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बड़े घर की बेटी

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Munshi Premchand
21 Mar 2026

सिरी कंठ सिंह हर शंबा को अपने मकान पर आया करते थे। जुमेरात का ये वाक़िआ' था। दो दिन तक आनंदी ने न कुछ खाया न पिया। उनकी राह देखती रही। आख़िर शंबा को हस्ब-ए-मामूल शाम के वक़्त वो आए और बाहर बैठ कर कुछ मुल्की-ओ-माली ख़बरें, कुछ नए मुक़द्दमात की तज्वीज़ें और फ़ैसले बयान करने लगे। और सिलसिला-ए-तक़रीर दस बजे रात तक जारी रहा। दो-तीन घंटे आनंदी ने बे-इंतिहा इज़्तिराब के आ'लम में काटे। बारे खाने का वक़्त आया। पंचायत उठी। जब तख़्लिया हुआ तो लाल बिहारी ने कहा, “भैया आप ज़रा घर में समझा दीजिएगा कि ज़बान सँभाल कर बात-चीत किया करें। वर्ना नाहक़ एक दिन ख़ून हो जाएगा।”
बेनी माधव सिंह ने शहादत दी, “बहू-बेटियों की ये आदत अच्छी नहीं कि मर्दों के मुँह लगें।”

लाल बिहारी, “वो बड़े घर की बेटी हैं तो हम लोग भी कोई कुर्मी-कहार नहीं हैं।”
सिरी कंठ, “आख़िर बात क्या हुई?”

लाल बिहारी, कुछ भी नहीं, “यूँ ही आप ही आप उलझ पड़ीं, मैके के सामने हम लोगों को तो कुछ समझती ही नहीं।”
सिरी कंठ खा पी कर आनंदी के पास गए। वो भी भरी बैठी थी। और ये हज़रत भी कुछ तीखे थे।

आनंदी ने पूछा, “मिज़ाज तो अच्छा है?”
सिरीकंठ बोले, ”बहुत अच्छा है। ये आजकल तुमने घर में क्या तूफ़ान मचा रक्खा है?”

आनंदी के तेवरों पर बल पड़ गए। और झुँझलाहट के मारे बदन में पसीना आ गया। बोली, “जिसने तुमसे ये आग लगाई है, उसे पाऊँ तो मुँह झुलस दूँ।”
सिरी कंठ, “इस क़दर तेज़ क्यूँ होती हो, कुछ बात तो कहो।”

आनंदी, “क्या कहूँ। क़िस्मत की ख़ूबी है। वर्ना एक गँवार लौंडा जिसे चपरासी-गिरी करने की भी तमीज़ नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यूँ न अकड़ता फिरता। बोटियाँ नुचवा लेती। इस पर तुम पूछते हो कि घर में तूफ़ान क्यूँ मचा रक्खा है।”
सिरी कंठ, “आख़िर कुछ कैफ़ियत तो बयान करो। मुझे तो कुछ मालूम ही नहीं।”

आनंदी, “परसों तुम्हारे लाडले भाई ने मुझे गोश्त पकाने को कहा। घी पाव भर से कुछ ज़्यादा था। मैंने सब गोश्त में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा दाल में घी क्यूँ नहीं। बस उसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा। मुझसे बर्दाश्त न हो सका। बोली कि वहाँ इतना घी नाई-कहार खा जाते हैं और किसी को ख़बर भी नहीं होती। बस इतनी सी बात पर उस ज़ालिम ने मुझे खड़ाऊँ फेंक मारी। अगर हाथ से न रोकती तो सर फट जाता। उससे पूछो कि मैंने जो कुछ कहा है सच है या झूट?”
सिरी कंठ की आँखें लाल हो गईं। बोले, “यहाँ तक नौबत पहुँच गई। ये लौंडा तो बड़ा शरीर निकला।”

