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ज़मीन पर पहले क़दम

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हर क़दम काँटों पर, हर क़दम दर्द में — पर लहर के मन में बस एक चेहरा।

किनारे पर इंसान बनकर

लहर पानी से बाहर निकली। एक रेतीले किनारे पर। वो किनारा वही था — जहाँ उसने राजकुमार आर्यन को छोड़ा था।

उसने अपने नए पैर देखे। दो लंबे, सफ़ेद, सीधे पैर। पाँव की उंगलियाँ। कितनी अजीब चीज़।

उसने उठने की कोशिश की। पहली बार में ही गिर पड़ी। फिर कोशिश की। फिर गिरी।

आख़िर में — हाथ ज़मीन पर रखकर — उसने धीरे-धीरे ख़ुद को ऊपर उठाया।

एक क़दम।

तुरंत — एक तेज़ दर्द। उसके पाँव में जैसे हज़ारों काँटे।

उसने आँखें बंद कीं। पर रुकी नहीं।

दूसरा क़दम। तीसरा। चौथा।

हर क़दम पर दर्द। पर हर क़दम के साथ राजकुमार आर्यन की याद।

"मुझे उस तक पहुँचना है। दर्द से ज़्यादा कुछ नहीं।"

राजमहल का रास्ता

लहर ने पास के एक मठ को देखा। याद आया — यहीं रागिनी ने राजकुमार को पाया था।

उसने अपनी कमर पर समंदर की लहरों ने उसे एक हल्की पोशाक पहना दी थी। मूंगे, सीप, समंदरी पौधे — सब मिलकर उसका कपड़ा बन गए।

वो धीरे-धीरे रास्ते पर चली। एक राह से होते हुए — एक छोटे शहर की तरफ़।

शहर के बाहर — एक राजमहल था। बहुत बड़ा। सफ़ेद संगमरमर का।

लहर के पाँव में दर्द बढ़ता ही जा रहा था। पर वो आगे बढ़ती गई।

राजमहल के बड़े दरवाज़े पर पहरेदार थे।

"रुक! कौन है तू?"

लहर ने कुछ कहना चाहा। पर आवाज़ नहीं निकली। उसके होंठ हिले — पर हवा ही निकली।

पहरेदार हैरान।

"कुछ बोल! तू कौन है? कहाँ से आई?"

लहर ने अपने हाथ इशारे से आगे की तरफ़ बढ़ाए। बस "मुझे अंदर जाना है" का इशारा।

तभी — दरवाज़े पर एक और इंसान आया। राजकुमार आर्यन ख़ुद।

राजकुमार की पहली नज़र

राजकुमार ने लहर को देखा। उसकी आँखों में कुछ अजीब-सा।

"रुको पहरेदार। ये कौन है?"

"राजकुमार जी, ये अजीब-सी लड़की है। बोल नहीं पाती।"

राजकुमार ने लहर के पास आकर ध्यान से देखा।

"तू कौन है, बेटी?"

लहर ने कोशिश की। पर आवाज़ नहीं।

उसने अपने हाथों से इशारा किया। समंदर की दिशा। फिर ख़ुद की तरफ़।

"समंदर से आई?"

उसने सिर हिलाया।

"तेरा कोई परिवार?"

उसने सिर नहीं हिलाया।

राजकुमार के मन में एक नर्म-सी जगह बनी।

"पहरेदार, इसे अंदर लाओ। हमारे महल में रहेगी। मैं इसका ख़याल रखूँगा।"

राजमहल में पहले दिन

लहर को एक छोटा-सा कमरा दिया गया। नौकरानियों ने उसे नर्म कपड़े पहनाए। बाल बनाए। उसे राजमहल का कुछ खाना खिलाया।

शाम को राजकुमार आर्यन उसके पास आया।

"तू अब ठीक है?"

