1 १. अग्निदेव का प्राकट्य और वसिष्ठ को दिव्य ज्ञान का दान FREE 2 २. मत्स्य, कूर्म और वराह — सृष्टि-रक्षक त्रय अवतार FREE 3 ३. नृसिंह और वामन — भक्त-रक्षा और त्रिविक्रम लीला FREE 4 ४. परशुराम और राम — फरसा और धनुष की मर्यादा FREE 5 ५. कृष्ण, बुद्ध और कल्कि — द्वापर से कलि तक FREE 6 ६. तीर्थ-माहात्म्य — गंगा, काशी, गया और प्रयाग की महिमा FREE 7 ७. वास्तुशास्त्र — मन्दिर और भवन-निर्माण की दिव्य विद्या FREE 8 ८. मूर्ति-निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा का विज्ञान FREE 9 ९. नित्य पूजा-विधि — सोलह उपचारों का सम्पूर्ण क्रम FREE 10 १०. स्नान, दान और व्रत — पुण्य-संवर्धन के तीन आधार FREE 11 ११. विशेष व्रत-कथाएँ — सत्यनारायण से एकादशी तक FREE 12 १२. मन्त्र-शास्त्र — बीजाक्षरों का अद्भुत विज्ञान FREE 13 १३. ज्योतिष और मुहूर्त-विज्ञान FREE 14 १४. आयुर्वेद के मूल सिद्धान्त — त्रिदोष और सप्तधातु FREE 15 १५. रोग-चिकित्सा — विशिष्ट व्याधियों के आयुर्वेदिक उपचार FREE 16 १६. वृक्षायुर्वेद, गज-शास्त्र और अश्व-शास्त्र FREE 17 १७. धनुर्वेद और युद्ध-कला FREE 18 १८. अस्त्र-शस्त्र-मन्त्र विद्या और प्रसिद्ध युद्ध-कथाएँ FREE 19 १९. राजधर्म — आदर्श राज्य का दर्शन FREE 20 २०. नीतिशास्त्र — व्यावहारिक जीवन की बुद्धि FREE 21 २१. दण्ड-विधान और व्यवहार-शास्त्र FREE 22 २२. वर्णाश्रम-धर्म और सोलह संस्कार FREE 23 २३. श्राद्ध-कर्म और पितृ-तर्पण FREE 24 २४. प्रायश्चित्त-विधान — पाप-शोधन का दिव्य मार्ग FREE 25 २५. व्याकरण, छन्द और अलङ्कार-शास्त्र FREE 26 २६. कोश-शास्त्र, संगीत और नाट्य-कलाओं का विस्तार FREE 27 २७. योग-साधना — पतञ्जलि का अष्टांग-योग FREE 28 २८. वेदान्त और ब्रह्म-ज्ञान FREE 29 २९. प्रलय और सृष्टि-चक्र — समय का दिव्य गणित FREE 30 ३०. उपसंहार और फलश्रुति — पुराण-श्रवण का फल FREE
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२. मत्स्य, कूर्म और वराह — सृष्टि-रक्षक त्रय अवतार

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भगवान् विष्णु के प्रथम तीन अवतारों की कथा — प्रलय की प्रचण्ड जलधारा से वेदों को बचाने वाला मत्स्य, समुद्र-मन्थन में मन्दराचल को थामने वाला कूर्म, और रसातल में डूबी पृथ्वी को अपनी दाढ़ पर उठाकर लाने वाला वराह।

॥ नमो मत्स्याय कूर्माय वराहाय नमो नमः । यो ब्रह्माण्डमिदं रक्षेत् सोऽनन्तो विष्णुरेव हि ॥

वसिष्ठ ने अग्निदेव से कर-बद्ध होकर निवेदन किया — "हे देव! आपने कहा था कि सर्वप्रथम आप मुझे विष्णु भगवान् के दशावतारों की कथा सुनाएँगे। कृपया प्रथम तीन अवतारों — मत्स्य, कूर्म, वराह — की दिव्य कथाएँ अब प्रकट कीजिए।"

अग्निदेव सहर्ष बोले — "वसिष्ठ! जब-जब धर्म पर संकट आता है, जब-जब सृष्टि के विधान में विघ्न उपस्थित होता है — तब-तब भगवान् विष्णु अवतार लेकर पृथ्वी पर प्रकट होते हैं। ये दस अवतार उसी अनादि कल्याण-संकल्प के दस सोपान हैं। आओ, सर्वप्रथम सुनो — मत्स्य अवतार की अद्भुत कथा।"

कल्प के अन्त की वह घड़ी थी जब ब्रह्मा का दिवस समाप्त हो रहा था। सृष्टि अपने विश्राम-काल की ओर बढ़ रही थी। ब्रह्मा निद्रा में जाने को थे और महा-प्रलय की प्रचण्ड जल-धारा सम्पूर्ण पृथ्वी को निगलने आ रही थी।

उसी समय हयग्रीव नाम का एक बलवान् असुर ब्रह्मा के मुख से निकले हुए चारों वेदों को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिप गया। हयग्रीव का अहंकार इतना बढ़ चुका था कि उसने सोचा — "अब वेदों के बिना देवता शक्तिहीन हो जाएँगे, और मैं तीनों लोकों का स्वामी बन जाऊँगा।"