आनंदी रोने लगी। जैसे औरतों का क़ायदा है। क्यूँकि आँसू उनकी पल्कों पर रहता है। औरत के आँसू मर्द के ग़ुस्से पर रोग़न का काम करते हैं। सिरी कंठ के मिज़ाज में तहम्मुल बहुत था। उन्हें शायद कभी ग़ुस्सा आया ही न था। मगर आनंदी के आँसूओं ने आज ज़हरीली शराब का काम किया। रात-भर करवटें बदलते रहे। सवेरा होते ही अपने बाप के पास जा कर बोले, “दादा अब मेरा निबाह इस घर में न होगा।”
ये और इस मा'नी के दूसरे जुमले ज़बान से निकालने के लिए सिरी कंठ सिंह ने अपने कई हम-जोलियों को बारहा आड़े हाथों लिया था। जब उनका कोई दोस्त उनसे ऐसी बातें कहता तो वो मज़हका उड़ाते और कहते, तुम बीवियों के ग़ुलाम हो। उन्हें क़ाबू में रखने के बजाए ख़ुद उनके क़ाबू में हो जाते हो। मगर हिन्दू मुश्तरका ख़ानदान का यह पुर-जोश वकील आज अपने बाप से कह रहा था, “दादा! अब मेरा निबाह इस घर में न होगा।” नासेह की ज़बान उसी वक़्त तक चलती है। जब तक वो इश्क़ के करिश्मों से बे-ख़बर रहता है। आज़माइश के बीच में आ कर ज़ब्त और इल्म रुख़्सत हो जाते हैं।

बेनी माधव सिंह घबरा कर उठ बैठे और बोले, “क्यूँ।”
सिरी कंठ, “इसलिए कि मुझे भी अपनी इज़्ज़त का कुछ थोड़ा बहुत ख़याल है। आपके घर में अब हट-धर्मी का बर्ताव होता है। जिनको बड़ों का अदब होना चाहिए, वो उनके सर चढ़ते हैं। मैं तो दूसरे का ग़ुलाम ठहरा, घर पर रहता नहीं और यहाँ मेरे पीछे औरतों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछाड़ होती है। कड़ी बात तक मुज़ाइक़ा नहीं, कोई एक की दो कह ले। यहाँ तक मैं ज़ब्त कर सकता हूँ। मगर ये नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात और घूँसे पड़े और मैं दम न मारूँ।”

बेनी माधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। सिरी कंठ हमेशा उनका अदब करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर ला-जवाब हो गया। सिर्फ़ इतना बोला, “बेटा तुम अक़्ल-मंद हो कर ऐसी बातें करते हो। औरतें इसी तरह घर तबाह कर देती हैं। उनका मिज़ाज बढ़ाना अच्छी बात नहीं।”
सिरी कंठ, “इतना मैं जानता हूँ। आपकी दुआ से ऐसा अहमक़ नहीं हूँ। आप ख़ुद जानते हैं कि इस गाँव के कई ख़ानदानों को मैंने अलहदगी की आफ़तों से बचा दिया है। मगर जिस औरत की इज़्ज़त-ओ-आबरू का मैं ईश्वर के दरबार में ज़िम्मेदार हूँ, उस औरत के साथ ऐसा ज़ालिमाना बरताव मैं नहीं सह सकता। आप यक़ीन मानिए मैं अपने ऊपर बहुत जब्र कर रहा हूँ कि लाल बिहारी की गोशमाली नहीं करता।”

अब बेनी माधव भी गरमाए। ये कुफ़्र ज़्यादा न सुन सके बोले, “लाल बिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल-चूक हो। तुम उसके कान पकड़ो। मगर...”
सिरी कंठ, “लाल बिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता।”

बेनी माधव, “औरत के पीछे।”
सिरी कंठ, “जी नहीं! उसकी गुस्ताख़ी और बे-रहमी के बाइस।”

दोनों आदमी कुछ देर तक ख़ामोश रहे। ठाकुर साहब लड़के का ग़ुस्सा धीमा करना चाहते थे। मगर ये तस्लीम करने को तैयार न थे कि लाल बिहारी से कोई गुस्ताख़ी या बे-रहमी वक़ूअ में आई। इसी अस्ना में कई और आदमी हुक़्क़ा तंबाकू उड़ाने के लिए आ बैठे। कई औरतों ने जब सुना कि सिरी कंठ बीवी के पीछे बाप से आमादा-ए-जंग हैं तो उनका दिल बहुत ख़ुश हुआ और तरफ़ैन की शिकवा-आमेज़ बातें सुनने के लिए उनकी रूहें तड़पने लगीं।

कुछ ऐसे हासिद भी गाँव में थे जो इस ख़ानदान की सलामत-रवी पर दिल ही दिल में जलते थे। सिरी कंठ बाप से दबता था। इसलिए वो ख़तावार है। उसने इतना इल्म हासिल किया। ये भी उसकी ख़ता है। बेनी माधव सिंह बड़े बेटे को बहुत प्यार करते हैं। ये बुरी बात है। वो बिला उसकी सलाह के कोई काम नहीं करते। ये उनकी हिमाक़त है। इन ख़यालात के आदमियों की आज उम्मीदें भर आईं। हुक़्क़ा पीने के बहाने से, कोई लगान की रसीद दिखाने के हीले से आ-आ कर बैठ गए। बेनी माधव सिंह पुराना आदमी था। समझ गया कि आज ये हज़रात फूले नहीं समाते। उसके दिल ने ये फ़ैसला किया कि उन्हें ख़ुश न होने दूँगा। ख़्वाह अपने ऊपर कितना ही जब्र हो। यका-य़क लहजा-ए-तक़रीर नर्म कर के बोले, “बेटा! मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तुम्हारा जो ची चाहे करो। अब तो लड़के से ख़ता हो गई।”

