१८ अगस्त १९४५ की वह ताइपेई की रहस्यमय रात — जब एक भारतीय नायक अंतिम बार दुनिया की नज़र से ओझल हुए — और अब तक भारत के हर हृदय में यह प्रश्न बना है कि वे सच में हमें छोड़कर गए, या फिर कहीं अपनी अंतिम चुनौती की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस — एक ऐसा नाम, जिसे लेते ही भारत के हर युवा के मन में एक विशेष गौरव जागता है. उनके जैसा साहस, उनके जैसा संकल्प, उनके जैसा त्याग — आधुनिक भारत के इतिहास में बहुत कम मिलता है. वे एक ऐसे योद्धा थे जो ब्रिटिश साम्राज्य से सीधी टक्कर लेने को तैयार थे — कूटनीति से नहीं, अहिंसा से नहीं, सशस्त्र संघर्ष से. वे एक ऐसे नायक थे जिन्होंने दुनिया भर के देशों — जर्मनी, जापान, इटली, बर्मा, थाईलैंड — से सहायता लेकर एक "आज़ाद हिंद" की कल्पना को साकार करने का प्रयास किया. वे एक ऐसे "नेताजी" थे — जिनके नाम पर आज भी हर भारतीय कहता है — "जय हिंद!"
उनका जन्म २३ जनवरी १८९७ को कटक — आज के ओडिशा का एक छोटा-सा नगर — में हुआ. उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रसिद्ध वकील थे — कटक के सबसे सम्मानित नागरिकों में से एक. उनकी माता प्रभावती देवी एक धार्मिक स्त्री थीं, जिन्होंने अपने पुत्र में बचपन से ही धर्म और कर्तव्य के संस्कार डाले. परिवार में चौदह बच्चे थे — सुभाष नौवें. यह एक विशाल बंगाली परिवार था, जिसमें बौद्धिक चर्चाएँ, धार्मिक त्योहार, और राष्ट्रीय जागरण-कार्य निरंतर चलते थे.
बचपन से ही सुभाष असाधारण थे. उनकी बुद्धि तीव्र थी. उनकी पाठशाला में वे प्रथम स्थान पर आते. परंतु उनकी विशेषता केवल अकादमिक नहीं थी — उनके भीतर एक "विद्रोही-भावना" बचपन से ही पनप रही थी. यह विद्रोह किसी स्वार्थ का नहीं था — यह न्याय का था. जब उन्होंने देखा कि एक अंग्रेज़ शिक्षक अपने भारतीय छात्रों के साथ अनुचित व्यवहार कर रहा है, तो उन्होंने इसके विरुद्ध आवाज़ उठाई — १९१६ में, प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता में. परिणाम — उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया. यह उनकी पहली राजनीतिक कार्यवाही थी — और इसका मूल्य भारी था. परंतु उन्होंने पीछे नहीं हटा.
स्कॉटिश चर्च कॉलेज से स्नातक के बाद वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय गए — १९१९ में. वहाँ उन्होंने ICS (Indian Civil Service) परीक्षा की तैयारी की. इस परीक्षा में पास होना उन दिनों के लिए "सर्वोच्च-सम्मान" था — यह ब्रिटिश राज की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी थी. १९२० में सुभाष ने यह परीक्षा दी, और इंग्लैंड में चौथे स्थान पर उत्तीर्ण हुए. एक भारतीय युवक — विदेशी धरती पर — चौथे स्थान पर! यह एक अद्भुत उपलब्धि थी. उनके पिता प्रसन्न थे. परिवार गौरवान्वित था. लंदन में सम्मान-समारोह आयोजित हुए.
परंतु सुभाष चंद्र बोस की आत्मा कुछ और कह रही थी. वे ICS की नौकरी नहीं चाहते थे. वे ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा नहीं करना चाहते थे. वे चाहते थे — भारत की सेवा. और इसी कारण १९२१ में, मात्र २४ वर्ष की आयु में, उन्होंने ICS से इस्तीफा दे दिया. यह एक ऐतिहासिक निर्णय था. कितने भारतीय एक "सुरक्षित नौकरी" के लिए जीवन-भर समर्पित हो जाते हैं — परंतु सुभाष ने उसे एक ही झटके में त्याग दिया. उनके पिता को लिखा एक पत्र इस त्याग का साक्षी है — "पिताजी, मैं अपनी मातृभूमि से अधिक किसी को महत्त्व नहीं दे सकता."
