1 वो एक नज़र — जिसने सब बदल दिया FREE 2 रोहित के हाथ में FREE 3 रात के तीन बजे का वो अजनबी FREE 4 डिनर टेबल पर बम FREE 5 कागज़ कलम — वो पहली मुलाक़ात FREE 6 ख़ून, धुंध, और एक रहस्यमयी निशानेबाज़ FREE 7 लोनावला की वो हवेली — पैंतीस साल का राज़ FREE 8 माँ की आवाज़ — और बेटे का फ़ैसला FREE 9 वो खालापुर का घर — और ज़िंदा बचा एक भाई FREE 10 कबीर का आलीशान कमरा — और एक माँ का असली चेहरा FREE 11 दुबई की वो आवाज़ FREE 12 समुंदर में मरेंगे या ज़िंदा बचेंगे FREE 13 मुंबई की रात — और एक छुपा हुआ चाक़ू FREE 14 एक उंगली, एक trigger, और एक छोटी सी बच्ची FREE 15 तीन दिन बाद — एक मीठी सुबह और एक काली परछाई FREE 16 अभय राठौड़ — पैंतीस साल पुराना भूत FREE 17 स्नायपर की वो गोली — और एक छुपा हुआ मुजरिम FREE 18 Worli sea face — दादिमा का आख़िरी कदम FREE 19 गोआ की वो हवेली — कबीर का आख़िरी अड्डा FREE 20 शादी का मंडप — और एक अनजाने मेहमान FREE
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वो एक नज़र — जिसने सब बदल दिया

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मुंबई। ताज होटल। रात के नौ बजे।

बाहर बारिश हो रही थी — मुंबई की वो बेरहम जुलाई की बारिश जो सड़कों को नदियों में बदल देती है। लेकिन ताज के बॉलरूम के अंदर एक अलग ही दुनिया थी। क्रिस्टल झूमरों की सुनहरी रोशनी, संगमरमर की चमकती फर्श, और हवा में फ्रेंच परफ्यूम और इतालवी वाइन की मिली-जुली खुशबू।

ये थी "मुंबई फॉर तोमारो" चैरिटी गाला — साल का सबसे बड़ा फंडरेज़र। शहर का हर अमीर, हर पावरफुल, हर मशहूर इंसान आज यहीं था। फिल्मस्टार्स, बिज़नेस टायकून, पॉलिटिशियन्स, मीडिया मुगल्स — सब एक ही छत के नीचे।

और एंट्रेंस की लाल कारपेट पर — एक काली ऑडी A8 आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला। और अंदर से उतरीं — आरुषि राठौड़।

बावीस साल। पाँच फुट छह इंच। एक काली saree जो उसके शरीर पर ऐसे फिट थी जैसे किसी कलाकार ने हाथ से बनाई हो। बालों का एक soft bun, कानों में हीरे के झुमके — बस। कोई और जेवर नहीं। कोई और मेकअप नहीं। उसकी आँखें ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थीं — काली, गहरी, और इतनी तेज़ कि लोग पल भर के लिए साँस लेना भूल जाते थे।

बगल में बैठा था उसका भाई — रोहित राठौड़। अठ्ठाईस साल। राठौड़ ग्रुप ऑफ़ हॉटेल्स का सीईओ। तेज़, ज़हीन, और पूरे मुंबई में अपनी चीज़ों के लिए जान लड़ा देने वाला।

"आरुषि, एक बात ध्यान रखना," रोहित ने गाड़ी से उतरते-उतरते कहा। उसकी आवाज़ में हमेशा वो एक तीखापन था जो छोटी बहन के लिए reserved होता है। "आज इस गाला में मेहता फैमिली भी आई है। ध्रुव मेहता और उसका वो बेटा — रुद्र। तुझे उनसे एकदम दूर रहना है। एक नज़र भी मत मिलाना। एक शब्द भी नहीं। समझी?"

आरुषि ने हलकी सी मुस्कुराहट के साथ भाई की तरफ देखा। "भैया, बीस साल से एक ही बात हर बार। मेहता ये, मेहता वो। मैंने उन लोगों को कभी देखा भी नहीं है। फिर डर किस बात का?"

