१८९७ की एक धुंध-भरी जनवरी की सुबह — कटक के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में एक नवजात की पहली रोने की आवाज़ — और किसी को नहीं पता था कि वही नवजात आगे चलकर "नेताजी" बनकर सम्पूर्ण भारत के लिए स्वातंत्र्य-अग्नि का स्वरूप बनेगा.
२३ जनवरी १८९७. ओडिशा के कटक नगर में एक सर्द सुबह. आसमान धुंध से ढका हुआ था. महानदी के तट पर पंडित अपने यजमानों के साथ नित्य-स्नान कर रहे थे. कटक का "ओड़िया बाज़ार" मोहल्ला धीरे-धीरे जागने लगा था. इसी मोहल्ले में एक बड़ा-सा घर था — जानकीनाथ बोस का घर. यह घर कटक के सबसे प्रतिष्ठित घरों में से एक था — पीछे की ओर एक विशाल आँगन, सामने एक छोटा बगीचा, और भीतर एक बड़ा परिवार जो वहाँ निरंतर हलचल में रहता था.
जानकीनाथ बोस — कटक के एक प्रसिद्ध वकील. वे मूल रूप से बंगाली थे — पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले के एक प्राचीन कायस्थ परिवार से. उनके पिता हरनाथ बोस एक ब्रिटिश राज में अधिकारी रह चुके थे. परंतु जानकीनाथ ने वकालत का पेशा चुना. वे कटक में आ बसे क्योंकि वहाँ अदालत-कार्य अधिक था. वे केवल एक वकील ही नहीं थे — वे कटक के सामाजिक जीवन के एक प्रमुख स्तंभ थे. उन्होंने कई स्थानीय संस्थाओं की स्थापना में योगदान दिया. उन्हें "राय बहादुर" का सम्मान-उपनाम भी मिला था — हालाँकि बाद में सुभाष के राजनीतिक कार्यों के कारण उन्होंने यह सम्मान लौटा दिया.
उनकी पत्नी प्रभावती देवी — एक अत्यंत धार्मिक स्त्री. उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय धार्मिक अनुष्ठानों में व्यतीत किया. वे प्रतिदिन कई घंटे पूजा-पाठ में बिताती थीं. वे अपने सब बच्चों को रामायण, महाभारत, और भगवद्गीता की कथाएँ सुनातीं. विशेष रूप से वे स्वामी विवेकानंद की कथाएँ सुनातीं — विवेकानंद के विचार उन दिनों बंगाली घरों में बहुत लोकप्रिय थे. इस धार्मिक वातावरण में सुभाष का बाल्यकाल बीता.
परिवार बहुत बड़ा था. कुल चौदह बच्चे — आठ पुत्र और छह पुत्रियाँ. सुभाष चंद्र बोस नौवें पुत्र थे — कुल चौदह बच्चों में नौवें. उनके बड़े भाइयों में सबसे प्रमुख थे "सरत चंद्र बोस" — जो आगे चलकर एक प्रसिद्ध वकील और कांग्रेस नेता बने. सुभाष के जीवन में सरत भैया का स्थान सबसे विशेष था — वे न केवल बड़े भाई थे, वे एक "द्वितीय पिता" भी थे. आगामी अनेक वर्षों में सरत बोस ने अपने छोटे भाई के राजनीतिक कार्यों में निरंतर सहायता की. वे एक "छाँव" थे — जो जीवन-भर सुभाष की रक्षा करती रही.
सुभाष के जन्म की कथा एक अद्भुत संयोग है. कहा जाता है कि उनके जन्म के दिन कटक में एक भयंकर तूफान आया था. महानदी का जल बहुत बढ़ा था. कई गाँवों में बाढ़ का संकेत था. प्रभावती देवी की प्रसव-वेदना भी इसी तूफान के बीच आरम्भ हुई. यह एक कठिन प्रसव था. परंतु अंत में, एक स्वस्थ नवजात ने अपनी पहली रोने की आवाज़ दी. कुछ क्षण बाद बाहर का तूफान भी थम गया. एक स्थानीय वृद्धा ने जब यह सुना, तब कहा — "यह बच्चा साधारण नहीं है. इसके जन्म के साथ ही प्रकृति की आँधी थमी — यह एक बड़े योगदान-कर्ता का संकेत है." यह बात उस समय किसी ने गंभीरता से नहीं ली. परंतु आगे चलकर यह वृद्धा की बात सच साबित हुई.