लहर ने सिर हिलाया।

"तू बहुत प्यारी लड़की है। पर तू बोल नहीं सकती। ये कैसी विडंबना है।"

लहर की आँखों में दुख था।

राजकुमार ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

"देख। मेरी एक कहानी है। मैं तुझे सुनाता हूँ।"

उसने सब कुछ सुनाया। तूफ़ान, जहाज़, डूबना, फिर एक नई जगह जागना। और उसे पाने वाली लड़की — रागिनी।

"लहर, मुझे लगता है — रागिनी ने मेरी जान बचाई। पर एक बात मेरे मन में अजीब है। उस तूफ़ान में मेरे डूबते वक़्त — मैंने एक चांदी जैसी चमक देखी थी। एक मरमेड? पर वो तो कहानियों में होती हैं।"

लहर का दिल ज़ोर से धड़का। वो कुछ कहना चाहती थी — पर आवाज़ नहीं।

उसने राजकुमार के हाथ को मज़बूती से पकड़ा। उसकी आँखों में देखा।

राजकुमार चौंका।

"लहर, तेरी आँखें कितनी सुंदर। ऐसी आँखें मैंने पहले कहाँ देखी हैं? जैसे समंदर में डूबी हुईं।"

पर वो उसे पहचान नहीं पाया।

दूसरा दिन — बाग़ में

दूसरे दिन राजकुमार ने लहर को राजमहल का बाग़ दिखाया। बहुत बड़ा बाग़। हर तरह के पेड़, फूल, फल।

लहर हर चीज़ देखती थी जैसे पहली बार। उसने एक तितली देखी — मुस्कुराई। एक खरगोश देखा — आँखें बड़ी कीं।

राजकुमार उसे देखकर हँसता।

"लहर, तू इतनी ख़ुश हो जाती है छोटी-छोटी चीज़ों से। मेरी रागिनी तो हर चीज़ पर थोड़ा शिकवा करती है। पर तू..."

दोनों एक पेड़ के नीचे बैठे। राजकुमार ने उसके लिए ख़ुद आम तोड़ा। दिया।

लहर ने पहली बार आम खाया। उसका चेहरा ख़ुश हो गया।

"लहर, तू बहुत प्यारी हो। काश तू बोल पाती।"

लहर ने उसकी आँखों में देखा। एक छोटी-सी आँसू उसकी आँख में।

रागिनी की वापसी

तीसरे दिन राजमहल में हलचल हुई। एक राज-गाड़ी आई। उसमें से रागिनी निकली।

राजकुमार उसे लेने दौड़ा।

"रागिनी! तू आ गई!"

उसने उसे गले लगाया। दोनों के बीच की मीठी बातें।

लहर एक कोने से ये सब देख रही थी। उसका दिल टूट रहा था।

राजकुमार ने रागिनी को लहर का परिचय कराया।

"रागिनी, ये लहर। ये बोल नहीं पाती। मैंने इसे अपने महल में रखा है।"

रागिनी ने लहर को देखा। उसकी आँखों में थोड़ा-सा शक।

"राजकुमार, ये कौन है? तू ने मुझे क्यों नहीं बताया था?"

"ये बस एक अनजान लड़की है। समंदर से आई थी। बहुत भली है।"

रागिनी ने सिर हिलाया। पर उसके मन में जलन।

कल की एक बड़ी बात

उस शाम राजकुमार ने सब को इकट्ठा किया।

"मेरे लोगो! मैं ने एक बड़ा फ़ैसला किया है। कल — जो लड़की मेरी जान बचाने वाली है — उससे मैं शादी करूँगा! रागिनी मेरी पत्नी होगी।"

लोगों ने जयघोष किया।

लहर के पाँव से ज़मीन खिसक गई। उसका तीसरा दिन था। आज शाम तक उसे राजकुमार से कुछ वादा लेना था।

पर अब? अब तो वो किसी और से शादी करने जा रहा है।

लहर अपने कमरे में गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। पर उसकी आवाज़ नहीं। बस ख़ामोशी में रोई।

उसे लगा — सब कुछ ख़त्म।

तभी — खिड़की पर एक हलकी-सी आवाज़ आई।

लहर ने ऊपर देखा।

उसकी छह बहनें — पानी से बाहर सिर निकाले — खिड़की पर थीं।

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