देवताओं में हाहाकार मच गया। ब्रह्मा घबराए। पर एक ही उपाय था — विष्णु की शरण।

उस समय द्रविड़-देश में राजा सत्यव्रत नाम के एक धर्मनिष्ठ राजा थे। उनकी प्रतिज्ञा थी कि नित्य प्रातः कृतमाला नदी में स्नान करके सूर्य-अर्घ्य देंगे, और जो भी जीव उनकी अंजलि में आ जाए, उसकी रक्षा अवश्य करेंगे।

एक दिन जब सत्यव्रत नदी में अंजलि भरकर अर्घ्य देने को थे, उनकी हथेली में एक छोटी-सी मछली आ गई। मछली बोल उठी — "राजन्! मुझे जल में मत डालो। बड़ी मछलियाँ मुझे खा जाएँगी। मेरी रक्षा करो।"

आश्चर्यचकित सत्यव्रत ने मछली को अपने कमण्डल में रख लिया। पर अगले ही क्षण मछली का आकार बढ़ गया। कमण्डल छोटा पड़ने लगा। राजा ने उसे एक बड़े घड़े में डाला। पर वह भी छोटा पड़ गया। फिर कुएँ में, फिर सरोवर में, फिर नदी में — पर हर बार मछली का आकार उससे भी बड़ा हो जाता।

अन्त में राजा ने उसे समुद्र में छोड़ दिया। पर समुद्र में भी वह बढ़ती गई। तब सत्यव्रत समझ गए — यह कोई साधारण मछली नहीं। उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया और पूछा — "हे प्रभु! आप कौन हैं?"

उसी क्षण मछली के स्थान पर स्वर्ण-वर्ण, सींग-युक्त, अद्भुत तेजोमय मत्स्य रूप में भगवान् विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने कहा — "सत्यव्रत! सात दिन के पश्चात् महा-प्रलय आएगा। समस्त पृथ्वी जल में डूब जाएगी। मैं तुम्हें एक नौका दूँगा। उस नौका पर सप्तर्षियों, सब प्रकार के बीजों, समस्त औषधियों और जीवों के युग्मों को लेकर बैठ जाना। मैं स्वयं मत्स्य रूप में आऊँगा। मेरे सींग में नौका बाँध देना।"

सात दिन बीते। प्रलय आया। चारों ओर अथाह जल। आकाश गिरने लगा। पर्वत डूबने लगे। पर सत्यव्रत की नौका मत्स्य के सींग से बँधकर निरापद बहती रही।

उसी प्रलय-काल में मत्स्य ने समुद्र की गहराइयों में जाकर हयग्रीव को ढूँढ निकाला। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। मत्स्य के तीक्ष्ण सींग और प्रचण्ड पूँछ के प्रहार से हयग्रीव छिन्न-भिन्न हो गया। उसके मुख से चारों वेद बाहर निकले। मत्स्य उन्हें ले आए और ब्रह्मा को सौंप दिए।

प्रलय के पश्चात् जब नई सृष्टि हुई, सत्यव्रत ही "वैवस्वत मनु" कहलाए — इस मन्वन्तर के प्रथम मनु। उन्हीं से समस्त मानव-जाति का विस्तार हुआ। और मत्स्य अवतार की उस लीला को आज भी पुराण गाते हैं।

प्रलय के पश्चात् सृष्टि का पुनः उद्भव हुआ। देवता और दैत्य दोनों उत्पन्न हुए। पर एक समय आया जब महर्षि दुर्वासा के शाप से देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई। इन्द्र दुर्बल हो गए। दैत्यों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवता पराजित होकर ब्रह्मा-विष्णु की शरण में आए।

विष्णु ने कहा — "देवताओं! तुम्हें फिर से शक्ति-सम्पन्न बनने के लिए अमृत चाहिए। अमृत क्षीर-सागर में छिपा है। उसे पाने के लिए समुद्र का मन्थन करना होगा। पर अकेले देवता यह नहीं कर सकेंगे। दैत्यों को भी सहयोगी बनाओ। मन्थन के पश्चात् अमृत मैं ही तुम्हें दिलवा दूँगा।"

देवताओं और दैत्यों ने मिलकर मन्थन का संकल्प किया। मन्थन-दण्ड के रूप में मन्दराचल पर्वत को चुना गया। रस्सी के रूप में नागराज वासुकि को।

देवताओं ने वासुकि की पूँछ पकड़ी, दैत्यों ने मुख। मन्दराचल को क्षीर-सागर में रखकर मन्थन आरम्भ हुआ।

पर एक भारी विघ्न आ पड़ा। मन्दराचल का नीचे का भार इतना था कि वह समुद्र की गहराई में धँसने लगा। मन्थन रुक गया। देवता-दैत्य हताश हो गए।

उसी क्षण भगवान् विष्णु ने विशाल कच्छप का रूप धारण किया। उनकी पीठ इतनी विशाल थी कि सम्पूर्ण मन्दराचल उस पर सहज स्थापित हो सका। कूर्म-रूपी विष्णु अपनी पीठ पर पर्वत का सम्पूर्ण भार वहन करते हुए अविचल रहे।

