अग्नि पुराण की उत्पत्ति, अग्निदेव और महर्षि वसिष्ठ के बीच का दिव्य संवाद, और उस ज्ञान का उद्गम जिसने आगे चलकर समस्त वेद-विद्याओं की धारा को जन्म दिया।
॥ श्री गणेशाय नमः । श्री सरस्वत्यै नमः । श्री अग्निदेवाय नमः ॥
नमामि अग्निं वरदं तेजसां निधिम् । यः सर्वज्ञानमूलं हि दत्तवान् ब्रह्मवादिने ॥
सृष्टि के आरम्भ में जब चारों ओर केवल नीरव अन्धकार था, जब समय की धारा अभी प्रवाहित नहीं हुई थी, जब आकाश भी अव्यक्त था और पृथ्वी का स्वरूप भी अप्रकट था — उस समय एक तेज प्रकटा। वह तेज न सूर्य का था, न चन्द्र का, न किसी भी ज्योतिर्मय पिण्ड का। वह तेज स्वयं ज्ञान का था। उस तेज का नाम था — अग्नि।
शास्त्र कहते हैं कि अग्नि केवल वह दाहक तत्त्व नहीं है जो काठ को जलाकर राख कर देता है। अग्नि वह चेतन शक्ति है जो ब्रह्म से उत्पन्न होकर समस्त सृष्टि में व्याप्त है। जठराग्नि के रूप में वह हमारे भीतर पाचन करती है। मन्दाग्नि के रूप में वह हमारी बुद्धि को प्रदीप्त करती है। यज्ञाग्नि के रूप में वह देवताओं तक हमारी आहुतियाँ पहुँचाती है। और ज्ञानाग्नि के रूप में वह हमारे अज्ञान को भस्म करके आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है।
सप्तर्षियों में अग्रगण्य महर्षि वसिष्ठ एक दिन गहरी चिन्ता में मग्न थे। वसिष्ठ केवल ऋषि नहीं थे — वे ब्रह्मा के मानस-पुत्र थे, सूर्यवंशी राजाओं के कुलगुरु थे, राम के पिता दशरथ के मार्गदर्शक थे। उनकी तपस्या इतनी प्रचण्ड थी कि देवता भी उनकी आज्ञा का पालन करते थे। फिर भी उस दिन वसिष्ठ के मन में एक कौतूहल था जो उन्हें भीतर से कुरेद रहा था।
वसिष्ठ ने सोचा — "मैं वेद जानता हूँ, उपनिषद् जानता हूँ, स्मृतियाँ जानता हूँ। पर सम्पूर्ण विद्या एक जगह कहीं नहीं मिलती। कहीं मन्त्र हैं तो कर्मकाण्ड नहीं, कहीं कर्मकाण्ड है तो वास्तुविद्या नहीं, कहीं वास्तुविद्या है तो आयुर्वेद नहीं। क्या ऐसा कोई ग्रन्थ हो सकता है जिसमें मनुष्य के जीवन से जुड़ी हर एक विद्या समाहित हो? जिसमें धर्म भी हो और राजनीति भी, ज्योतिष भी हो और चिकित्सा भी, अध्यात्म भी हो और व्यवहार भी?"
वसिष्ठ की यह जिज्ञासा कोई सामान्य प्रश्न नहीं था। यह तो वह मन्थन था जो सृष्टि के कल्याण के लिए होता है। और जब किसी ऋषि के अन्तःकरण में ऐसा सात्विक प्रश्न उठता है, तो ब्रह्माण्ड स्वयं उसका उत्तर देने को तत्पर हो जाता है।
वसिष्ठ की कुटिया के समीप जो यज्ञवेदी थी, उसमें उस दिन अग्नि अनवरत प्रज्वलित थी। पूर्णिमा की रात्रि थी। आकाश में चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ चमक रहा था। वातावरण में एक अव्यक्त गन्ध थी — मानो कोई दिव्य उपस्थिति निकट हो।
अचानक यज्ञ की ज्वालाएँ ऊपर उठने लगीं। वे केवल आग की लपटें न रहकर एक मानव-आकृति में परिणत होने लगीं। तेजोमय शरीर, सात जिह्वाओं से युक्त मुख, हाथों में शक्ति और स्रुवा, मेषवाहन पर आरूढ़ — स्वयं भगवान् अग्निदेव प्रकट हुए।
उनके शरीर से जो प्रकाश निकल रहा था, वह नेत्रों को चकाचौंध कर देने वाला था, फिर भी उसमें ऐसी शीतलता थी कि वसिष्ठ की आँखें उस प्रकाश में खोई जा रही थीं। मानो वह दीप्ति बाहर से नहीं, भीतर से जग रही हो।
वसिष्ठ ने हाथ जोड़कर साष्टांग प्रणाम किया। नेत्रों में अश्रु छलछला आए। कण्ठ अवरुद्ध हो गया। बहुत देर तक वे शब्द नहीं बोल पाए। फिर धीरे से, गद्गद स्वर में कहा —
"हे अग्निदेव! आप तो स्वयं हव्यवाहन हैं, देवताओं के मुख हैं, यज्ञ के अधिष्ठाता हैं। आज आप मेरे समक्ष क्यों प्रकट हुए? मेरा क्या सौभाग्य?"
