रोहित के हाथ में बंदूक नहीं थी।
एक एनवेलप था। एक मोटा, सफेद, मनीला एनवेलप।
लेकिन उस एनवेलप को पकड़ने का उसका तरीका — जैसे कोई बम पकड़ रहा हो — वो आरुषि के दिल को कंपा गया।
रोहित ने रुद्र के एकदम सामने आकर उसे ज़ोर से धक्का दिया।
रुद्र — जो छह फुट दो का था और जिसकी body weight लगभग नब्बे किलो थी — एक कदम पीछे हटा। न इसलिए कि धक्का तेज़ था। बल्कि इसलिए कि उसे अपनी ख़ुद की मर्ज़ी से पीछे हटना था। एक झगड़ा यहाँ नहीं चाहिए था। मीडिया भरी हुई थी। कैमरे हर तरफ। एक ग़लत खबर — और कल मेहता ग्रुप के स्टॉक्स गिर जाते।
"मेहता।" रोहित की आवाज़ बहुत धीमी थी। पर हर शब्द ऐसा जैसे चाक़ू।
"राठौड़।" रुद्र ने भी उतनी ही धीमी आवाज़ में जवाब दिया।
अर्जुन — रुद्र का दोस्त — ने धीमे से रुद्र की कोहनी पकड़ी। "भाई, थोड़ा control।"
आरुषि भाई के बगल में आ खड़ी हुई। "भैया। ये क्या कर रहे हैं आप? पागल हो गए हैं? यहाँ इतने लोग हैं —"
"तू चुप कर, आरुषि।" रोहित ने बहन की तरफ देखा भी नहीं। उसकी नज़रें रुद्र के चेहरे पर fix थीं। "तू नीचे जा। मैं अभी आता हूँ।"
"भैया, मैं नहीं जाऊँगी जब तक —"
"आरुषि!" रोहित की आवाज़ इस बार थोड़ी ऊँची थी। "नीचे जा। अभी।"
आरुषि ने रुद्र की तरफ देखा। एक पल के लिए। बस एक पल। और फिर — उसने अपने दिल पर पत्थर रखा। मुड़ी। और सीढ़ी से नीचे उतरने लगी।
लेकिन उतरते-उतरते उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
रुद्र देख रहा था उसे।
और उसकी आँखों में जो था — वो शब्दों में नहीं था। पर आरुषि को समझ आ गया।
"मैं तुझे ढूँढूँगा। ज़रूर ढूँढूँगा।"
आरुषि के नीचे जाते ही रोहित ने एनवेलप रुद्र की छाती पर पटक दिया।
"ये देख। तेरे बाप की कारगुज़ारी।"
रुद्र ने एनवेलप पकड़ा। खोला। अंदर थीं — कुछ photos। और कुछ documents।
रुद्र ने photos देखीं। एक के बाद एक।
पहली photo — एक बूढ़ा आदमी, अस्पताल के बेड पर। चेहरा पीला। आँखें बंद।
दूसरी photo — एक hospital का बिल। बहुत बड़ा amount। और bottom पर एक signature — रुद्र के बाप का। ध्रुव मेहता का।
तीसरी photo — एक letter। typed। जिस पर लिखा था — "All medical expenses to be borne by me, Dhruv Mehta. In exchange — the said person shall not testify in any future legal proceeding regarding the events of October 14, 2005."
रुद्र की उंगलियाँ काँपने लगीं।
"ये क्या है?" उसने धीमे से पूछा।
रोहित ने एक खौफनाक सी हँसी हँसी। "तेरी जिंदगी का सबसे बड़ा झूठ। तेरे बाप ने जो कहा कि मेरे चाचा करण की मौत एक accident में हुई थी — वो झूठ था। ये अस्पताल में बीस साल पहले बेड पर पड़ा बूढ़ा — ये एकमात्र चश्मदीद गवाह था जिसने मेरे चाचा का qatl होते देखा था। और तेरे बाप ने इसे ख़रीद लिया।"
रुद्र ने सर हिलाया। "नहीं। ये नहीं हो सकता। मेरे पापा कभी —"
"तू अपने पापा को जानता ही नहीं है, मेहता।"
रोहित ने रुद्र के एनवेलप पकड़े हुए हाथ को धक्का दिया।
"और एक बात याद रखना। आज तूने मेरी बहन के साथ बात करने की कोशिश की।"
रुद्र की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं। "मैंने उससे बात नहीं की।"
"वो ऊपर आई थी तुझसे मिलने।"
"वो..." रुद्र रुक गया। उसे क्या कहना था? कि वो लड़की चुम्बक की तरह उसकी तरफ खिंच आई थी? कि वो ख़ुद नहीं जानती थी क्यों? "उसे मुझे जानने की ज़रूरत नहीं है। मैं उसे जानने की कोशिश नहीं करूँगा।"
"बेशक नहीं करेगा।" रोहित ने एक छोटा सा कदम और आगे बढ़ाया। अब वो रुद्र के बहुत क़रीब था। "क्योंकि अगर तूने उसकी तरफ एक बार भी देखा — तो जो बीस साल पहले मेरे चाचा के साथ हुआ था, वो दोबारा होगा। बस इस बार तेरे साथ। समझा?"