रोहित का चेहरा कड़क हो गया। "आरुषि, मज़ाक नहीं। पापा ने कहा है — और तू जानती है पापा कभी बिना वजह कुछ नहीं कहते। मेहता फैमिली हमारे लिए ज़हर है। बीस साल पहले उन्होंने हमारे चाचा को... खैर, छोड़। तू बस उनसे दूर रहना। ठीक?"

"ठीक है, ठीक है। दूर ही रहूँगी।" आरुषि ने भाई का हाथ पकड़कर हलका सा दबाया। "अब चलो अंदर। मेरी फेलोशिप के लिए एक स्पॉन्सर मिल जाए तो रात का काम बन जाए।"

दोनों भाई-बहन बॉलरूम में दाख़िल हुए।

तीसरी मंज़िल — मेज़ानाइन

बॉलरूम की तीसरी मंज़िल पर एक मेज़ानाइन था। वहाँ से नीचे का पूरा मंज़र दिखता था। और वहाँ — रेलिंग के सहारे खड़ा था एक आदमी।

लंबा। छह फुट दो। एक काला सूट जो टेलर ने उसकी body पर ही बनाया लगता था। बाल थोड़े बेतरतीब, जैसे जानबूझकर। हाथ में एक whiskey का ग्लास — जो वो पी नहीं रहा था, बस घुमा रहा था। और चेहरा — एक ऐसा चेहरा जो किसी magazine cover पर हो सकता था, लेकिन जिसमें इस वक़्त कोई expression नहीं था।

ये था रुद्र मेहता। छब्बीस साल। मेहता ग्रुप ऑफ़ रियल एस्टेट का इकलौता वारिस। और जिसके बारे में मुंबई के टेबलॉयड्स कहते थे — "दिल का राजा, दिमाग का तानाशाह।"

बगल में खड़ा था उसका दोस्त — अर्जुन सिंह। लॉयर। बचपन से रुद्र के साथ। और शायद इकलौता इंसान जिसके सामने रुद्र अपना मुखौटा उतारता था।

"भाई, तू आज भी ऐसे खड़ा है जैसे किसी का जनाज़ा है," अर्जुन ने रुद्र की पीठ पर हलका सा थपका मारा। "अरे यार, ये फंडरेज़र है, फ्यूनरल नहीं। थोड़ा मुस्कुरा। मीडिया वाले फोटो खींच रहे हैं।"

रुद्र ने एक हलकी सी मुस्कुराहट दी — वो मुस्कुराहट जो अमीर लोग कैमरे के लिए reserved रखते हैं। फिर उसकी नज़र वापस whiskey पर गई।

"अर्जुन, मैं यहाँ इसलिए आया हूँ क्योंकि मेरे बाप ने हुक्म दिया है। दो घंटे झेलूँगा, फिर निकल लूँगा। बस।"

अर्जुन हँस पड़ा। "हाँ हाँ, हर बार यही कहता है। और हर बार किसी न किसी के साथ —"

रुद्र ने उसे एक नज़र से चुप करा दिया। फिर वो वापस बॉलरूम के नीचे देखने लगा।

और तभी —

वो एक पल

नीचे, मेन एंट्रेंस से एक काले रंग की ड्रेस में एक लड़की अंदर आई। रुद्र की नज़रें उस पर पड़ीं। और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उसके हाथ में पकड़ा whiskey का ग्लास हलका सा हिला।

लड़की ने बॉलरूम में नज़रें घुमाईं। शायद किसी को ढूँढ रही थी। और फिर — जैसे किसी अदृश्य धागे ने उसे खींचा हो — उसने ऊपर देखा।

मेज़ानाइन की तरफ। रुद्र की तरफ।

दो जोड़ी आँखें मिलीं।

और कुछ हुआ।

रुद्र को बाद में कभी एक्सप्लेन नहीं कर पाएगा कि उस एक पल में क्या हुआ था। बस इतना याद रहेगा कि — दुनिया रुक गई थी। बॉलरूम के सारे आवाज़ — वो live jazz band, वो कांच के ग्लासों की clink, वो लोगों के बातें — सब slow-motion में चली गईं। उसके कानों में बस एक चीज़ थी। उसका अपना दिल। जो अचानक बहुत तेज़ चलने लगा था।

