स्तम्भ से प्रकट होकर हिरण्यकशिपु का संहार करने वाला नृसिंह, और तीन पगों में तीनों लोकों को नापकर बलि के अहंकार को विनम्र बनाने वाला वामन — विष्णु के चौथे और पाँचवें अवतारों की दिव्य कथा।
॥ नमो नृसिंहाय वामनाय च नमो नमः । स्तम्भोद्भूताय सर्वेशं त्रिविक्रमपदाय च ॥
वसिष्ठ ने अग्निदेव के चरणों में पुनः प्रणाम कर कहा — "हे देव! मत्स्य, कूर्म और वराह की कथा सुनकर मेरा हृदय पुलकित हो उठा। अब कृपया चौथे अवतार नृसिंह की वह अद्भुत लीला सुनाइए, जो स्तम्भ से प्रकट होकर अपने नन्हें भक्त की रक्षा करते हैं।"
अग्निदेव ने मन्द स्मित किया। बोले — "वसिष्ठ! जब हिरण्याक्ष का वध वराह ने किया, तो उसका भाई हिरण्यकशिपु क्रोध से उन्मत्त हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि वह विष्णु से अपने भाई का बदला लेगा। और इसके लिए उसने वह घोर तपस्या की जैसी उसके पहले किसी ने नहीं की थी।"
हिरण्यकशिपु ने मन्दराचल पर जाकर ब्रह्मा की आराधना आरम्भ की। हजार वर्षों तक वह बिना अन्न-जल के एक पाँव पर खड़ा रहा। उसके शरीर के चारों ओर दीमकें चढ़ गईं। बाल बढ़कर जटाओं में बदल गए। पर वह अडिग रहा।
उसकी तपस्या से तीनों लोक तप्त हो उठे। देवता घबराए। ब्रह्मा को प्रकट होना पड़ा। बोले — "वत्स! वर माँगो।"
हिरण्यकशिपु ने कहा — "हे ब्रह्मन्! मुझे ऐसा वर दीजिए कि मेरा वध न हो — न दिन में, न रात में; न घर में, न बाहर; न पृथ्वी पर, न आकाश में; न मनुष्य से, न पशु से; न अस्त्र से, न शस्त्र से; न देवता से, न दानव से।"
ब्रह्मा ने कहा — "तथास्तु।" और अदृश्य हो गए। हिरण्यकशिपु अहंकार से फूल उठा। उसने सोचा — "अब मेरी मृत्यु असम्भव है। मैं ही ब्रह्माण्ड का स्वामी हूँ।"
उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर इन्द्र को सिंहासन से उतार दिया। तीनों लोकों में अपनी पूजा अनिवार्य कर दी। यज्ञ-यागादि बन्द करवा दिए। जो विष्णु का नाम लेता, उसका सिर कटवा देता। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।
पर एक स्थान पर विष्णु की भक्ति नहीं रुकी — और वह स्थान था स्वयं हिरण्यकशिपु का अपना घर। उसका पुत्र प्रह्लाद जन्म से ही विष्णु-भक्त था।
प्रह्लाद जब माता के गर्भ में था, तब नारद-मुनि उसकी माँ कयाधू को विष्णु-कथा सुनाते थे। वही कथा गर्भ में बैठे प्रह्लाद के अन्तःकरण में पैठ गई। जन्म लेते ही उसके मुख से पहला शब्द निकला — "नारायण।"
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को राजकुमारों की पाठशाला में पढ़ने भेजा। पर वहाँ पाँच वर्ष का प्रह्लाद बच्चों को राजनीति नहीं, हरि-नाम सिखाने लगा। पाठशाला में बच्चे "विष्णु-विष्णु" करने लगे।
हिरण्यकशिपु को जब यह पता चला, उसका क्रोध सीमा-पार हो गया। उसने पुत्र को बुलाया। पूछा — "बेटा! तू सबसे बड़ा कौन मानता है?"