रुद्र ने रोहित की आँखों में देखा। उसमें ख़तरा था। पर उसमें कुछ और भी था — एक बहुत पुराना, बहुत गहरा दर्द।
रुद्र ने कुछ नहीं कहा।
रोहित मुड़ा। सीढ़ी से नीचे उतरने लगा।
जाते-जाते उसने एक बार पीछे मुड़कर कहा — "और हाँ। ये एनवेलप अपने पास रख। कल अख़बार में ये photos और signatures आएँगे। तू मुंबई का सबसे famous news story बनेगा कल। तेरे बाप को भी मुबारक हो दे देना।"
रोहित नीचे चला गया।
रुद्र अकेला रह गया।
अर्जुन को छोड़कर — जो बगल में खड़ा था और जिसका चेहरा अब बेरंग हो गया था।
"रुद्र।" अर्जुन ने धीमे से कहा। "ये बात... क्या तू जानता था?"
रुद्र ने एनवेलप वापस photos के साथ बंद किया। उसकी आँखें अब वो जोश की आँखें नहीं थीं जो दस मिनट पहले आरुषि को देखकर हो गई थीं। अब उनमें कुछ और था। एक ठंडा सा गुस्सा। एक भयंकर सा ख़ाली सा अहसास।
"नहीं," उसने कहा। बहुत धीमे से। "मुझे नहीं पता था।"
"तो अब?"
रुद्र चुप रहा।
बीस साल पहले की एक रात उसके दिमाग़ में चलने लगी। उसे याद आया — वो छह साल का था। उसकी माँ अचानक रात को रोते-रोते घर छोड़कर चली गई थी। वो बहुत कुछ नहीं समझ पाया था। लेकिन उसे एक बात याद थी — माँ ने जाते वक़्त बाप से एक बात कही थी —
"तुमने एक इंसान के क़त्ल पर अपनी ज़िंदगी बनाई है, ध्रुव। मैं इस झूठ में नहीं रह सकती।"
क़त्ल। उसने ये शब्द बाप के मुँह से कभी नहीं सुना। पर माँ ने कहा था।
और तब रुद्र को नहीं पता था कि माँ क्या बोल रही थी।
लेकिन आज — आज उसके हाथ में एक एनवेलप था जिसमें वो जवाब था।
"अर्जुन।" रुद्र ने अपने दोस्त की तरफ देखा। "मुझे घर जाना है। पापा से बात करनी है।"
"रुद्र, रुक। पहले सोच। ये photos asli हैं या nahi, ये कन्फर्म कर। और तेरा बाप — उसको आज इस मूड में सामने ना ला। तू पागल हो जाएगा।"
रुद्र ने अर्जुन की बात नहीं सुनी।
वो सीढ़ी से नीचे उतरने लगा।
बॉलरूम पार करता हुआ। एनवेलप कोट के अंदर दबाए हुए। चेहरे पर वही अमीर लोगों वाली नाटकीय मुस्कुराहट। पर अंदर — एक तूफ़ान।
और उतरते-उतरते उसकी नज़र एक बार पड़ी।
बॉलरूम के दूसरे छोर पर — खड़ी थी आरुषि।
उसके बगल में रोहित। आरुषि के पापा भी अब आ चुके थे। विक्रम सिंह राठौड़। साठ साल। चाँदी जैसे सफेद बाल। और एक ऐसा चेहरा जो दशकों से दुश्मनी में पल रहा था।
विक्रम सिंह ने रुद्र को देखा। उनकी आँखों में नफ़रत थी। ख़ालिस नफ़रत।
रुद्र ने नज़र फेर ली। बाहर निकल गया।
लेकिन निकलते-निकलते — एक आख़िरी बार — उसने आरुषि की तरफ देखा।
आरुषि भी देख रही थी।
और इस बार उसकी आँखों में सिर्फ़ एक सवाल था — "क्या हुआ ऊपर?"
रुद्र ने जवाब नहीं दिया।
बस — बहुत हलके से — हाथ उठाया। एक बहुत छोटा सा इशारा। "बाद में।"
आरुषि ने सर हिलाया। बहुत हलके से। बहुत छुपते हुए। ताकि भाई और बाप न देखें।
और फिर रुद्र दरवाज़े से बाहर निकल गया।
राठौड़ हाउस। बांद्रा वेस्ट। एक ऐसा बंगला जो मुंबई की सबसे महंगी सड़कों में से एक पर खड़ा था।
आरुषि अपने कमरे में थी। सोने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
उसकी आँखों के सामने वो चेहरा था। वो आदमी। जिसका नाम उसे अभी भी नहीं पता था।
उसने अपना फ़ोन उठाया। Instagram खोला। search bar में टाइप किया —
"Mehta family Mumbai"
पहला result — Mehta Group of Real Estate। Official handle।
Photos में ध्रुव मेहता — उसका बाप जिसने ये kuch किया था जो रोहित कह रहा था।
और फिर — एक और account। Private। Profile picture में एक धुंधली सी silhouette। Username — @rudramehta_._
आरुषि ने सर हिलाया।
"वो रुद्र मेहता है। मेरे दुश्मन का बेटा।"
आरुषि ने profile पर click किया। Private थी। पर एक request भेज सकती थी।
उसकी उँगली Follow request के button पर रुक गई।
"नहीं।" उसने ख़ुद से कहा। "बेवक़ूफ़ मत बन। एक बार देखा है। बस। भूल जा। तेरा भाई बंदूक उठा सकता है। तेरा बाप तुझे घर से निकाल सकता है। ये क़दम ज़हर है।"
लेकिन उसकी उँगली —
जैसे उसकी अपनी मर्ज़ी से नहीं — click।
Follow request sent.