और लड़की? लड़की भी रुक गई थी। उसके चेहरे पर एक हलका सा स्तब्धता का भाव। होंठ ज़रा से खुले। और फिर — उसने हलके से नज़रें झुकाईं। पर पूरी तरह से नहीं। उसकी आँखें वापस ऊपर आईं। उसने रुद्र की तरफ देखा।

और मुस्कुराई।

एक छोटी सी, शरारती सी, "तुम कौन हो?" वाली मुस्कुराहट।

रुद्र को लगा उसकी साँस रुक गई।

"रुद्र? रुद्र?" अर्जुन बगल से उसको हिला रहा था। "अबे यार, क्या देख रहा है? चल, मेहता अंकल ने बुलाया है।"

रुद्र ने अर्जुन की तरफ नज़र भी नहीं की। "अर्जुन। ज़रा रुक। एक मिनट।"

"क्या हुआ?"

"वो लड़की।" रुद्र ने नीचे की तरफ इशारा किया। "वो काली saree में। कौन है?"

अर्जुन ने नीचे देखा। फिर उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव आया। उसने रुद्र की तरफ देखा। फिर वापस लड़की की तरफ। फिर रुद्र की तरफ।

"भाई। तू पागल हो गया है।"

"कौन है वो, अर्जुन?"

अर्जुन ने एक गहरी साँस ली।

"रुद्र — तू ये सवाल पूछना भूल जा। तू उसे जानता ही नहीं है। तूने उसे देखा भी नहीं है। आज की रात भूल जा।"

"क्यों?"

अर्जुन ने रुद्र के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आवाज़ में अब वो हँसी नहीं थी।

"क्योंकि वो आरुषि राठौड़ है। विक्रम सिंह राठौड़ की इकलौती बेटी।"

रुद्र के हाथ से whiskey का ग्लास छूटते-छूटते बचा।

आरुषि की नज़र से

नीचे, बॉलरूम में, आरुषि भी जम सी गई थी।

ऊपर मेज़ानाइन पर खड़े उस आदमी की नज़र से उसके अंदर कुछ हिल गया था। ऐसा कोई भी अहसास उसने पहले नहीं जाना था। पता नहीं क्यों — पर उसका मन कह रहा था, "उसके पास जा। पूछ। नाम पूछ। कुछ भी पूछ।"

"आरुषि, क्या हुआ? तू कहाँ खो गई?" रोहित ने उसे हिलाया।

आरुषि ने भाई की तरफ देखा। "कुछ नहीं भैया। ज़रा... एक मिनट। मैं washroom जा रही हूँ।"

"अकेले?"

"भैया, मैं बच्ची नहीं हूँ। एक मिनट में आती हूँ।"

रोहित कुछ कहने वाला था पर तभी कोई बिज़नेस contact आया और रोहित उसमें फँस गया। आरुषि चुपचाप भीड़ में खो गई।

लेकिन वो washroom नहीं जा रही थी।

वो उस सीढ़ी की तरफ जा रही थी जो मेज़ानाइन तक जाती थी।

ऊपर। उस आदमी के पास। जिसका न नाम पता था न पता।

बस एक चीज़ पता थी — आज रात उसकी नज़रें उसे फिर देखनी थीं। एक बार। बस एक बार।

मेज़ानाइन पर — दूसरी मुलाक़ात की दहलीज़

रुद्र अभी भी सदमे में था।

"विक्रम सिंह राठौड़ की बेटी।"

बीस साल पुरानी दुश्मनी। उसके बाप की सबसे बड़ी कमज़ोरी — "राठौड़ का नाम भी मेरे घर में नहीं आना चाहिए।" उसके दादा की मौत का सिलसिला कहीं इसी फैमिली से शुरू होता था। उसकी अपनी ज़िंदगी का हर ज़ख़्म कहीं न कहीं इसी राठौड़ खानदान से जुड़ा था।

और वो लड़की? जिसकी एक नज़र से उसके पैरों के नीचे की ज़मीन हिल गई थी?

