1 वो एक नज़र — जिसने सब बदल दिया FREE 2 रोहित के हाथ में FREE 3 रात के तीन बजे का वो अजनबी FREE 4 डिनर टेबल पर बम FREE 5 कागज़ कलम — वो पहली मुलाक़ात FREE 6 ख़ून, धुंध, और एक रहस्यमयी निशानेबाज़ FREE 7 लोनावला की वो हवेली — पैंतीस साल का राज़ FREE 8 माँ की आवाज़ — और बेटे का फ़ैसला FREE 9 वो खालापुर का घर — और ज़िंदा बचा एक भाई FREE 10 कबीर का आलीशान कमरा — और एक माँ का असली चेहरा FREE 11 दुबई की वो आवाज़ FREE 12 समुंदर में मरेंगे या ज़िंदा बचेंगे FREE 13 मुंबई की रात — और एक छुपा हुआ चाक़ू FREE 14 एक उंगली, एक trigger, और एक छोटी सी बच्ची FREE 15 तीन दिन बाद — एक मीठी सुबह और एक काली परछाई FREE 16 अभय राठौड़ — पैंतीस साल पुराना भूत FREE 17 स्नायपर की वो गोली — और एक छुपा हुआ मुजरिम FREE 18 Worli sea face — दादिमा का आख़िरी कदम FREE 19 गोआ की वो हवेली — कबीर का आख़िरी अड्डा FREE 20 शादी का मंडप — और एक अनजाने मेहमान FREE
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रात के तीन बजे का वो अजनबी

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ध्रुव मेहता का दिल अब इतनी तेज़ धड़क रहा था कि रुद्र को कमरे की दूसरी तरफ़ से सुनाई दे रहा था।

"पापा। कौन है ये आदमी?"

"पता नहीं। पर..." ध्रुव मेहता ने नौकर की तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ अब काँप रही थी। "रामू। उसको अंदर आने मत देना। दरवाज़े पर ही रोक। पुलिस को फ़ोन कर। अभी।"

रुद्र ने बाप का हाथ पकड़ा। "पापा। पुलिस को नहीं। अगर ये आदमी सच में वो जानता है जो आप बता रहे थे — तो पुलिस आते ही ये चला जाएगा। और जो भी information ले आया है, वो भी हमेशा के लिए छुप जाएगी।"

ध्रुव मेहता ने रुद्र की तरफ देखा।

रुद्र की आँखों में कुछ बदल गया था। दो घंटे पहले वो एक खराब, बिगड़ा हुआ अमीर का बच्चा था — जो अपने बाप के साम्राज्य का intern बनकर जी रहा था। पर अब? अब उसकी आँखों में कुछ और था। एक तीखापन। एक मक़सद।

"मैं मिलूँगा उससे," रुद्र ने कहा।

"रुद्र, नहीं —"

"पापा। आपने बीस साल मुझसे ये राज़ छुपाया। आपकी वजह से मेरी माँ चली गई। मैं और नहीं छुपाऊँगा। मैं अभी जा रहा हूँ। आप यहाँ रुकिए।"

ध्रुव मेहता ने अपने बेटे का हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ इतनी कमज़ोर थी कि रुद्र को हैरानी हुई। ये वो आदमी था जो एक हाथ से एक पूरा रियल एस्टेट साम्राज्य खड़ा कर सकता था?

"बेटा।" ध्रुव मेहता की आवाज़ अब बहुत धीमी थी। "सावधान। ये जो भी आदमी है — अगर ये सच में बीस साल पुरानी रात के बारे में जानता है — तो ये बहुत ख़तरनाक है। और एक बात याद रखना। सच जानने के बाद ज़िंदगी फिर वैसी नहीं होती।"

रुद्र रुका। बाप की आँखों में देखा। फिर — पहली बार बहुत लंबे अरसे में — झुककर ध्रुव मेहता के पैर छुए।

"पापा। माफ़ कर दीजिए। आज तक मैंने आपको समझा नहीं।"

ध्रुव मेहता का चेहरा हिल गया। उन्होंने रुद्र को उठाया। गले लगाया।

"बेटा। ये जो भी हो — दिल मज़बूत रखना। आज की रात के बाद — हम दोनों की दुनिया बदल जाएगी।"

रुद्र मुड़ा। दरवाज़े की तरफ़ चला।

दरवाज़े पर

दरवाज़े के सामने एक आदमी खड़ा था।

लंबा। पतला। शायद पैंतालीस-पचास साल का। चेहरे पर आधी दाढ़ी। बाल बेतरतीब। पुराने कपड़े — एक brown jacket जो शायद दस साल पहले की होगी। और सबसे अजीब बात — उसकी आँखें।

उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे उसने पिछले बीस साल नींद नहीं ली थी।

रुद्र दरवाज़े पर पहुँचा। नौकर रामू को इशारे से बताया कि वो जा सकता है।

"आप?" रुद्र ने पूछा।

आदमी ने रुद्र की तरफ़ देखा। उसकी नज़र एक पल के लिए रुद्र के चेहरे पर रुकी। और फिर — बहुत हलके से — उसके होंठ हिले।

"तुम बहुत सारी चीज़ों में अपने चाचा विशाल जैसे लगते हो।"

रुद्र की रीढ़ की हड्डी में एक झटका दौड़ गया। विशाल मेहता। उसका वो चाचा जो बीस साल पहले मारा गया था। जिसके बारे में रुद्र ने कुछ धुंधली photos के अलावा कभी कुछ नहीं देखा था। ये आदमी उसे जानता था?

"आप कौन हैं?" रुद्र ने पूछा।

आदमी एक पल चुप रहा।

फिर बोला — "मेरा नाम जयराज मल्होत्रा है।"

रुद्र की भौंहें चढ़ीं। "मल्होत्रा? मैं किसी मल्होत्रा को नहीं जानता।"

"बेशक नहीं जानते। तुम्हें जानने नहीं दिया गया।" जयराज ने हलकी सी हँसी हँसी। बिना कोई हँसी वाली हँसी। "मैं तुम्हारी माँ का बड़ा भाई हूँ।"

रुद्र ने जैसे एक थप्पड़ खाया हो।

"मेरी माँ का... भाई?" उसकी आवाज़ अब काँप रही थी। "मेरी माँ... मेरी माँ का तो कोई भाई नहीं था। पापा ने हमेशा बताया था —"

"तुम्हारे पापा ने बहुत कुछ बताया तुम्हें, और बहुत कुछ नहीं बताया।" जयराज ने गरम सा साँस लिया। "बेटा, अगर तुम्हें असली कहानी सुननी है — तो मेरे साथ चलो। यहाँ नहीं। ये जगह सेफ नहीं है।"

"यहाँ क्यों नहीं?"

जयराज ने रुद्र के पीछे देखा। "क्योंकि तुम्हारा बाप जिस आदमी को बीस साल से ढूँढ रहा है — वो मैं हूँ। और जिस घर में तुम बैठे हो — वहाँ मेरी जान सेफ नहीं है।"

रुद्र ने एक कदम पीछे लिया।

"तुम मेरे पापा के दुश्मन हो?"

जयराज ने सर हिलाया। "नहीं रुद्र। मैं तुम्हारे पापा का दुश्मन नहीं हूँ। मैं तुम्हारी माँ का भाई हूँ। और तुम्हारे चाचा का — विशाल मेहता का — सबसे अच्छा दोस्त था। उसने मरने से पहले मुझे एक चीज़ दी थी।"

"क्या चीज़?"

जयराज ने अपनी पुरानी जैकेट की अंदर वाली pocket में हाथ डाला। एक छोटा सा pen drive निकाला। उसे रुद्र के सामने उठाया।

"ये। इसमें वो सब कुछ है — जो बीस साल पहले उस रात हुआ था। मेरे पास इस pen drive में एक video file है। एक audio recording है। और एक ऐसा सच है — जो तुम्हारी और राठौड़ खानदान की दुनिया एक झटके में पलट सकता है।"

रुद्र की उँगलियाँ आगे बढ़ीं। पर रुक गईं।

"रुक। ये सच क्या है?"

जयराज ने pen drive अपनी मुट्ठी में बंद कर ली।

"वो मैं तुम्हें यहाँ नहीं बताऊँगा। मेरे साथ चलो। एक जगह है — ख़ार में। एक छोटा सा चाय का होटल। वहाँ सेफ है। मैं तुम्हें वहाँ सब दिखाऊँगा।"

रुद्र ने जयराज की तरफ देखा। उसके अंदर एक आवाज़ कह रही थी — "सावधान। ये trap हो सकता है। ये आदमी झूठ बोल रहा हो सकता है।"

लेकिन एक दूसरी आवाज़ कह रही थी — "ये जो भी हो, ये तेरी माँ का नाम जानता है। ये तेरे चाचा को जानता था। ये तुझे एक ऐसा सच बताने आया है जो तेरा बाप बीस साल से छुपा रहा है।"

रुद्र ने एक decision लिया।

"चलिए।"

