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बड़े घर की बेटी

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Munshi Premchand
21 Mar 2026

बेनी माधव सिंह मौज़ा गौरीपुर के ज़मींदार नंबरदार थे। उनके बुज़ुर्ग किसी ज़माने में बड़े साहिब-ए-सर्वत थे। पुख़्ता तालाब और मंदिर उन्हीं की यादगार थी। कहते हैं इस दरवाज़े पर पहले हाथी झूमता था। उस हाथी का मौजूदा नेम-उल-बदल एक बूढ़ी भैंस थी जिसके बदन पर गोश्त तो न था मगर शायद दूध बहुत देती थी। क्यूँकि हर वक़्त एक न एक आदमी हाँडी लिए उसके सर पर सवार रहता था। बेनी माधव सिंह ने निस्फ़ से ज़ाइद जायदाद वकीलों की नज़्र की और अब उनकी सालाना आमदनी एक हज़ार से ज़ाइद न थी।


ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम सिरी कंठ सिंह था। उसने एक मुद्दत-ए-दराज़ की जानकाही के बाद बी.ए. की डिग्री हासिल की थी। और अब एक दफ़्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल बिहारी सिंह दोहरे बदन का सजीला जवान था। भरा हुआ चेहरा चौड़ा सीना भैंस का दो सेर ताज़ा दूध का नाश्ता कर जाता था। सिरी कंठ उससे बिल्कुल मुतज़ाद थे। इन ज़ाहिरी ख़ूबियों को उन्होंने दो अंग्रेज़ी हुरूफ़ बी.ए. पर क़ुर्बान कर दिया था। इन्हीं दो हर्फ़ों ने उनके सीने की कुशादगी, क़द की बुलंदी, चेहरे की चमक, सब हज़्म कर ली थी। ये हज़रत अब अपना वक़्त-ए-फ़ुर्सत तिब के मुताले में सर्फ़ करते थे।आयुर्वेदिक दवाओं पर ज़्यादा अक़ीदा था। शाम सवेरे उनके कमरे से अक्सर खरल की ख़ुश-गवार पैहम सदाएँ सुनाई दिया करती थीं। लाहौर और कलकत्ता के वैदों से बहुत ख़त-ओ-किताबत रहती थी।

सिरी कंठ इस अंग्रेज़ी डिग्री के बावजूद अंग्रेज़ी मुआशरत के बहुत मद्दाह न थे। बल्कि इसके बर-अक्स वो अक्सर बड़ी शद्द-ओ-मद से उसकी मज़म्मत किया करते थे। इसी वज्ह से गाँव में उनकी बड़ी इज़्ज़त थी। दसहरे के दिनों में वो बड़े जोश से राम लीला में शरीक होते और ख़ुद हर-रोज़ कोई न कोई रूप भरते, उन्हीं की ज़ात से गौरीपुर में राम लीला का वजूद हुआ। पुराने रस्म-ओ-रिवाज का उनसे ज़्यादा पुर-जोश वकील मुश्किल से होगा। ख़ुसूसन मुशतर्का ख़ानदान के वो ज़बरदस्त हामी थे। आज कल बहुओं को अपने कुन्बे के साथ मिल-जुल कर रहने में जो वहशत होती है, उसे वो मुल्क और क़ौम के लिए फ़ाल-ए-बद ख़याल करते थे। यही वज्ह थी कि गाँव की बहुएँ उन्हें मक़बूलियत की निगाह से न देखती थीं, बाज़-बाज़ शरीफ़-ज़ादियाँ तो उन्हें अपना दुश्मन समझतीं। ख़ुद उन ही की बीवी उनसे इस मसअले पर अक्सर ज़ोर-शोर से बहस करती थीं। मगर इस वज्ह से नहीं कि उसे अपने सास-ससुरे, देवर-जेठ से नफ़रत थी। बल्कि उसका ख़याल था कि अगर ग़म खाने और तरह देने पर भी कुन्बे के साथ निबाह न हो सके तो आए दिन की तकरार से ज़िंदगी तल्ख़ करने के बजाए यही बेहतर है कि अपनी खिचड़ी अलग पकाई जाए।


आनंदी एक बड़े ऊँचे ख़ानदान की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी सी रियासत के तअल्लुक़ेदार थे। आलीशान महल। एक हाथी, तीन घोड़े, पाँच वर्दी-पोश सिपाही। फ़िटन, बहलियाँ, शिकारी कुत्ते, बाज़, बहरी, शिकरे, जर्रे, फ़र्श-फ़रोश शीशा-आलात, ऑनरेरी मजिस्ट्रेटी और क़र्ज़ जो एक मुअ’ज़्ज़ज़ तअल्लुक़ेदार के लवाज़िम हैं। वो उनसे बहरा-वर थे। भूप सिंह नाम था। फ़राख़-दिल, हौसला-मंद आदमी थे, मगर क़िस्मत की ख़ूबी, लड़का एक भी न था। सात लड़कियाँ ही लड़कियाँ हुईं और सातों ज़िंदा रहीं। अपने बराबर या ज़्यादा ऊँचे ख़ानदान में उनकी शादी करना अपनी रियासत को मिट्टी में मिलाना था। पहले जोश में उन्होंने तीन शादियाँ दिल खोल कर कीं। मगर जब पंद्रह-बीस हज़ार के मक़रूज़ हो गए तो आँखें खुलीं। हाथ पैर पीट लिए। आनंदी चौथी लड़की थी। मगर अपनी सब बहनों से ज़्यादा हसीन और नेक, इसी वज्ह से ठाकुर भूप सिंह उसे बहुत प्यार करते थे। हसीन बच्चे को शायद उसके माँ-बाप भी ज़्यादा प्यार करते हैं। ठाकुर साहब बड़े पस-ओ-पेश में थे कि इसकी शादी कहाँ करें। न तो यही चाहते थे कि क़र्ज़ का बोझ बढ़े और न यही मंज़ूर था कि उसे अपने आपको बद-क़िस्मत समझने का मौक़ा मिले। एक रोज़ सिरी कंठ उनके पास किसी चंदे के लिए रुपया माँगने आए। शायद नागरी प्रचार का चंदा था। भूप सिंह उनके तौर-ओ-तरीक़ पर रीझ गए, खींच-तान कर ज़ाइचे मिलाए गए। और शादी धूम-धाम से हो गई।

आनंदी देवी अपने नए घर में आईं तो यहाँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिन दिलचस्पियों और तफ़रीहों की वो बचपन से आदी थी, उनका यहाँ वजूद भी न था। हाथी घोड़ों का तो ज़िक्र क्या, कोई सजी हुई ख़ूबसूरत बहली भी न थी। रेशमी स्लीपर साथ लाई थीं, मगर यहाँ बाग़ कहाँ मकान में खिड़कियाँ तक न थीं। न ज़मीन पर फ़र्श न दीवारों पर तस्वीरें, ये एक सीधा-सादा दहक़ानी मकान था। आनंदी ने थोड़े ही दिनों में इन तब्दीलियों से अपने तईं इस क़दर मानूस बना लिया, गोया उसने तकल्लुफ़ात कभी देखे ही नहीं।

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