सात भले बौने, एक राजकुमारी, और एक छोटी-सी झोपड़ी — जिसमें पहली बार इतनी हँसी गूँजी।
शाम के समय सात छोटे-छोटे लोग एक के बाद एक झोपड़ी की तरफ़ लौट रहे थे। ये थे सात बौने। दिन भर वो पहाड़ की एक खान में काम करते — हीरे और रत्न खोदते।
हर एक का अपना नाम, अपना स्वभाव। पहला था जागू — हमेशा मुस्कुराता रहता। दूसरा था झाँकू — हर चीज़ पर शक करता। तीसरा था हँसू — हर बात पर ज़ोर से हँसता। चौथा था चुपू — कभी कुछ नहीं बोलता। पाँचवाँ था दिमागू — सबसे पुराना, सबसे समझदार। छठा था छींकू — हर वक़्त छींकता रहता। और सातवाँ था आलसू — सबसे छोटा, हर पल सोने को तैयार।
दिमागू सबसे आगे था। उसकी सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में लालटेन। वो दरवाज़े के पास आया। तभी रुक गया।
"रुक! कुछ अजीब है।"
बाक़ी छहों रुक गए।
"क्या हुआ दादा?" जागू ने पूछा।
"दरवाज़ा खुला है। और अंदर रोशनी है।"
झाँकू ने तुरंत कहा — "ज़रूर कोई चोर घुस आया!"
"पहले देखें। फिर तय करें।"
सातों बौने धीरे-धीरे अंदर गए। पाँव दबे, साँस रुकी।
उन्होंने देखा — मेज़ पर थालियों में थोड़ा-थोड़ा खाना कम हो गया था।
"किसी ने हमारा खाना खाया!" हँसू ने कहा। पर इतनी ज़ोर से नहीं।
फिर वो बिस्तरों की तरफ़ बढ़े।
और जो उन्होंने देखा — हैरान रह गए।
सातों छोटे बिस्तरों पर एक लंबी, सुंदर, सोई हुई लड़की लेटी हुई थी। उसकी त्वचा बर्फ़ जैसी, होंठ ख़ून जैसे, बाल रात जैसे। पाँव एक तरफ़ से बाहर निकले हुए, हाथ दूसरी तरफ़ से।
आलसू ने धीरे से कहा — "वाह! ये तो परी है।"
दिमागू ने सिर हिलाया।
"नहीं, परी नहीं। पर बहुत प्यारी इंसान है। आओ, इसे जगाते नहीं। सोने दो। हम कोने में सो जाएँगे।"
सुबह हुई। सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई। स्नो व्हाइट ने आँखें खोलीं।
उसके सामने सात छोटे-छोटे चेहरे खड़े थे। एक के ऊपर एक झाँक रहे थे।
"वो जागी! वो जागी!" हँसू ने ख़ुशी से कहा।
स्नो व्हाइट चौंक गई। पर डरी नहीं। वो उठ बैठी।
"नमस्ते। आप सब कौन हैं?"
दिमागू ने आगे बढ़कर हाथ जोड़े। "देवी, मैं दिमागू हूँ। ये मेरे छह भाई। हम सब इस झोपड़ी में रहते हैं। आप कौन हैं? आप यहाँ कैसे आईं?"
स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी कहानी सुनाई। माँ का देहांत, सौतेली रानी, आईने का जवाब, शिकारी का दया, जंगल में अकेली। सब कुछ।
हर एक बौना सुनता रहा। आँखों में आँसू।
आख़िर में दिमागू ने कहा —
"देवी, आप कोई परी हैं या इंसान, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता। आप यहाँ रहिए। हम सब आपकी रक्षा करेंगे। हमारे लिए ये एक भाग्य है — कि एक राजकुमारी हमारी छोटी-सी झोपड़ी में आईं।"
उस दिन से स्नो व्हाइट उन सात बौनों के साथ रहने लगी। बौने हर सुबह पहाड़ की खान जाते। शाम को लौटते।
स्नो व्हाइट दिन भर झोपड़ी में काम करती। बर्तन धोती, खाना बनाती, झोपड़ी साफ़ करती, फूलों को पानी देती। सात बौनों के लिए छोटे-छोटे कपड़े सिलती।
शाम को जब वो लौटते, स्नो व्हाइट हर एक के लिए गरमा-गरम खाना तैयार रखती।
"देवी, इतनी मेहनत मत करिए।"
"भाइयों, ये मेरी ख़ुशी है। आप मुझे आसरा दिए। मैं आपके लिए कुछ करना चाहती हूँ।"
हर रात खाने के बाद हँसू कोई मज़ेदार बात कहता। चुपू मुस्कुराकर सिर हिलाता। आलसू पहले-पहले सो जाता। दिमागू अपनी पुरानी कहानियाँ सुनाता।
स्नो व्हाइट हँसती। उसकी आँखें चमकतीं।
एक दिन आलसू ने उसकी तरफ़ देखा।
"देवी, क्या आप अब ख़ुश हैं?"
स्नो व्हाइट ने सोचा। फिर मुस्कुराई।
"हाँ, पहले से ज़्यादा। पर अभी भी एक डर है।"
"कौन-सा?"
"मेरी सौतेली माँ। उन्हें अगर पता चल गया कि मैं ज़िंदा हूँ — तो वो ज़रूर मुझे ढूँढ निकालेंगी।"
दिमागू ने सिर हिलाया।
"देवी, हम सब दिन में बाहर जाते हैं। आप अकेली रहती हैं। एक बात याद रखिए — हमारी झोपड़ी का दरवाज़ा कभी मत खोलिए। चाहे कोई कुछ भी कहे, चाहे कोई कुछ भी ले आए। बाहर जो आए — उसे बाहर ही रखिए।"
"ठीक है, दादा।"
उधर राजमहल में रानी कैरीना ने फिर से आईने से पूछा —
"आईना, आईना, मेरी मुठ्ठी में आईना — अब इस सारी ज़मीन पर सबसे सुंदर कौन है?"
आईने ने वही जवाब दिया —
"रानीजी, अब भी स्नो व्हाइट सबसे सुंदर है। पहाड़ की दूसरी तरफ़, सात बौनों के साथ। वो वहाँ ख़ुशी से रहती है।"
रानी का गुस्सा आसमान को छूने लगा।
"ख़ुशी से? वो ख़ुशी से रह रही है? और मैं? मैं यहाँ जल रही हूँ?"
उन्होंने अपना नक़ाब निकाला। एक काला चोगा पहना। चेहरे पर ख़ुद ही जादू से कुछ झुर्रियाँ डालीं। वो एक बूढ़ी सब्ज़ी बेचने वाली बन गईं।
"इस बार मैं ख़ुद जाऊँगी। और इस बार वो बच नहीं पाएगी।"
रानी ने अपनी ज़हर की अलमारी खोली। उसमें से तीन चीज़ें निकालीं — एक रंगीन रिबन, एक सुंदर कंघी, और एक बहुत प्यारा-सा लाल सेब।
तीनों पर ज़हर लगाया। एक टोकरी में रखा। और निकल पड़ी — पहाड़ की दूसरी तरफ़।
एक भयानक यात्रा शुरू हो गई।
How would you like to enjoy this episode?
टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें
लॉगिन करें