आरुषि ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने क्या कर दिया।"
रुद्र मेहता मलाबार हिल पर अपने पेंटहाउस में था।
उसके बाप ध्रुव मेहता ने photos देखी थीं।
रुद्र ने पूछा था — "ये सच है?"
ध्रुव मेहता ने मुँह फेर लिया था।
"पापा। मेरी आँखों में देखकर बताइए। ये सच है?"
ध्रुव मेहता ने अपने बेटे की तरफ देखा। पैंसठ साल का आदमी। बाल सफेद। चेहरे पर वो थकान जो सिर्फ़ राज़ रखने वाले लोगों के चेहरे पर होती है।
"रुद्र, बेटा। तुझे अभी इन सब बातों में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। ये बीस साल पुरानी कहानी है।"
"क्या आपने एक चश्मदीद गवाह को ख़रीदा था या नहीं?"
ध्रुव मेहता चुप रहे।
"पापा। एक हाँ या ना। बस।"
ध्रुव मेहता ने अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की से बाहर देखा। मुंबई की रात की रोशनियाँ। दूर समुंदर। और बहुत दूर — आरुषि के घर की वो खिड़की जो मेहता के घर से नंगी आँख से नहीं दिखती थी।
"बेटा। तेरे चाचा करण की मौत — वो एक झगड़े का नतीजा थी। बहुत बड़ा झगड़ा। हमारे और राठौड़ खानदान के बीच। उस झगड़े में मेरा बड़ा भाई — विशाल मेहता — मार दिया गया। मार करण राठौड़ ने डाला। और जवाब में — किसी और ने करण को मार दिया।"
रुद्र की साँस अटक गई। "किसी और ने? मतलब?"
"मतलब — मैंने नहीं मारा करण को। पर मुझे पता था कौन ने मारा। और मुझे पता था कि अगर वो बात बाहर आ गई — तो हमारा खानदान बर्बाद हो जाता। इसलिए मैंने उस चश्मदीद को ख़रीदा। उसका मुँह बंद किया।"
"और मेरी माँ? वो आपको छोड़कर क्यों गई थीं?"
ध्रुव मेहता ने अपने बेटे की तरफ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे। पहली बार रुद्र ने अपने बाप को रोते देखा।
"क्योंकि उसे लगा था मैंने करण को मारा है। मैं ने उसे सच नहीं बताया। मैं नहीं बता सकता था। और इसलिए वो मुझे छोड़कर चली गई।"
"तो असली क़ातिल कौन है?"
ध्रुव मेहता रुक गए।
"रुद्र, बेटा। ये बात तू नहीं सुन सकता। अगर सुन ली तो..."
"पापा। अगर ये बात आज मुझे नहीं बताएँगे — तो मैं ख़ुद ढूँढूँगा। अकेले। और जो भी मिलेगा — सबको मालूम होगा। तो बेहतर है आप बता दीजिए।"
ध्रुव मेहता ने एक गहरी साँस ली।
"असली क़ातिल का नाम है —"
और तभी —
दरवाज़े की घंटी बजी।
रात के दो बजकर पैंतालीस मिनट।
रुद्र ने मुड़कर देखा। नौकर ने आकर बताया —
"साब। बाहर एक आदमी है। कहता है — मेहता साब को बताओ कि बीस साल पहले हुई बात के बारे में बात करने आया हूँ।"
ध्रुव मेहता का चेहरा सफेद हो गया।
रुद्र की उंगलियाँ कस गईं।
"नाम क्या है?" रुद्र ने पूछा।
नौकर ने कहा — "अपना नाम बताया नहीं उसने, साब। बस इतना कहा — 'जो आज रात पता नहीं चला, वो मेरे पास है।'"
ध्रुव मेहता ने रुद्र की तरफ देखा।
रुद्र की तरफ — और उनकी आँखों में अब सिर्फ़ एक चीज़ थी।
डर।
अगले एपिसोड में: दरवाज़े पर खड़ा वो आदमी कौन है? क्या वो असली क़ातिल है? या उसका कोई और मक़सद है? और आरुषि की follow request — रुद्र का जवाब क्या होगा? पढ़ते रहिए। इस रात अभी कई राज़ खुलने बाकी हैं।
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