इधर — आरुषि के कमरे में

आरुषि अपने bed पर लेटी थी। फ़ोन हाथ में। बार-बार Instagram refresh कर रही थी।

रुद्र मेहता ने follow request accept नहीं की थी।

बेशक नहीं की होगी। भला क्यों करता? उन दोनों के खानदान दुश्मन थे। और रोहित ने मेज़ानाइन पर शायद उसको कुछ ऐसी बात कही होगी जो रुद्र अब हमेशा के लिए दूर भागेगा।

आरुषि ने आँखें बंद कर लीं।

"तू बेवक़ूफ़ है, आरुषि।" उसने ख़ुद से कहा। "बेवक़ूफ़ है। चालू कर ले अपना दिमाग़।"

लेकिन उसी पल — phone में ping

आरुषि ने phone उठाया।

Notification:

@rudramehta_._ accepted your follow request.

आरुषि की धड़कन रुक गई।

उसने page refresh किया। सच था। रुद्र मेहता ने उसकी request accept कर ली थी।

वो उसकी profile पर click करने वाली थी — कि एक और notification आया।

Direct message: @rudramehta_._

आरुषि ने काँपते हाथों से message खोला।

बस तीन शब्द थे —

"आप ठीक हैं?"

बस ये। कोई introduction नहीं। कोई "Hi" नहीं। कोई परिचय नहीं। बस ये एक सवाल — "आप ठीक हैं?"

जैसे वो जानता हो। जैसे उसको पता हो कि आज की रात आरुषि के लिए कितनी मुश्किल थी।

आरुषि ने अपने आप से कहा — "जवाब मत दे। बंद कर। फ़ोन रख।"

लेकिन उसकी उँगलियाँ टाइप कर रही थीं —

"हाँ। आप?"

Send।

जवाब आया तुरंत।

"नहीं।"

बस ये एक शब्द। आरुषि ने पढ़ा। उसके अंदर कुछ हुआ। एक बहुत अजीब सा अहसास।

उसने फिर टाइप किया।

"क्या हुआ?"

जवाब — "लंबी कहानी है। आज रात बहुत कुछ बदल गया मेरे लिए।"

आरुषि ने उसका profile दोबारा खोला। उसकी photos। एक beach photo। एक gym photo। एक formal event की photo जिसमें वो कोई award ले रहा था। एक धूँधली सी photo जिसमें वो एक छोटे से बच्चे के साथ खड़ा था — शायद किसी रिश्तेदार का बच्चा।

वो आदमी जिसको दो घंटे पहले उसने पहली बार देखा था। और जिसके साथ अब वो messages exchange कर रही थी।

रात के तीन बजे।

मुंबई की एक बारिश की रात।

आरुषि ने टाइप किया — "मुझे भी कुछ बात करनी है। आप मिल सकते हैं? कल?"

रुद्र का जवाब आया दस सेकंड बाद।

"कहाँ?"

आरुषि एक पल सोचने लगी। कहाँ? कोई ऐसी जगह जहाँ कोई पहचान न ले। कोई ऐसी जगह जहाँ रोहित का कोई आदमी न हो।

फिर उसे एक जगह याद आई।

"बांद्रा बैंडस्टैंड। शाम को सात बजे। एक छोटा सा book café है — 'कागज़ कलम'। ज़्यादातर खाली रहता है। वहाँ?"

रुद्र — "मैं आऊँगा।"

आरुषि — "पक्का?"

रुद्र — "हाँ। पक्का।"

आरुषि ने phone एक तरफ रखा। अपनी छाती पर हाथ रखा। उसकी धड़कन सुनी।

"मैंने क्या कर दिया।"

लेकिन उसके चेहरे पर — एक मुस्कुराहट थी। एक छोटी सी, बेक़ाबू सी मुस्कुराहट।

"कल। बस कल का इंतज़ार।"

ख़ार। चाय का वो होटल।

रात के साढ़े तीन।

रुद्र मेहता और जयराज मल्होत्रा एक छोटे से, उजाड़ से चाय के होटल में बैठे थे। होटल बंद था। पर जयराज के पास उसकी चाबी थी।

जयराज ने एक पुराना laptop निकाला। pen drive उसमें लगाया।

एक folder खुला। उसके अंदर तीन files।

1. video_oct14_2005.mp4 2. audio_recording.mp3 3. truth_dhruv_mehta.pdf

रुद्र ने तीनों को देखा। उसका दिल अब इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसको लग रहा था जयराज सुन रहा है।

"पहले video देखो," जयराज ने कहा।

रुद्र ने play पर click किया।

video शुरू हुई। एक puranikaal की cctv camera से ली गई थी। black and white। थोड़ी धुंधली। पर साफ़।