अग्निदेव ने अत्यन्त मधुर स्वर में उत्तर दिया — "वसिष्ठ! तुम्हारे मन में जो प्रश्न उठा है, वही प्रश्न करोड़ों युगों से अनेक जिज्ञासुओं के मन में उठता आया है। पर तुम जैसे शुद्ध आत्मा कम मिलते हैं, इसलिए मैं स्वयं तुम्हें वह समस्त ज्ञान देने आया हूँ जो भगवान् विष्णु ने सृष्टि के आरम्भ में मुझे प्रदान किया था।"
"यह ज्ञान केवल मन्त्रों का नहीं है। यह ज्ञान है — अवतार-कथाओं का, तीर्थों के माहात्म्य का, मन्दिर-निर्माण के विज्ञान का, मूर्ति-प्रतिष्ठा के विधान का, ज्योतिष के सूक्ष्म रहस्यों का, आयुर्वेद के औषध-योगों का, धनुर्वेद की युद्ध-कलाओं का, राजधर्म की नीतियों का, व्याकरण के सूत्रों का, छन्द-अलङ्कार के नियमों का, और अन्ततः ब्रह्म-विद्या के परम सत्य का।"
"यह जो मैं तुम्हें बताऊँगा, वह कोई एक विषय का ग्रन्थ नहीं — यह सम्पूर्ण मानव-जीवन का विश्वकोश है। जो इसे सुनेगा, पढ़ेगा, या इसका मनन करेगा — वह न केवल इस लोक में सुख पाएगा, परलोक में भी पुण्य का भागी होगा।"
वसिष्ठ ने विनम्रता से प्रश्न किया — "हे देव! यह ज्ञान आपको कहाँ से प्राप्त हुआ?"
अग्निदेव मुस्कुराए। उनके मुख की कान्ति और बढ़ गई। बोले — "वसिष्ठ! जब सृष्टि का आदि हुआ, जब प्रथम बार ब्रह्मा ने अपने कमल-नेत्रों से चारों ओर देखा, जब विष्णु क्षीर-सागर में शेष-शय्या पर लेटे थे — तब मैं भी अव्यक्त रूप से उपस्थित था। एक दिन भगवान् विष्णु ने मुझे संकेत से बुलाया।"
"उन्होंने कहा — 'अग्नि! आगे जाकर पृथ्वी पर अनेक जीव जन्म लेंगे। उनमें कुछ ज्ञानवान होंगे, कुछ अज्ञानी। ज्ञानवानों को मार्ग दिखाने के लिए, अज्ञानियों के अन्धकार को दूर करने के लिए — एक ऐसी विद्या-संहिता चाहिए जो सबकुछ कह डाले। मैं वह संहिता तुम्हें दे रहा हूँ। तुम इसे अपने हृदय में धारण करो। समय आने पर किसी पात्र शिष्य को सौंप देना।'"
"और तब विष्णु भगवान् ने मुझे वह विद्या दी जिसे आज तुम 'अग्नि-पुराण' के नाम से जानोगे। मैंने यह विद्या युगों से अपने हृदय में संजोकर रखी थी। आज तुम्हारी जिज्ञासा देखकर मैं इसे प्रकट करने आया हूँ।"
अग्निदेव ने आगे कहा — "वसिष्ठ! यह जो ज्ञान मैं तुम्हें दूँगा, वह कुल मिलाकर लगभग सोलह हजार श्लोकों में होगा। तीन सौ तियासी अध्यायों में विभाजित होगा। हर अध्याय एक स्वतन्त्र विषय का प्रतिपादन करेगा, फिर भी सब अध्याय परस्पर जुड़े होंगे — जैसे एक पुष्प-माला के सब पुष्प धागे से बँधे होते हैं।"
"प्रारम्भ में मैं तुम्हें भगवान् विष्णु के दस अवतारों की कथा सुनाऊँगा — मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। फिर तीर्थों का माहात्म्य बताऊँगा — गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी और काशी, गया, प्रयाग, हरिद्वार जैसे क्षेत्र।"
"तदनन्तर मन्दिर-निर्माण की वास्तु-विद्या, मूर्ति-प्रतिष्ठा की विधि, नित्य पूजा का विधान, स्नान-दान-व्रत के नियम बताऊँगा। मन्त्र-शास्त्र की गहराइयाँ बताऊँगा। फिर ज्योतिष का परिचय, मुहूर्त-विद्या, ग्रहों के प्रभाव, और शकुन-अपशकुन की पहचान कराऊँगा।"