इलहाबाद का नौजवान, झल्लाया हुआ ग्रेजुएट… इस घात को न समझा। अपने डिबेटिंग क्लब में उसने अपनी बात पर अड़ने की आदत सीखी थी। मगर अमली मुबाहिसों के दाँव-पेच से वाक़िफ़ न था। इस मैदान में वो बिल्कुल अनाड़ी निकला। बाप ने जिस मतलब से पहलू बदला था, वहाँ तक उसकी निगाह न पहुँची। बोला, “मैं लाल बिहारी सिंह के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।”
बाप, “बेटा! तुम अक़्लमंद हो और अक़्लमंद आदमी गँवारों की बात पर ध्यान नहीं देता। वो बे-समझ लड़का है, उससे जो कुछ ख़ता हुई है उसे तुम बड़े हो कर मुआफ़ कर दो।”

बेटा, “उसकी ये हरकत मैं हरगिज़ मुआफ़ नहीं कर सकता। या तो वही घर में रहेगा या मैं ही रहूँगा। आपको अगर उससे ज़्यादा मोहब्बत है तो मुझे रुख़्सत कीजिए। मैं अपना बोझ आप उठा लूँगा। अगर मुझे रखना चाहते हो तो उससे कहिए, जहाँ चाहे चला जाए। बस ये मेरा आख़िरी फ़ैसला है।”
लाल बिहारी सिंह दरवाज़े की चौखट पर चुप-चाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वो उनका बहुत अदब करता था। उसे कभी इतनी जुर्रत न हुई थी कि सिरी कंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाए या हुक़्क़ा पी ले या पान खा ले। अपने बाप का भी इतना पास-ओ-लिहाज़ न करता था। सिरी कंठ को भी उससे दिली-मोहब्बत थी। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब इलहाबाद से आते तो ज़रूर उसके लिए कोई न कोई तोहफ़ा लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा कर दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से डेवढ़े जवान को नाग-पंचमी के दंगल में पछाड़ दिया तो उन्होंने ख़ुश हो कर अखाड़े ही में जा कर उसे गले से लगा लिया था। और पाँच रुपये के पैसे लुटाए थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी जिगर-दोज़ बातें सुनकर लाल बिहारी सिंह को बड़ा मलाल हुआ। उसे ज़रा भी ग़ुस्सा न आया। वो फूटकर रोने लगा। इसमें कोई शक नहीं कि वो अपने फे़ल पर आप नादिम था।

भाई के आने से एक दिन पहले ही से उसका दिल हर दम धड़कता था कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सामने कैसे जाऊँगा। मैं उनसे कैसे बोलूँगा। मेरी आँखें उनके सामने कैसे उट्ठेंगी। उसने समझा था कि भैया मुझे बुला कर समझा देंगे। इस उम्मीद के ख़िलाफ़ आज वो उन्हें अपनी सूरत से बे-ज़ार पाता था। वो जाहिल था मगर उसका दिल कहता था कि भैया मेरे साथ ज़्यादती कर रहे हैं। अगर सिरी कंठ उसे अकेला बुला कर दो-चार मिनट सख़्त बातें कहते बल्कि दो-चार तमाँचे भी लगा देते तो शायद उसे इतना मलाल न होता। मगर भाई का ये कहना कि अब मैं उसकी सूरत से नफ़रत रखता हूँ। लाल बिहारी से न सहा गया।

वो रोता हुआ घर में आया और कोठरी में जा कर कपड़े पहने। फिर आँखें पोंछीं, जिससे कोई ये न समझे कि रोता था। तब आनंदी देवी के दरवाज़े पर आ कर बोला, “भाबी! भैया ने ये फ़ैसला किया है कि वो मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। वह अब मेरा मुँह देखना नहीं चाहते। इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा। मुझसे जो ख़ता हुई है उसे मुआफ़ करना।”

ये कहते-कहते लाल बिहारी की आवाज़ भारी हो गई।

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