एक रोज़ दोपहर के वक़्त लाल बिहारी सिंह दो मुरग़ाबियाँ लिए हुए आए और भावज से कहा। जल्दी से गोश्त पका दो। मुझे भूक लगा है। आनंदी खाना पका कर उनकी मुंतज़िर बैठी थी। गोश्त पकाने बैठी मगर हाँडी में देखा तो घी पाव भर से ज़्यादा न था। बड़े घर की बेटी। किफ़ायत-शिआरी का सबक़ अभी अच्छी तरह न पढ़ी थी। उसने सब घी गोश्त में डाल दिया। लाल बिहारी सिंह खाने बैठे तो दाल में घी न था। “दाल में घी क्यूँ नहीं छोड़ा?”
आनंदी ने कहा, “घी सब गोश्त में पड़ गया।”
लाल बिहारी, “अभी परसों घी आया है। इस क़दर जल्द उठ गया।”
आनंदी, “आज तो कुल पाव भर था। वो मैंने गोश्त में डाल दिया।”
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है। उसी तरह भूक से बावला इंसान ज़रा-ज़रा बात पर तुनक जाता है। लाल बिहारी सिंह को भावज की ये ज़बान-दराज़ी बहुत बुरी मालूम हुई। तीखा हो कर बोला। “मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो।”
औरत गालियाँ सहती है। मार सहती है, मगर मैके की निंदा उससे नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली, “हाथी मरा भी तो नौ लाख का। वहाँ इतना घी रोज़ नाई-कहार खा जाते हैं।”
लाल बिहारी जल गया। थाली उठा कर पटक दी। और बोला, “जी चाहता है कि तालू से ज़बान खींच ले।”
आनंदी को भी ग़ुस्सा आ गया। चेहरा सुर्ख़ हो गया। बोली, “वो होते तो आज इसका मज़ा चखा देते।”
अब नौजवान उजड्ड ठाकुर से ज़ब्त न हो सका। उसकी बीवी एक मामूली ज़मींदार की बेटी थी। जब जी चाहता था उस पर हाथ साफ़ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठा कर आनंदी की तरफ़ ज़ोर से फेंकी और बोला, “जिसके गुमान पर बोली हो। उसे भी देखूँगा और तुम्हें भी।”
आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सर बच गया। मगर उँगली में सख़्त चोट आई। ग़ुस्से के मारे हवा के हिलते हुए पत्ते की तरह काँपती हुई अपने कमरे में आकर खड़ी हो गई। औरत का ज़ोर और हौसला, ग़ुरूर-ओ-इज़्ज़त शौहर की ज़ात से है, उसे शौहर ही की ताक़त और हिम्मत का घमंड होता है। आनंदी ख़ून का घूँट पी कर रह गई।
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