"आयुर्वेद के मूल सिद्धान्त, त्रिदोष का विज्ञान, औषधियों के योग, गज-चिकित्सा, अश्व-चिकित्सा और वृक्षायुर्वेद भी बताऊँगा। धनुर्वेद की कलाएँ — खड्ग, गदा, धनुष, बाण के प्रयोग, युद्ध-नीति, और अस्त्र-शस्त्र के मन्त्र भी सिखाऊँगा।"
"राजधर्म, मन्त्रिमण्डल का गठन, गुप्तचर-व्यवस्था, सन्धि-विग्रह, राजकोश का प्रबन्धन, और दण्ड-व्यवहार के सिद्धान्त बताऊँगा। फिर वर्णाश्रम-धर्म, श्राद्ध-कर्म, प्रायश्चित्त-विधि और अन्त में व्याकरण, छन्द, अलङ्कार, कोश, नाट्य-शास्त्र, योग-साधना और वेदान्त की परम विद्या तक का प्रतिपादन करूँगा।"
वसिष्ठ ने सब सुनकर अत्यन्त भावविभोर होकर कहा — "हे देव! धन्य है मेरा जन्म, धन्य है मेरी तपस्या, जो आज आपके मुख से ऐसा अमृत-स्वरूप ज्ञान सुनने का सौभाग्य मिल रहा है। मैं वचन देता हूँ — यह ज्ञान मैं अपने तक सीमित नहीं रखूँगा। मैं इसे अपने पात्र शिष्यों को दूँगा, वे आगे और बाँटेंगे। यह ज्ञान-गंगा युग-युगान्तर तक बहती रहेगी।"
अग्निदेव प्रसन्न हुए। उन्होंने वसिष्ठ के मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया — "वसिष्ठ! तुम्हारे संकल्प से मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। यह ज्ञान आज से तुम्हारे हृदय में स्थापित होता है। तुम जब भी इसे सुनाओगे, मैं स्वयं तुम्हारी जिह्वा पर विराजमान रहूँगा। इसका जो भी अध्ययन करेगा, उसे ब्रह्मविद्या प्राप्ति में कोई बाधा नहीं आएगी।"
उस रात्रि से वसिष्ठ अग्निदेव के मुख से एक-एक अध्याय सुनने लगे। दिन-रात, मास-वर्ष, यह दिव्य संवाद चलता रहा। वसिष्ठ की कुटिया स्वयं एक तीर्थ बन गई। आसपास के ऋषि-मुनि भी कौतूहलवश आते और सुनकर कृतार्थ हो जाते। यही वह अमर ज्ञान-धारा थी जिसे आगे चलकर वसिष्ठ ने अपने प्रिय शिष्य व्यास को सुनाया, व्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को, और इस प्रकार एक के बाद एक — पीढ़ियों तक यह विद्या मौखिक परम्परा से बहती रही।
आज जो "अग्नि पुराण" हमारे हाथ में है, वह उसी मूल संवाद का संरक्षित स्वरूप है। प्रत्येक अध्याय में अग्निदेव का स्वर है, वसिष्ठ की जिज्ञासा है, और उस सम्पूर्ण ज्ञान का प्रकाश है जो सृष्टि के कल्याण के लिए स्वयं विष्णु ने प्रकट किया था।
इस प्रथम अध्याय में हमने जाना — अग्नि केवल भौतिक तत्त्व नहीं, चेतन शक्ति है। ज्ञान की उत्पत्ति विष्णु से अग्नि और अग्नि से वसिष्ठ तक की दिव्य परम्परा से हुई। वसिष्ठ की एक सात्विक जिज्ञासा ने इस महान् पुराण को जन्म दिया। और स्वयं अग्निदेव ने इसकी सम्पूर्ण रूपरेखा प्रकट की — दस अवतारों से लेकर ब्रह्मविद्या तक।
आगे के अध्यायों में हम एक-एक करके इन सब विषयों में गहरे उतरेंगे। पर सबसे पहले, अगले अध्याय में, हम भगवान् विष्णु के प्रथम तीन अवतारों — मत्स्य, कूर्म, वराह — की दिव्य लीलाओं को सुनेंगे, जो सृष्टि के संरक्षण के लिए स्वयं प्रकट हुए थे।
॥ इति श्री अग्निपुराणे प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥
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