वो उसी राठौड़ खानदान की थी।

"रुद्र, सुन," अर्जुन ने उसे फिर हिलाया। "अब चल। नीचे चल। मेहता अंकल wait कर रहे हैं। और तू उस लड़की को देखना भूल जा। समझ रहा है मेरी बात?"

"हाँ, हाँ। चलता हूँ।" रुद्र ने whiskey एक घूँट में खत्म की। ग्लास साइड में रखा। और सीढ़ी की तरफ मुड़ा।

और तभी —

सीढ़ी से ऊपर आ रही थी एक काली saree में लिपटी हुई वो लड़की।

रुद्र की नज़र उसकी पर पड़ी। उसकी पर रुद्र की। दोनों ज़्यादा से ज़्यादा दस फीट की दूरी पर थे।

मेज़ानाइन पर इस वक़्त कोई और नहीं था। सिर्फ़ अर्जुन — जो रुद्र के पीछे खड़ा था और इस वक़्त साँस रोक के देख रहा था।

आरुषि ने एक कदम आगे बढ़ाया।

रुद्र ने एक कदम आगे बढ़ाया।

दोनों के बीच की दूरी अब आठ फीट।

फिर सात।

फिर पाँच।

आरुषि की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे लग रहा था पूरा बॉलरूम सुन रहा है। उसकी जबान सूख गई थी। उसने अपने आप को कहा — "बस नाम पूछ। बस इतना। फिर तू नीचे चली जाना।"

रुद्र की हालत भी कोई बेहतर नहीं थी। उसके अंदर एक आवाज़ चिल्ला रही थी — "रुक। पीछे हट। ये राठौड़ है। ये दुश्मन है। ये तेरा सब कुछ बर्बाद कर देगी।" लेकिन उसके पैर रुक नहीं रहे थे।

तीन फीट।

दो फीट।

और फिर —

आरुषि एकदम रुद्र के सामने आ खड़ी हुई। बहुत क़रीब। इतनी क़रीब कि रुद्र उसके परफ्यूम की खुशबू सूंघ सकता था। एक हलका सा रोज़, थोड़ा सा वैनिला। उसके बाल थोड़े उलझे हुए, जैसे ऊपर आते वक़्त हवा से हिल गए हों।

आरुषि ने रुद्र की आँखों में देखा।

रुद्र ने उसकी आँखों में देखा।

दोनों की साँसें एक ताल पर चलने लगीं।

और फिर — आरुषि ने धीमे से, लगभग एक whisper में, पूछा —

"आपका नाम क्या है?"

रुद्र के होंठ खुले। एक शब्द बाहर आने वाला था।

और तभी —

मेज़ानाइन के दूसरे छोर से एक आवाज़ आई। एक तेज़, गुस्से से भरी, पहचानी हुई आवाज़।

"आरुषि!"

आरुषि का चेहरा पीला पड़ गया।

रुद्र ने मुड़कर देखा।

मेज़ानाइन की दूसरी सीढ़ी से ऊपर आ रहा था एक आदमी। तेज़ कदमों से। चेहरे पर खून उतर आया था। आँखों में आग।

रोहित राठौड़।

आरुषि का बड़ा भाई।

और रोहित की नज़र — सीधी रुद्र मेहता पर थी।

रोहित ने अपनी बहन को अनदेखा किया। वो सीधा रुद्र की तरफ बढ़ा। उसका दायाँ हाथ कोट के अंदर गया। और जब बाहर आया — तो उसमें कुछ था।

आरुषि ने भाई के हाथ की तरफ देखा।

और उसकी एक चीख गले में अटक गई।

रोहित के हाथ में थी —

अगले एपिसोड में: रोहित के हाथ में क्या है? क्या वो रुद्र पर हमला कर देगा? और आरुषि — वो किसकी तरफ खड़ी होगी? अपने भाई के, या उस अजनबी के, जिसका उसे नाम भी नहीं पता? पढ़ते रहिए। ये कहानी अभी शुरू हुई है।

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