जगह — एक warehouse। मुंबई के कहीं outskirts में।

समय — रात।

camera frame में दिख रहे थे — चार आदमी।

रुद्र ने पहले आदमी को पहचाना।

विशाल मेहता। उसका चाचा। बीस साल का दिखता था। मुस्कुराता हुआ।

दूसरा आदमी —

करण राठौड़। आरुषि के पापा का छोटा भाई। थोड़ा aggressive। हाथ में एक पिस्तौल।

तीसरा आदमी —

ध्रुव मेहता। रुद्र के पापा। उन दिनों के। पैंतीस के आसपास। चेहरा अभी उतना थका हुआ नहीं।

और चौथा आदमी —

रुद्र ने frame में चौथे आदमी को देखा।

और उसका दिल रुक गया।

चौथा आदमी —

रुद्र ने pause किया। उसने बहुत ध्यान से उसके चेहरे पर देखा। बहुत ध्यान से।

"ये... ये कौन है?" उसने जयराज से पूछा।

जयराज की आँखों में आँसू थे।

"रुद्र। बेटा। ये जो चौथा आदमी है — इसी ने तुम्हारे चाचा को मारा था। और तुम्हारे चाचा को मारने के बाद — इसी ने तुम्हारी माँ को घर से निकलवाया था। और इसी ने पिछले बीस साल तुम्हारे बाप को blackmail किया है।"

"पर ये... ये कौन है?"

जयराज ने एक गहरी साँस ली।

"रुद्र। बेटा। ये विक्रम सिंह राठौड़ का बड़ा बेटा है।"

रुद्र ने jaw जकड़ ली।

जयराज ने आगे बोला — "मतलब। आरुषि राठौड़ का बड़ा भाई।"

रुद्र की आँखें फटीं।

"रोहित? रोहित राठौड़?"

जयराज ने सर हिलाया।

"लेकिन रोहित तो उस वक़्त सिर्फ़ आठ साल का होगा! वो कैसे —"

"नहीं रुद्र। ये रोहित नहीं है।"

जयराज ने pause किए हुए frame पर उँगली रखी।

"ये विक्रम सिंह राठौड़ का दूसरा बेटा है। आरुषि का दूसरा भाई। जिसके बारे में तुम्हें कभी नहीं बताया गया। जिसके बारे में आरुषि को भी कभी नहीं बताया गया।"

रुद्र की आँखें screen पर fix थीं।

"और इसका नाम क्या है?"

जयराज की आवाज़ अब बहुत धीमी थी।

"रुद्र। बेटा। इसका नाम है कबीर अग्रवाल।"

रुद्र को उस नाम ने जैसे एक पत्थर की तरह मारा।

कबीर अग्रवाल।

मुंबई का सबसे तेज़ी से उभरता हुआ business tycoon। जिसकी कंपनी पिछले दस साल में आसमान छू रही थी। जिसका सब अख़बारों में नाम आता था। जिसकी photos हर charity event में दिखती थीं।

और सबसे बड़ी बात —

जिसके साथ — रुद्र ने कल ही newspaper में पढ़ा था — आरुषि राठौड़ की engagement फ़ाइनल हो रही थी।

रुद्र की उँगलियाँ कस गईं।

"जयराज जी। आपने पक्का देखा? ये कबीर अग्रवाल ही है? और ये सच में विक्रम सिंह राठौड़ का बेटा है?"

जयराज ने सर हिलाया।

"रुद्र। बेटा। कबीर अग्रवाल ही वो आदमी है जो तुम्हारे चाचा का क़ातिल है। वो ही आदमी है जिसने तुम्हारी माँ को घर से निकाला। वो ही आदमी है जिसने पिछले बीस साल तुम्हारे बाप को blackmail किया। और..."

जयराज ने रुद्र की आँखों में देखा।

"वो ही आदमी है जो आरुषि राठौड़ के साथ शादी करने वाला है। अपनी ही बहन के साथ।"

अगले एपिसोड में: क्या ये सच है? कबीर अग्रवाल — आरुषि का सगा भाई? और वो उसी से शादी कर रहा है? आरुषि के घर में — विक्रम सिंह राठौड़ के घर में — किसको ये बात पता है? और रुद्र — वो आरुषि से कब मिलेगा? कल शाम सात बजे बांद्रा बैंडस्टैंड पर क्या होगा? पढ़ते रहिए। ये राज़ अभी सिर्फ़ शुरू हुआ है।

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रात के तीन बजे का वो अजनबी

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