मन्थन पुनः आरम्भ हुआ। बारी-बारी क्षीर-सागर से चौदह रत्न निकले — हलाहल विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सरा रम्भा, लक्ष्मी देवी, वारुणी, चन्द्रमा, पाञ्चजन्य शङ्ख, शार्ङ्ग धनुष, धन्वन्तरि वैद्य, और अन्त में स्वयं अमृत-कलश

हलाहल विष का संहार शिव ने किया — उसे अपने कण्ठ में धारण कर वे "नीलकण्ठ" कहलाए। और अमृत के लिए जो दैत्यों-देवताओं में संग्राम हुआ, उसमें विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत-पान कराया।

कूर्म अवतार का सन्देश यह है — कि जब भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भार आ पड़े, तब विष्णु का स्थैर्य सर्व-आधार बनता है। बाहर से छोटा-सा कच्छप दिखे, पर भीतर से वह पर्वत-धारक होता है।

एक और कल्प आया। उस समय हिरण्याक्ष नाम का एक दुर्धर्ष असुर उत्पन्न हुआ। उसके पिता का नाम था कश्यप, माता का दिति। उसका भाई था हिरण्यकशिपु। हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा से वर पाकर इतना अहंकारी हो गया कि देवता-मनुष्य कोई उसका सामना न कर सके।

एक दिन उसने अति घोर कर्म किया — पृथ्वी को उठाकर रसातल में ले गया। पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में आ पड़ा। सृष्टि शून्य हो गई। देवता रोने लगे। ब्रह्मा ने विष्णु का स्मरण किया।

विष्णु ने तत्काल विशालकाय वराह का रूप धारण किया। उनके दाँत प्रचण्ड, थूथन ऊपर उठा हुआ, शरीर पर्वताकार। वे एक झटके से ब्रह्मा की नासिका से प्रकट हुए, और देखते ही देखते आकाश-स्पर्शी आकार धारण कर लिया।

वराह-रूपी विष्णु ने रसातल में प्रवेश किया। वहाँ पृथ्वी पड़ी थी, अचेत-सी। हिरण्याक्ष गर्जन करता हुआ सामने आया। दोनों में हजार वर्षों तक घोर युद्ध चला। अन्त में वराह ने अपनी प्रचण्ड दाढ़ों से हिरण्याक्ष का वध किया।

तदनन्तर वराह ने अपनी एक दाढ़ पर पृथ्वी को उठाकर समुद्र-तल से ऊपर लाया। मानो माँ को गोद में उठाकर ले आ रहे हों। पृथ्वी ने वराह-रूपी विष्णु को नमस्कार किया और अपनी रक्षा के लिए धन्यवाद कहा।

वराह ने पृथ्वी को क्षीर-सागर में पुनः स्थापित किया। तब से वह भू-देवी कहलाईं और भगवान् विष्णु की पत्नी मानी गईं — लक्ष्मी और भू-देवी, दोनों उनके दो स्वरूप हैं। एक धन की देवी, दूसरी क्षमा की।

वराह-अवतार ने यह सिखाया कि कोई भी अधर्मी कितनी भी दूर पृथ्वी को ले जाए, विष्णु उसे ढूँढ़कर वापस ले आते हैं। पृथ्वी कोई परित्यक्त वस्तु नहीं — वह स्वयं विष्णु की प्रिया है।

अग्निदेव ने वसिष्ठ को समझाया — "वसिष्ठ! ये तीन अवतार केवल पौराणिक कथाएँ नहीं हैं। इनमें गहरा सङ्केत है।"

"मत्स्य सिखाता है — संकट के समय जो ज्ञान-वेद-शास्त्र की रक्षा करता है, वही धर्म-संरक्षक है। प्रलय में भी विद्या को बचाओ।"

"कूर्म सिखाता है — जब बड़ा कार्य हो, तब अपने अहंकार को छोटा करके आधार बनो। जो भार उठाने को तैयार है, वही नेतृत्व कर सकता है।"

"वराह सिखाता है — पृथ्वी, मातृभूमि, धरती-माँ — चाहे कितने भी अधर्म से आक्रान्त हो, उसका उद्धार धर्म-शक्ति ही करती है। माँ की रक्षा सबसे बड़ा कर्तव्य है।"

इस अध्याय में हमने जाना — कैसे प्रलय-काल में मत्स्य ने वेदों की रक्षा की, समुद्र-मन्थन में कूर्म ने मन्दराचल को थामा, और रसातल से वराह ने पृथ्वी को उद्धरित किया। ये तीनों अवतार सृष्टि-रक्षा के तीन सोपान हैं — विद्या-रक्षा, प्रयत्न-संरक्षण, और भूमि-उद्धार।

अगले अध्याय में हम सुनेंगे विष्णु के अगले दो प्रचण्ड अवतारों की कथा — नृसिंह जो खम्भे से प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा करते हैं, और वामन जो तीन पग से तीनों लोक नाप लेते हैं।

॥ इति श्री अग्निपुराणे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥

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