प्रह्लाद ने निडर होकर कहा — "पिताजी! जो सबमें है — वह नारायण ही सबसे बड़ा है।"
क्रोध में आकर हिरण्यकशिपु ने पुत्र को मारने के अनेक प्रयास किए — हाथी से कुचलवाया, साँपों से डँसवाया, पर्वत से गिरवाया, समुद्र में डुबवाया, विष पिलवाया। पर हर बार प्रह्लाद बचता रहा। उसका विश्वास इतना दृढ़ था — "नारायण मेरी रक्षा करेंगे" — कि कोई शस्त्र उसे छू न सका।
अन्त में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका — जिसे अग्नि से न जलने का वर प्राप्त था — प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी। पर लीला उल्टी हुई। होलिका जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद बाल-बाल बच गया। उसी दिन से होली-पर्व प्रारम्भ हुआ।
हिरण्यकशिपु अब अन्तिम क्रोध में था। उसने प्रह्लाद को राज-सभा में बुलाया। तलवार खींचकर पूछा — "बता! तेरा वह विष्णु कहाँ है?"
प्रह्लाद ने शान्त स्वर में कहा — "पिताजी! वे सर्वत्र हैं। यहाँ इस सभा में भी, इस स्तम्भ में भी।"
हिरण्यकशिपु अट्टहास कर उठा — "अच्छा! तो इस स्तम्भ में दिखा दे अपने विष्णु को!" यह कहकर उसने अपनी तलवार से सभा-कक्ष के बीच के विशाल खम्भे पर प्रहार किया।
और तभी — एक भयङ्कर गर्जना हुई। स्तम्भ चटकने लगा। उसमें से एक अद्भुत आकृति प्रकट हुई — आधा सिंह, आधा मनुष्य; नेत्रों से अग्नि बरसती हुई; नाखून तीक्ष्ण; जिह्वा बाहर निकली हुई; कण्ठ से प्रलय-गर्जना। यही था नरसिंह अवतार — स्वयं विष्णु का सबसे प्रचण्ड स्वरूप।
नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को पकड़ा। फिर — हर शर्त को तोड़े बिना उसका वध करना था। ब्रह्मा का वर था कि वह न मनुष्य से मरे, न पशु से। नृसिंह न मनुष्य थे, न पशु — दोनों का सङ्गम।
वर था कि न दिन में, न रात में। नृसिंह ने सन्ध्या-काल को चुना — जो न दिन है, न रात।
वर था कि न घर में, न बाहर। नृसिंह ने उसे देहली पर बिठाया।
वर था कि न पृथ्वी पर, न आकाश में। नृसिंह ने उसे अपनी जाँघों पर रखा।
वर था कि न अस्त्र से, न शस्त्र से। नृसिंह ने उसे अपने नाखूनों से चीर डाला।
हिरण्यकशिपु का अहंकार उसके अपने वर के साथ ही समाप्त हो गया। प्रह्लाद बच गया। तीनों लोकों में हाहाकार के स्थान पर हर्ष की लहर दौड़ गई।
पर नृसिंह का क्रोध अभी थमा नहीं था। उनकी प्रचण्ड ज्वालाएँ देवताओं के लिए भी असह्य हो गईं। ब्रह्मा, शिव, इन्द्र — सब प्रार्थना करने आए, पर नृसिंह की दृष्टि से सब काँप उठे।
तब छोटा-सा प्रह्लाद आगे आया। उसने नृसिंह के चरणों पर अपना मस्तक रखा। बस — उसी क्षण नृसिंह का सम्पूर्ण क्रोध शान्त हो गया। उन्होंने प्रह्लाद को गोद में उठा लिया। मस्तक पर हाथ फेरा। आशीर्वाद दिया — "वत्स! तेरी भक्ति अमर रहेगी। तेरा वंश दैत्य होकर भी मेरा भक्त-वंश कहलाएगा।"
प्रह्लाद को राज्य दिया गया। उसका पुत्र विरोचन, पौत्र बलि — आगे चलकर वामन-कथा का केन्द्र-पात्र होगा।
प्रह्लाद के पौत्र राजा बलि महान् धर्मात्मा थे। दानवीर थे। पर अपनी विजयों से इतने उन्नत हो गए कि उन्होंने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। इन्द्र फिर पराजित होकर भागे। देवताओं की माता अदिति ने भगवान् विष्णु से प्रार्थना की।
विष्णु ने वर दिया — "माता! मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र होकर अवतरित होऊँगा।" और तब अदिति के गर्भ से एक छोटा-सा, गौर-वर्ण, तेजस्वी ब्राह्मण-बालक जन्मा। नाम पड़ा — वामन।
उस समय बलि नर्मदा-तट पर एक विशाल अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की समाप्ति पर वे प्रत्येक माँगने वाले को मनोवांछित दान दे रहे थे।
इसी अवसर पर एक छोटा ब्राह्मण-बालक — दण्ड-कमण्डलु लिए, मेखला बाँधे, तेजोमय वामन — यज्ञ-शाला में आया। बलि ने उसे साष्टांग प्रणाम किया। पूछा — "हे ब्राह्मण-कुमार! क्या चाहिए?"