नामकरण कुछ दिन बाद हुआ. परिवार के पुरोहित ने ज्योतिष-गणना के बाद नाम सुझाए. अंत में चुना गया — "सुभाष." इस नाम का अर्थ है "अच्छी तरह बोलने वाला." यह एक सुंदर नाम था — और भविष्य में सच साबित हुआ. नेताजी की वाणी में अद्भुत प्रभाव था — वे एक भीड़ को कुछ ही वाक्यों में अपने पक्ष में कर सकते थे.
सुभाष की पहली स्मृतियाँ कटक के उनके घर की हैं. एक बड़ा आँगन, जहाँ वे अपने भाई-बहनों के साथ खेलते. एक छोटा-सा कक्ष, जहाँ माँ प्रभावती देवी पूजा करती थीं. एक पुस्तकालय, जहाँ पिता जानकीनाथ बोस अपने ग्रंथ पढ़ते. इन तीनों स्थानों ने सुभाष के बाल्यकाल को रूप दिया. आँगन ने उनके भीतर "सामाजिक" बनाया. पूजा-कक्ष ने "धार्मिक" बनाया. पुस्तकालय ने "बौद्धिक" बनाया.
एक प्रसिद्ध बाल-कथा है — जब सुभाष लगभग पाँच वर्ष के थे, तब वे अपनी माँ के पास बैठे थे. माँ रामायण की कथा सुना रही थीं — हनुमान की लंका-यात्रा. सुभाष ने ध्यान से सुना. कथा के बाद उन्होंने माँ से पूछा, "अम्मा, क्या मैं भी हनुमान बन सकता हूँ? क्या मैं भी समुद्र पार कर सकता हूँ?" माँ ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "बेटा, यदि तेरी भक्ति शुद्ध हो, तो तू कुछ भी कर सकता है." छोटे सुभाष ने सिर हिलाया. यह वार्ता उन्हें जीवन-भर याद रही. आगे चलकर — जब उन्होंने कलकत्ता से बर्लिन तक की वह अद्भुत यात्रा की — तब उन्होंने स्वयं को मन-ही-मन याद कराया कि "हनुमान भी समुद्र पार कर गए थे — मैं भी कर सकता हूँ."
परिवार के बंगाली संस्कारों ने भी सुभाष को रूप दिया. बंगाली समाज उन दिनों भारत के सबसे प्रबुद्ध समाजों में से एक था. यहाँ साहित्य, संगीत, धर्म, और राजनीति — सब विकसित हो रहे थे. राजा राममोहन राय का "ब्रह्म समाज," ईश्वर चंद्र विद्यासागर का सामाजिक सुधार-कार्य, बंकिमचंद्र चटर्जी का "वंदे मातरम्," रवीन्द्रनाथ ठाकुर का साहित्य, स्वामी विवेकानंद का धर्म-प्रचार — ये सब बंगाली पुनर्जागरण के स्तंभ थे. जानकीनाथ बोस के घर में इन सब विषयों पर निरंतर चर्चाएँ होतीं. सुभाष — जो अभी छोटे थे — वे इन चर्चाओं में चुपचाप बैठकर सुनते. उनके बाल-मन में स्वातंत्र्य का बीज इन्हीं चर्चाओं से बो गया था.
एक और प्रभाव — स्वामी विवेकानंद का. विवेकानंद १९०२ में चल बसे — सुभाष तब केवल पाँच वर्ष के थे. परंतु उनके वाणी, उनके लेख, उनकी कार्य-दृष्टि — सब कुछ बंगाली घरों में जीवंत थी. प्रभावती देवी अपने पुत्रों को विवेकानंद के विचार सुनातीं. विशेष रूप से उनकी "उठो, जागो, और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो" वाली पंक्ति सुभाष के मन में बैठ गई थी. आगे चलकर — कैंब्रिज में पढ़ते समय, मांडले की जेल में, बर्लिन के निवास में, सिंगापुर के सिंहासन पर — हर कठिन क्षण में उन्होंने यह पंक्ति याद की.
तो यह था सुभाष चंद्र बोस का जन्म और प्रारम्भिक बाल्यकाल. एक प्रतिष्ठित परिवार, एक धार्मिक माँ, एक प्रबुद्ध पिता, एक विशाल भाई-बहनों का समूह, और बंगाली पुनर्जागरण की पृष्ठभूमि. इस मिट्टी में पनप रहा था वह बीज जो आगे चलकर "नेताजी" बनेगा. आगामी अध्याय में हम देखेंगे — कैसे यह बीज अपनी जड़ें फैलाने लगा, और कैसे कटक के एक स्कूल में सुभाष ने अपनी पहली राजनीतिक "विद्रोही-भावना" प्रकट की.
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