भारत वापसी पर वे चित्तरंजन दास — जिन्हें "देशबंधु" कहा जाता था — के शिष्य बने. देशबंधु एक प्रसिद्ध वकील और कांग्रेस के मुख्य नेता थे. उन्होंने सुभाष के भीतर के "नेतृत्व-गुण" को पहचाना. उन्होंने सुभाष को कांग्रेस के विभिन्न कार्यों में भेजा — विद्यार्थी संगठन, मज़दूर आंदोलन, धार्मिक-राष्ट्रीय जागरण. कुछ ही वर्षों में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के एक प्रमुख नेता बन चुके थे.
उनके जीवन में अनेक जेल-यात्राएँ आईं — कुल मिलाकर ग्यारह बार वे जेल गए. एक यात्रा विशेष कठोर थी — १९२४ से १९२७ तक की मांडले जेल (बर्मा). यहाँ उन्होंने तीन वर्ष कठिन परिस्थितियों में बिताए. परंतु जेल में भी वे टूटे नहीं — उन्होंने पढ़ाई की, लिखा, और अपने राजनीतिक विचारों को परिपक्व किया.
१९३८ में हरीपुरा कांग्रेस अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. यह उनके राजनीतिक करियर का सबसे ऊँचा शिखर था. १९३९ के त्रिपुरी अधिवेशन में वे फिर से अध्यक्ष चुने गए — इस बार गांधीजी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को हराकर. परंतु यहीं से उनका मार्ग गांधीजी से भिन्न होने लगा. वे चाहते थे — एक तीव्र, सशस्त्र संघर्ष. गांधीजी चाहते थे — अहिंसा का मार्ग. यह मतभेद इतना गहरा हुआ कि सुभाष ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, और अपनी एक नई पार्टी — फॉरवर्ड ब्लॉक — की स्थापना की.
१९४० में वे कलकत्ता में नज़रबंद थे. परंतु उन्होंने अपनी सबसे अद्भुत यात्रा की तैयारी कर रखी थी. १६-१७ जनवरी १९४१ की रात — मौलवी ज़ियाउद्दीन के वेश में — उन्होंने अपने घर से पलायन किया. यह "महान पलायन" भारतीय इतिहास का सबसे रोमांचक प्रसंग है. कलकत्ता से गोमो (झारखंड), फिर पेशावर, फिर काबुल, फिर रूस होते हुए वे बर्लिन पहुँचे — अप्रैल १९४१ में.
बर्लिन में उन्होंने हिटलर से भेंट की — २७ मई १९४२ को. एक "Free India Centre" की स्थापना की. भारतीय युद्ध-बंदियों से एक "Indian Legion" तैयार की — लगभग ३,००० सैनिकों की. परंतु जर्मनी से जापान तक का मार्ग और भी कठिन था. जर्मन पनडुब्बी से, फिर जापानी पनडुब्बी से — वे अंत में मई १९४३ में टोक्यो पहुँचे.
४ जुलाई १९४३ को सिंगापुर में उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA / आज़ाद हिंद फौज) का नेतृत्व संभाला. २१ अक्टूबर १९४३ को उन्होंने "आज़ाद हिंद" की अस्थायी सरकार की स्थापना की. ४३,००० सैनिकों की INA. एक रानी झांसी रेजीमेंट — कैप्टन लक्ष्मी सहगल के नेतृत्व में, केवल महिलाओं की. ४ जुलाई १९४४ को बर्मा से उनका अमर गर्जन — "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा."
परंतु इम्फाल-कोहिमा युद्ध में INA को हार पाई. जापान भी विश्वयुद्ध में हार रहा था. १८ अगस्त १९४५ — एक रहस्यमय विमान-दुर्घटना ताइपेई में. नेताजी कहाँ गए? क्या वे सच में मर गए, या किसी अन्य रास्ते पर निकल गए? यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है — मुखर्जी आयोग, खोसला आयोग, शाहनवाज़ कमेटी — सब ने जाँच की, परंतु कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला.
आगामी तीस अध्यायों में हम इसी अद्भुत यात्रा को विस्तार से देखेंगे. कटक का बाल्यकाल, कैंब्रिज का अध्ययन, ICS का त्याग, मांडले की कैद, हरीपुरा-त्रिपुरी की कांग्रेस, महान पलायन, बर्लिन-टोक्यो की यात्रा, और अंत में ताइपेई का रहस्य. यह कथा है एक ऐसे नायक की — जिन्होंने एक "साधारण भारतीय" की पहचान को "विश्व-नेता" तक पहुँचाया. जय हिंद!
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