वामन ने मधुर स्वर में कहा — "राजन्! बस इतना — तीन पग भूमि।"
बलि हँस पड़े। "अरे ब्राह्मण-बालक! क्या यही माँगने आए हो? पर्वत माँगो, राज्य माँगो, सोना माँगो।"
पर वामन हठ पर अड़े — "बस तीन पग। उतना ही मेरे लिए पर्याप्त है।"
बलि के गुरु शुक्राचार्य को कुछ खटका। उन्होंने दिव्य-दृष्टि से देखा — यह तो स्वयं विष्णु है! उन्होंने बलि को रोका — "राजन्! यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं। दान मत दो। यह तीन पग में तीनों लोक नाप लेगा।"
पर बलि अडिग रहे। बोले — "गुरुदेव! मैं अपने वचन से नहीं हट सकता। चाहे विष्णु ही हों — मैंने दान का संकल्प कर लिया है। एक धर्मपरायण राजा अपने वचन से कैसे पीछे हटे?"
बलि ने हाथ में जल लिया। संकल्प किया। और जल वामन की हथेली पर डाल दिया।
उसी क्षण वामन का वह नन्हा शरीर बढ़ने लगा। आकाश छूने लगा। पृथ्वी काँपने लगी। समुद्र उछलने लगे। पर्वत लड़खड़ाने लगे। और देखते-देखते वह बालक एक अनन्त-स्वरूप — त्रिविक्रम — बन गया।
एक पग में उन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वी और पाताल नाप लिया। दूसरे पग में सम्पूर्ण स्वर्ग और आकाश। और तीसरे पग के लिए स्थान बचा ही नहीं।
विष्णु ने पूछा — "राजन्! अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?"
बलि अब भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपना मस्तक झुकाया। बोले — "हे प्रभु! आपका तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिए। और कुछ नहीं बचा है।"
विष्णु प्रसन्न हो गए। उन्होंने अपना तीसरा पग बलि के मस्तक पर रखा। बलि पाताल लोक में चले गए — पर हृदय से नहीं, गौरव से। विष्णु ने उन्हें वर दिया — "बलि! तेरा अहंकार समाप्त, पर तेरा यश अमर। तू सुतल लोक का अधिपति। और जब-जब वामन-द्वादशी आएगी, तेरा नाम पुण्य-शील दानवीरों में लिया जाएगा।"
विष्णु स्वयं बलि के द्वार के द्वारपाल बन गए — यह उनकी भक्त-वत्सलता का चरम।
अग्निदेव ने वसिष्ठ को कहा — "देखो वसिष्ठ! दोनों अवतार विरोधाभासी प्रतीत होते हैं — पर दोनों एक ही सत्य को बताते हैं।"
"नृसिंह कहते हैं — जब अहंकार सीमा पार करे, तब विष्णु स्तम्भ से भी प्रकट हो सकते हैं। भक्त की रक्षा के लिए कोई स्थान वर्जित नहीं।"
"वामन कहते हैं — कितने भी बड़े दानवीर हों, यदि अहंकार रहे तो बड़ा भी छोटा है। और जो अपना सिर भी अर्पित कर सकता है, वह छोटा होकर भी बड़ा है।"
"दोनों कथाओं का सार एक — अहंकार धर्म का सबसे बड़ा शत्रु है, और भक्ति सबसे बड़ी रक्षक।"
इस अध्याय में हमने सुनी प्रह्लाद की अडिग भक्ति, स्तम्भ से नृसिंह का प्रचण्ड प्रकटन, हिरण्यकशिपु के अहंकार का समापन, और बलि के पास वामन का तीन पग माँगना। दोनों कथाएँ हमें यह सिखाती हैं कि भक्ति किसी भी रूप में आ सकती है — कभी पाँच वर्ष के बालक के रूप में, कभी ब्राह्मण-बालक के रूप में।
अगले अध्याय में हम दो ऐसे अवतारों की कथा सुनेंगे जिन्होंने मानव-शरीर में आकर सम्पूर्ण मर्यादा का आदर्श रखा — परशुराम जो क्षत्रिय-दर्प का संहार करते हैं, और राम जो मर्यादा-पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
॥ इति श्री अग्निपुराणे तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥
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