बच्चो जितना ही प्यार करते हैं। इसीलिए शर्मा परिवार का कोई इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा। और आपने खाने पार मान लगाया।

 

ऋषब आपने घर से निकल के सड़क के उसे पार जो छोटा सा दो माले का जो लाल-सफ़ेद रंग का पुराण घर हैं उसके सामने जाके खरा हुआ। इस घर का नाम हैं “डाकघर” हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक से अनुप्राणित होक इस घर का नाम रखा गाया था। ऋषब इस घर के सामने खड़े होकर दरवाज़े की घंटी बजाई।

 

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